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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘लाश’

सुशान्त सुप्रिय A-5001 ,गौड़ ग्रीन सिटी ,वैभव खंड ,इंदिरापुरम ,ग़ाज़ियाबाद – 201014( उ. प्र. )मो: 8512070086ई–मेल: sushant1968@gmail.com घर के ड्राइंगरूम में उनकी लाश पड़ी हुई है  । उनकी मृत्यु से मुझे गहरा झटका लगा है ।  मैं सदमे में हूँ । बुझा हुआ हूँ ।  मेरी वाणी को जैसे लकवा मार गया है ।  हाथ–  पैरों में जैसे जान ही नहीं रही ।  आँखों में जैसे किसी ने ढेर सारा अँधेरा झोंक दिया है ।  वे नहीं गए । ऐसा लगता है जैसे मेरा सब कुछ चला गया है । जैसे मेरी धमनियों और शिराओं में से रक्त चला गया है । जैसे मेरे शरीर में से मेरी आत्मा चली गई है । जैसे मेरे आसमान से सूरज, चाँद और सितारे चले गए हैं । सुबहका समय है लेकिन इस सुबह के भीतर रात की कराहें दफ़्न हैं ।  लगता है जैसे मेरे वजूद की किताब के पन्ने फट कर समय की आँधी में खो जाएँगे … मेरे घर में मेरी पत्नी , मेरा बेटा और मेरी बेटी रहते हैं । और हमारे साथ रहते थे वे । वे मेरे यहाँ तब से थे जब से मैंने इस घर में आँखें खोली थीं । बल्कि इस से भी कहीं पहले से वे हम सब के बीच थे । मेरे पिताजी , दादाजी — सब उनकीइज़्ज़त करते थे ।  वे हमारे यहाँ ऐसे रहते थे जैसे भक्त के दिल में भगवान रहते हैं ।  जैसे बादलों में बूँदें रहती हैं ।  जैसे  सूर्य की किरणों में ऊष्मा रहती है । जैसे इंद्रधनुष में रंग रहते हैं । जैसे फूलों में पराग रहता है । जैसे पानी में मछली रहती है। जैसे पत्थरों में आग रहती है । जैसे आँखों में पहचान रहती है … उनकी उँगली पकड़ कर ही मैं जीवन में दाख़िल हुआ था । मेरी सौभाग्यशाली उँगलियों ने उन्हें छुआ था । पिताजी, दादाजी — सब ने हमारे जीवन में उनके महत्व के बारे में हमें बार–बार  समझाया  था ।  उनका  साथ मुझे अच्छा लगता था ।उनकी गोदी में बैठकर मैंने सच्चाई और ईमानदारी का पाठ पढ़ा । उनकी छाया में मैंने जीवन को ठीक से जीना सीखा । सही और ग़लत का ज्ञान उन्होंने ही मुझे करवाया था ।  और मैं इसे कभी नहीं भूला । उनके दिखाए मार्ग पर चल कर ही मैंआज जहाँ हूँ , वहाँ पहुँचा । फिर मेरी शादी हो गई । और यहाँ से मेरे जीवन में मुश्किलों ने प्रवेश किया । मेरी पत्नी पढ़ी–लिखी किंतु बेहद महत्वाकांक्षी थी ।  उसकी  मानसिकता  मुझसे अलग  थी ।  वह  जीवन में सफल होने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी । और ‘ सफलता ‘ की उसकी परिभाषा भी मेरी परिभाषा से बिलकुल मेल नहीं खातीथी । झूठ बोलकर , फ़रेब करके , दूसरों का हक़ मार कर आगे  बढ़ने को भी वह जायज़ मानती थी । उसके लिए अवसरवादिता ‘ दुनियावी ‘ होने का दूसरा नाम था ।  ज़ाहिर है , मेरी पत्नी को उनका साथ पसंद नहीं था क्योंकि वे तो छल–कपट से कोसों दूर थे । फिर मेरे जीवन में मेरे बच्चे आए । एक फूल–सा बेटा और एक इंद्रधनुष–सी  बेटी ।  मेरी    ख़ुशी  की  कोई सीमा नहीं रही । मैंने चाहा कि मेरे बच्चे भी उनसे सही जीवन जीने की शिक्षा ग्रहण करें । जीवन में सही और ग़लत को पहचानें । उनके द्वारासिखाए गए मूल्यों और आदर्शों का दामन थाम लें । किंतु ऐसा हो न सका । बच्चे अपनी माँ पर गए । उन्होंने जो सीखा , अपनी माँ से ही सीखा । इन बीजों में मैं पर्याप्त मात्रा में अच्छे संस्कारों की खाद न मिला पाया । बुराई को नष्ट कर देनेवाले कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं कर पाया । नतीजा यह हुआ कि इन पौधे–रूपी बच्चों में बुराई का कीड़ा लग गया ।  मेरे बच्चे उनकी  अच्छाइयों से कुछ न सीख सके । जब मैं घर में नहीं होता , वे घर के एक कोने में उपेक्षित–से  पड़े  रहते ।  मेरे बीवी –बच्चे उनसे...

