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मनी यादव की दो ग़ज़लें

एक तल्खियां खून की विरासत है छोड़ ना यार ये सियासत है मुफ़लिसी जा रही है महफ़िल में मुफ़लिसी को कफ़न की दावत है हुस्न तेरा मिटा के दम लूंगा सांस तुझसे मेरी बगावत है वाकया ये समझ नहीं आता रात को दिन से क्यों शिकायत है भागता क्यों है...

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পামেলা চক্রবর্তীর কবিতা “একটি রূপকথার জন্ম!”

   সব শব্দের অর্থ থাকলে অর্থহীন শব্দেরা নিঃশব্দ হয়ে যায়।           “হাজার কথা”র ভীড়…                     নিঃশব্দ হলে মন্দ কি? তবে ,সেইদিন, এক ‘সাধারণ’ছেলে….                     যখন এক ‘অ’ মেয়ের...

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ময়ূরী পাঁজার পাঁচটি অনুগল্প

১ তিথির শাড়ি ও গয়নার কালেকশন দেখে সবাই হিংসে করে,  সে  বাড়ির লোকজন হোক বা পার্টিতে.. কতজন ঠোঁট বেঁকায় হিংসায়!! কেউ জানে না___ অন্যের গোছানো সংসারে স্বামী সন্তানদের দেখে  কত রাত বালিশের বুক ভেজে। ২ ” উম্ ম্ ম্, তন্দুর চিকেন হচ্ছে, রুমালী রুটি দিয়ে খাব। এইইই ছোকরা এখানে দিয়ে...

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मीनू परियानी की लघुकथा ‘मज़बूरी’

आज राधा को कुछ ज्यादा ही देर हो गयी थी मै दो बार बाहर जा कर देख आई थी पर उसका दूर दूर तक पता नही था. राधा मेरी कामवाली बाई थी जो कभी कभी अपनी बेटी को भी काम पर ले आती थी। रानी उसकी बेटी जिसकी उसने छोटी उम्र में...

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रागिनी शर्मा “स्वर्णकार” की तीन कविताएं

सरलता ही है जीवन सरल सरल सांसों से बनता सुन्दर , मृदुमय जीवन ! सहज सहज बातों से बनता सहज भाषा साधन ! सहज ही होते हैं सुख के आनन्दित क्षण जब पाते हृदय का सरल स्पंदन !! वृहद आकार पाते जब जुड़ते सरलता से सरल सरल लघु कण !...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘विरासत’

श्रीकांत जिस दिन अठारह साल का हुआ , उसी दिन उन्मादियों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी । देश में जगह-जगह दंगे शुरू हो गए जिनमें निर्दोष लोग मारे जाने लगे । उस दिन श्रीकांत देर तक रेडियो और टी.वी. पर ख़बरें देखता-सुनता रहा । आज़ाद भारत के इतिहास...

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संजीव ठाकुर की तीन बाल कविताएं

 दाना दे दो          दाना दे दो चिड़िया को ओ! मेरी नानी और वहीं डालो बर्तन में थोड़ा-सा पानी। आएगी तो खाएगी चिड़ियों की रानी खुश होकर उड़ जाएगी पीकर वह पानी। फिर भेजेगी औरों को वह लेने दाना, पानी खुश हो जाओगी, देखोगी उनको पीते पानी! दीपों का त्योहार दीपों...

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प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

आज का दिन शताब्दियों ने लिखी है आज अपने वर्तमान की आखिरी पंक्ति आज का दिन व्यर्थ नहीं होगा चुप नहीं रहगी पेड़ पर चिड़िया न खामोश रहेंगी पेड़ों की टहनियाँ न प्यासी गर्म हवा संगीत को पियेगी न धरती की छाती ही फटेगी अंतहीन शुष्कता में न मुरझायेंगे हलों...

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लकी निमेष की दो ग़ज़लें

एक पसीना वो बहाकर देख बच्चों को खिलाता है जला के खून सारा दूध वो उनको पिलाता है अदाकारी गरीबों में गरीबी ला ही देती है जिसे ग़म हजारो हैं वही हँसकर दिखाता है अमीरों सीख लो हुनर तुम भी गरीबों का कि आँसू आँख में होते हुए कैसे छिपाता...

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स्मिता सिन्हा की तीन कविताएं

1. आलसी सी पड़ी उबासियों में जब जीवन ऊंघता है बंद आँखों में वह गढ़ती है कुछ रेखाचित्र जैसे लाल फूलों वाला एक पेड़ अमलतास दूर तक बिछी कोमल हरी दूब दूध से चमकते बादल जो पहुँचते हों सीधे चाँद तक गीली गीली सी बारिश की कुछ बूँदें और ऐसा...

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रंजीत राज की तीन कविताएं

दर्द से रिश्ते दर्द से रिश्ते कुछ ऐसे बने मेरे कुछ टूट गये कोरे सपने मेरे यही तो मेरी जमा-पूँजी है खाली आसमाँ खाली-खाली जमीं है दर्द सहना है चुप ही रहना है मैं कवि हूँ जब तक जीना है पल-पल मरना है पीड़ाओं का मुकुट किसे दिखलाऊँ समंदर दुविधाओं...

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राकेश कायस्थ का व्यंग्य ‘मत रोइए मी लॉर्ड…’

राकेश कायस्थ मी लार्ड का सादर अभिवादन। आप इस देश के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायधीश हैं और मैं इस देश का एक अदना सा नागरिक। मेरे बाप-दादा कहा करते थे—- समझदार वही है जो कोर्ट-कचहरी के चक्कर से दूर रहे। कानून के रखवाले बहुत रूलाते हैं। बचपन में जो...