सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘दो दूना पांच’

     कैसा समय है यह / जब भेड़ियों ने हथिया ली हैं / सारी मशालें /                               और हम निहत्थे खड़े हैं … जैसे पहाड़ से एक बहुत बड़ा पत्थर तेज़ी से लुढ़कता हुआ सीधा...