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मीनू परियानी की लघुकथा ‘माता का जगराता’

सुबह से ही कोठी में रौनक थी। नौकर-चाकर सब दौड़ रहे थे। शाम को माता का जगराता जो होने वाला था। बेटा, बहू सब अति व्यस्त। आज सुबह से माँ कुछ अस्वस्थ थी। बेटा एक बार जाकर माँ का हाल पूछ आया था। बहू तो वैसे  ही अतिव्यस्त थी। ‘माँ को भी...

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रंजना जायसवाल की कहानी ‘कैसे लिखूं उजली कहानी’

रंजना जायसवाल जन्म  : ०३ अगस्त को पूर्वी उत्तर-प्रदेश के पड़रौना जिले में | शिक्षा –गोरखपुर विश्वविद्यालय से “’प्रेमचन्द का साहित्य और नारी-जागरण”’ विषय पर पी-एच.डी | प्रकाशन –आलोचना ,हंस ,वाक् ,नया ज्ञानोदय,समकालीन भारतीय साहित्य,वसुधा,वागर्थ,संवेद सहित राष्ट्रीय-स्तर की सभी पत्रिकाओं तथा जनसत्ता ,राष्ट्रीय सहारा,दैनिक जागरण,हिंदुस्तान इत्यादि पत्रों के राष्ट्रीय,साहित्यिक परिशिष्ठों...

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संजीव ठाकुर की बाल-कथा ‘डरपोक’

संजीव ठाकुर सीतेश पूरे हॉस्टल में बदनाम था। उसकी बदनामी इस बात में थी कि वह न तो कभी ठीक से नहाता था, न ही ढंग से कपड़े पहनता था और न ही बिस्तर ठीक करता था। उसकी किताबें-कापियाँ वगैरह भी जैसे-तैसे ही रहती थीं। वह कभी भी समय पर...

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आशीष श्रीवास्तव की लघु कथा ‘तबीयत’

आशीष श्रीवास्तव पिछले एक सप्ताह से राकेश कार्यालय आता और अपने कार्यालयीन सहयोगी नरेश को काम में सहयोग करने के लिए कहता, फिर बहुत-सा काम बताकर चला जाता। कहता : पिताजी की तबियत ठीक नहीं है उन्हें दिखाने जाना है, भाई संभाल ले। नरेश  ने संवेदनशीलता और गंभीरता दिखाई और...

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सुशान्त सुप्रिय की कहानी ‘मिसफिट’

सुशान्त सुप्रिय मार्फ़त श्री एच. बी. सिन्हा , 5174, श्यामलाल बिल्डिंग , बसंत रोड, ( निकट पहाड़गंज ) , नई दिल्ली – 110055 मो:  8512070086 ई-मेल: sushant1968@ gmail.com उसका सिर तेज़ दर्द से फटा जा रहा था । उसने पटरी से कान लगा कर रेलगाड़ी की आवाज़ सुननी चाही । कहीं कुछ नहीं था । उसने जब-जब जो जो चाहा, उसे नहीं  मिला । फिर आज  उसकी  इच्छा   कैसे  पूरी हो सकती थी । पटरी  पर लेटे-लेटे उसने कलाई-घड़ी देखी ।  आधा घंटा ऊपर हो चुका था पर इंटरसिटी एक्सप्रेसका कोई अता-पता  नहीं  था । इंटरसिटी एक्सप्रेस न सही , कोई पैसेंजर गाड़ी ही सही । कोई मालगाड़ी ही सही । मरने वाले को इससे क्या लेना-देना  कि  वह  किस गाड़ी  के  नीचे  कट  कर  मरेगा ।  उसके सिर के भीतर कोई हथौड़े चला रहा था । ट्रेन उसे क्या मारेगी, यह सिर-दर्द ही उसकी जान ले लेगा — उसने सोचा । शोर भरी गली में एक लंबे सिर-दर्द  का नाम ज़िंदगी है । इस ख़्याल से ही उसके मुँह में एक कसैला स्वाद भर गया । मरने के समय मैं भी स्साला फ़िलास्फ़र हो गया हूँ — सोचकर वह पटरी पर लेटे-लेटे ही मुस्कराया । उसका हाथ उसके पतलून की बाईं जेब में गया । एक अंतिम सिगरेट सुलगा लूँ । हाथ विल्स का पैकेट लिए बाहर  आया  पर  पैकेट  ख़ाली  था ।  दफ़्तर से चलने से पहले ही उसने पैकेट की अंतिम सिगरेट पी ली थी — उसे याद आया । उसके होठों पर गाली आते-आते रह गई । आज सुबह से ही दिन जैसे उसका बैरी हो गया था ।सुबह पहले पत्नी से खट-पट हुई । फिर किसी बात पर उसने बेटे को पीट दिया । दफ़्तर के लिए निकला  तो  बस...

