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श्रुति फौगाट की कविता ‘लम्हे’

कभी यूँ हुआ था कि सोचा था वक़्त को गुज़रने ही ना दूं और उसे पिरोने लगी कच्चे धागों में लम्हा लम्हा पता ही ना चला कब घर भर गया और नये लम्हे बाहर दरवाजे पे खड़े रहे आज देखा तो सोचा कुछ पुराने लम्हों को आज़ाद कर दूं नये...

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सुशांत सुप्रिय की तीन कविताएं

सुशांत सुप्रिय इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं देह में फाँस-सा यह समय है जब अपनी परछाईं भी संदिग्ध है ‘ हमें बचाओ , हम त्रस्त हैं ‘ — घबराए हुए लोग चिल्ला रहे हैं किंतु दूसरी ओर केवल एक रेकॉर्डेड आवाज़ उपलब्ध है — ‘ इस रूट की...