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मां जियेगी तो हम जियेंगे

संजय स्वतंत्र द लास्ट कोच : किस्त 4 गंगा-यमुना को लेकर जिस दिन उत्तराखंड हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया, तब से इन दोनों नदियों को लेकर मैं बेहद भावुक हो गया हूं। यों भी हम सभी भारतीय दिल से भावुक और कल्पनाशील होते हैं। कोई एक दशक पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री...

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राकेश रोहित की सात कविताएं

जब सब लौट जायेंगे सब जब घर लौट जायेंगे मैं कहाँ जाऊंगा इतनी बड़ी दुनिया में नहीं है मेरा कोई वृक्ष! मेरे जीवन में कुछ कलरव की स्मृतियाँ हैं और एक पुराने स्कूल की जिसकी दीवार ढह गयी थी मास्टर जी की पीठ पर छुट्टी का घंटा बजने पर जहाँ...

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कृष्णधर शर्मा की चार कविताएं

नदी और औरत किसी झरने का नदी बन जाना ठीक वैसे ही तो जैसे किसी लड़की का औरत बन जाना जैसे एकवचन से बहुवचन हो जाना जैसे अपने लिए जीना छोड़कर दुनिया के लिए जीना जैसे दूसरों को अमृत पिला खुद जहर पीना अद्भुत सी समानताएं हैं नदी और औरत...

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डॉ भावना की तीन कविताएं

उस रात उस रात जब बेला ने खिलने से मना कर दिया था तो ख़ुशबू उदास हो गयी थी उस रात जब चाँदनी ने फेर ली अपनी नज़रें चाँद को देखकर तो रो पड़ा था आसमान उस रात जब नदी ने बिल्कुल शांत हो रोक ली थी अपनी धाराएँ तो...

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वेद प्रकाश की तीन प्रेम कविताएं

एक लंबी प्रेम कविता तुम धूप में अपने काले लंबे बाल जब-जब सुखाती हो सूरज का सीना फूल जाता है और पूरे आकाश पर छा जाता है मैंने देखा है गुलमुहर के नीचे बस का इंतजार करते हुए बस आए या न आए तुम्हारी छाया गुलमुहर को चटख कर देती...

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डॉ छवि निगम की पांच कविताएं

स्वतंत्रता एक भेड़ के पीछे पीछे खड्ढे में गिरती जाती अंधाधुंध पूरी कतार को भाईचारे को मिमियाती पूरी इस कौम इतनी सारी ‘मैं’ हम न हो पायीं जिनकी अब तक, उनको… चंहु ओर होते परिवर्तन से बेखबर चाबुक खाते आधी आँखों पे पड़े  परदे से सच आंकते झिर्री भर साम्यवाद...

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डॉ. राकेश जोशी की चार ग़ज़लें

1 आदमी के लिए ज़िंदगानी तो लिख धूप कोई कभी आसमानी तो लिख छुट्टियों में भला, जाएं बच्चे कहाँ हर किसी के लिए एक नानी तो लिख हो शहर में कोई एक ऐसी नदी जिसमें सबको मिले, थोड़ा पानी तो लिख आज फिर बैठकर कोई कविता सुना और जनता हुई...

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वीणा भाटिया की चार कविताएं

प्रकृति से… 1. नदी की धारा में हाथ डालना छूना महसूस करना कितनी बातें करती है नदी हमसे   जाने कब से है धरती पर कहाँ-कहाँ से गुज़र कर कितने तट कितने रास्ते पार करती बहती जा रही है   सबसे सरल सृजन है बचपन के बनाए चित्रों में जो...

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प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

आज का दिन शताब्दियों ने लिखी है आज अपने वर्तमान की आखिरी पंक्ति आज का दिन व्यर्थ नहीं होगा चुप नहीं रहगी पेड़ पर चिड़िया न खामोश रहेंगी पेड़ों की टहनियाँ न प्यासी गर्म हवा संगीत को पियेगी न धरती की छाती ही फटेगी अंतहीन शुष्कता में न मुरझायेंगे हलों...

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दिनेश शर्मा की तीन कविताएं

बीड़ी तुम्हारी पैदाइश निम्नवर्गीय है जंगली पत्तों की तुम्हारी खाल गन्दे हाथों में आकर ही शक्ल लेती है। तुम्हारा जीवन एक चिंगारी से शुरू होता है आजीवन तुम शड़ड़-शड़ड़ साँस लेती हुई बुझती हो। तुम्हारे कुनबे का टी. बी. से क्या गहरा नाता है जिसके होंठ चूमती हो उसके फेफड़ों...