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দেবায়ন কোলের অনুগল্প ‘ভালোবাসার রঙ’

বিয়ের পরে একবারই মাত্র দোল খেলার সুযোগ হয়েছিল সুতপার। অর্ণব পেছন থেকে সেদিন হঠাৎ করে তার শ্যামলা রঙের মুখটাতে আবীর মাখিয়ে বলেছিল, “শুভ দোলযাত্রা,তপা। এরকমই সুন্দর থেকো সবসময়।” লজ্জায় আবীরের থেকেও লাল হয়ে উঠেছিল সেদিন সুতপা। মুখে বলেছিল, “আমার রঙ মাখতে ভালো লাগে না, জানো না?” অর্ণব তাকে আলিঙ্গনাবদ্ধ করে...

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দোলা সেনের গল্প ‘বসন্ত –রাগ’

শনির রাতে দমকা ঝড় উঠল। হালকা, খুব হালকা ধারাপাত। তাতেই রবিবারের সকালটায় বেশ শিরশিরে আমেজ। ছটার সময় নিত্যকার প্রাতঃভ্রমণে যাই যাই করছি, সৌরভের আধ-ঘুমন্ত গলা কানে এল, – “ঘণ্টাখানেকের মধ্যে বেরোতে পারবে ?” তা, ‘পাগলা খাবি ? না, আঁচাবো কোথায় !’ ঝড়ের বেগে স্নান, টোস্ট সহযোগে চা, তারপরেই গাড়ী —-...

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सेवा सदन प्रसाद की तीन लघुकथाएं

  सेवा सदन प्रसाद एक हिंदी लेखक मोबाइल की घंटी बजी ।ऑन करने पे आवाज आई — “हेलो,  सुधीर जी नमस्कार ।” ” नमस्कार भाई साहब ।” ” सुधीर जी, आपकी कहानी बहुत अच्छी लगी “कैसी कहानी  ? ” सुधीर जी ने थोड़ा आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा । ”...

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বর্নালী চন্দর গল্প ‘নতুন অধ‍্যায়’

            বর্নালী চন্দ ঘুম থেকে উঠে রাতুল দেখল বেশ বেলা হয়ে গিয়েছে। ঘড়ির দিকে চোখ পড়তেই লাফিয়ে উঠল, বাপ্ রে আটটা বেজে গিয়েছে। সকাল ছটার অ্যালার্ম দিয়েছিল মোবাইলে, কখন যে বেজে বেজে বন্ধ হয়ে গিয়েছে, বুঝতেই পারে নি। আসলে মায়ের ডাক শুনে উঠতে অভ‍্যস্ত ও,...

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उजाले की संभावना तलाशती कहानियां

  किताब कहानी संग्रह : बबूगोशे लेखक : स्वदेश दीपक प्रकाशक :   जगरनॉट बुक्स मूल्य : 250 रुपए सत्येेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव इस साल 7 जून को कथाकार स्वदेश दीपक की गुमशुदगी के ग्यारह साल पूरे हो गए। इन ग्यारह सालों  में उन्हें चाहने वाले ठीक वैसे ही बेचैन रहे, जैसी...

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विष्णु कुमार की कहानी ‘भैंस चोर’

रात का अंधेरा चारों तरफ, फैल चुका था, गांव के सभी लोग सो चुके थे।…चारों तरफ झींगुरों और मेंढकों की आवांजें गूंज रही थीं। मैं भी अपनी चारपाई पर गहरी नींद में सो रहा था, लेकिन मेरी आदत है कि सोने से पहले पानी न पी लूं तो रात को...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कहानी ‘अपना कन्धा, अपनी लाश’

सत्येंद्र प्रसाद  श्रीवास्तव विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां-कविताएं प्रकाशित। एक कविता संग्रह ‘रोटियों के हादसे’ प्रकाशित पेशे से पत्रकार। फिलहाल टीवी न्यूज़ चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत संपर्क फ्लैट नंबर जी-2, प्लॉट नंबर 156, मीडिया एंक्लेव, सेक्टर 6 वैशाली,ग़ाज़ियाबाद उत्तर प्रदेश पिन -201012 ईमेल—satyendrasri@gmail.com मोबाइल–9811986069 बाइक सवार औंधे मुंह सड़क...

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संजीव ठाकुर की बाल कथा ‘जालिम सिंह’

स्कूल का चपरासी बच्चों को बहुत बदमाश लगता था। बच्चे उसे जालिम सिंह नाम से पुकारते थे। जालिम सिंह स्कूल के बच्चों पर हमेशा लगा ही रहता था। किसी को मैदान में दौड़ते देखता तो गुस्साता, झूले पर अधिक देर झूलते देखता तो गुस्साता। कोई बच्चा फूल तोड़ लेता तब...

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शहादत ख़ान की कहानी वेलेंटाइन डे

शहादत शिक्षा-           दिल्ली विश्वविद्यालय के भीमराव अंबेडर कॉलेज से बी.ए. (विशेष) हिंदी पत्रकारिता। संप्रीति-         रेख़्ता (ए उर्दू पोएट्री साइट) में कार्यरत। मोबाईल-        7065710789 दिल्ली में निवास। कथादेश, नया ज्ञानोदय, समालोचना, कथाक्रम, स्वर्ग विभा, परिवर्तन, ई-माटी और जनकृति सहित आदि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। वेलेंटाइन-डे...

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समीर कुमार ठाकुर की कहानी “लव यू डैड”

समीर कुमार ठाकुर समीर नवोदित कथाकार हैं। लिटरेचर प्वाइंट में उनकी ये पहली कहानी प्रकाशित हो रही है। उम्मीद है वो और बेहतर लिखेंगे। ‘पापा..पाप..’ राहुल गुस्से में चिल्लाते हुए पापा केे कमरे में आया, ‘नेट क्यों नहीं चल रहा है पाप? मैंने आप से कहा था कि आप ठीक...

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डाॅ. मृणालिका ओझा की कहानी ‘पिता, जाने के बाद’

  उस वक्त भैया गए थे, पिता जी के साथ, उनके अंतिम प्रवास पर। नाव पर नाविक भी था और जीजा जी भी। आज बीच संगम, नदियों के मंझधार, वे पिताजी को पूरी तरह छोड़ आएंगे। अब वे पिताजी की अत्यधिक पानी खर्चने की आदत से परेशान नहीं होंगे। बीच...

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सविता मिश्रा की दो लघुकथाएं

एक “क्या हुआ बेटा ? तेरी आवाज क्यों काँप-सी रही हैं ? जल्दी से बता ..हुआ क्या ..?” “माँ वो गिर गया था सुबह-सुबह…।” “कैसे, कहाँ गिरा, ज्यादा लगी तो नहीं ? डॉक्टर को दिखाया! क्या बताया डॉक्टर ने ?” “न माँ ज्यादा तो नहीं लगी, पर डॉक्टर कह रहे...

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डॉ संगीता गांधी की लघुकथा ‘गंवार’

“ए, ये क्या कर रहा है ?” खेत के कोने में दीर्घशंका को  बैठे रमेश को देख  चौधरी साहब ने कहा । चौधरी साहब  मुम्बई में रहते थे ।गांव में भी घर था तो दो -चार साल में गांव का चक्कर लगा लेते थे । ……….गांव वाले उनकी नज़र में...

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वर्जनाओं को तोड़ती कहानियों का संग्रह ‘इश्क़ की दुकान बंद है’

पुस्तक समीक्षा सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव जिस्म मुहब्बत की प्रेरक तत्व है। जब किसी को देखकर दिल धड़क उठता है, उसकी मुहब्बत में पागल हो जाता है तो इसका मतलब है कि आंखों ने जिस खूबसूरती को देखा, दिल उसका दीवाना हो गया। इस बात से इनकार करना सच्चाई को नकारना...