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पीड़ा और प्रेम की अजस्र धारा वाली ‘एक नदी जामुनी सी’

पुस्तक समीक्षा सुशील कुमार मालिनी गौतम अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापिका होते हुए हिंदी में लिखती हैं जो हिंदी के लिए एक बड़ी अच्छी बात है। गजल-संग्रह के बाद बोधि प्रकाशन से 2016 में उनकी एक कविता की किताब *एक नदी जामुनी सी* आई है। पूरे संग्रह से गुजरने पर मुझे...

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शुक्ला चौधरी की पांच कविताएं

युद्ध और जीवन बहुत पेचीदा मामला है ये युद्ध हुआ युद्ध तो भी मैं सोचूंगी अपने बारे में ही कि किस तरह तुम तक पहुंचू और तुमसे कहूं कि लो मुझे छू कर बैठो शायद- पृथ्वी बच जाए. दुनिया इस फूल पर से गुज़रकर कोई युद्ध नहीं होगा/यहीं फूल को...

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अभिज्ञात की पांच कविताएं

खुशी ठहरती है कितनी देर मैं दरअसल खुश होना चाहता हूं मैं तमाम रात और दिन सुबह और शाम इसी कोशिश में लगा रहा ता-उम्र कि मैं हो जाऊं खुश जिसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता नहीं जानता कि ठीक किस ..किस बिन्दु पर पहुंचना होता है आदमी का...

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राज्यवर्द्धन की चार कविताएं

पक्ष जो लेखक,कलाकार,वैज्ञानिक,अधिकारी उद्योगपति एवं बुद्धिजीवी हिन्दू हैं और हमारे पक्ष में नहीं हैं वे कम्युनिस्ट हैं या फिर दरबारी हैं कांग्रेस के …और जो मुस्लिम हैं हमारे पक्ष में नहीं हैं वे पाकिस्तानी हैं सिर्फ मेरी ही विचारधारा देश की सभ्यता से जुड़ी है पवित्र है देश की संस्कृति...

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उमेश कुमार राय की दो कविताएं

सपना देख रहा हूं मैं बदल रहा है देश छू रहा है विकास के नये आयाम गरीबी का कहीं कोई नामोनिशां नहीं माँ-बहन-बच्चों के शरीर पर पूरे वस्त्र बच्चा नहीं तरसता बचपन को बूढ़े नहीं तड़पते तीमारदारी को महफूज हैं माँ-बहनें घर में भी बाहर भी, उन्हें डर नहीं निर्भया...

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सुशांत सुप्रिय की पांच कविताएं

माँ , अब मैं समझ गया मेरी माँ बचपन में मुझे एक राजकुमारी का क़िस्सा सुनाती थी राजकुमारी पढ़ने-लिखने घुड़सवारी , तीरंदाज़ी सब में बेहद तेज़ थी वह शास्त्रार्थ में बड़े-बड़े पंडितों को हरा देती थी घुड़दौड़ के सभी मुक़ाबले वही जीतती थी तीरंदाज़ी में उसे केवल ‘ चिड़िया की...

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श्वेता शेखर की पांच कविताएं

खिलखिलाते हैं मुखौटे समय के हिसाब से हमेशा चलता है हमारे साथ एक मुखौटा हम ठीक ठीक नहीं पहचानते समय की नब्ज को पर मुखौटा बड़ी तेजी और नजाकत के पहचान लेता है समय को अंदर जाने कितने ही हो रंग पर बाहर दिखता है सभी मुखौटा सभ्य, शालीन और...

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आनन्द गुप्ता की तीन कविताएं

शब्द शब्दों में ही जन्मा हूँ शब्दों में ही पला मैं शब्दों में जीता हूँ शब्द ओढ़ता बिछाता हूँ। जैसे सभ्यता के भीतर सरपट दौड़ता है इतिहास सदियों का सफर तय करते हुए ये शब्द मेरे लहू में दौड़ रहे हैं मैं शब्दों की यात्रा करते हुए खुद को आज...

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शुक्ला चौधरी की 5 कविताएं

शुक्ला चौधरी युद्ध न मिसाइलें दाग न अस्त्र दिखा तू देखता जा युद्ध आरंभ हो चुका है एक बूंद पानी के लिए एक और युद्ध की तैयारी रात सरपट दौड़ रही है पानी के लिए बरतन खाली कर रही है औरतें/रात दो बजे सार्वजनिक नल से पतली सी धार पानी...