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रवि कुमार गुप्ता की कहानी ‘बेपटरी’

  रवि कुमार गुप्ता नवभारत (भुवनेश्वर) में संवाददाता सेंट्रल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई संपर्क : 9471222508, 9437767065 रात का सन्नाटा. सङकें वीरान. स्टेशन की ओर तेजी से बढ़ रहा था. ट्रेन छूट ना जाए कहीं! इस डर ने मेरी रफ्तार बढ़ा दी थी. थैंक गॉड! सही टाइम पर स्टेशन पहुंच गया....

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विजय ‘आरोहण’ की नौ कविताएं

सारंडा, जंगल और आदिवासी,जल, जंगम और प्रतिरोध की कवितायें 1. हमारे पहाड़ों के बच्चे हमारे पहाड़ों के बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते है वह छुप्पम-छुपाई खेलते शाल के पेड़ों के पीछे छिप जाते हैं वह तीर-धनुषों से निशाना साध रहे हैं इसके लिए वह एक बिजुका बनाते हैं और दनदनाती आती है...

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कुमार वीरेंद्र की पांच कविताएं

भोट मुझे याद है वह दिन, जब बाबा ने कहा था तू पहली बार भोट देने जा रहा, तो बेटा किसी नेता को देखकर नहीं, अपने जंग लग रहे हल को देखकर, भोट देना कि बेटा, जब तक नेताओं को, सिर्फ़ नेताओं को देखकर, भोट दिए जाते रहेंगे हत्यारे कबूतर...

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विजयानन्द विजय की दो लघुकथाएं

पेंटिंग ट्रेन का एसी कोच — जिसमें आम तौर पर सम्पन्न लोग ही यात्रा करते हैं।आमजनों के लिए तो यह शीशे-परदे और बंद दरवाजों के अंदर की वो रहस्यमयी दुनिया है, जिसके बारे में वे जानते तक नहीं हैं। एक परिवार आमने-सामने की छ: सीटों पर अपने पूरे कुनबे के...

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क़ैस जौनपुरी की कहानी ‘ए… चश्मे वाले…!’

ट्रेन रुकी. बहुत सारे लोग छोटे से डिब्बे में चढ़े. कुछ उतरे भी. एक साथ चढ़ने-उतरने में कुछ लोग आपस में टकराए भी. कुछ अपना गुस्सा पी गए. कुछ ने कुछ नहीं कहा. वहीं एक से रहा नहीं गया. वो उतरने ही वाला था कि एक चढ़ने वाले से टकरा...

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परितोष कुमार ‘पीयूष’ की दो कविताएं

इंसानी शक्ल वाले गिद्ध नन्हें कदमों से परचून की दूकान जाते वक्त जब वो खींच ली गई होगी सड़क किनारे से खर-पतवारों के बीच सूनसान जंगली खेतों में कितनी छटपटाई होगी कितनी मिन्नतें माँगी होगी कैसा लगा होगा उसे जब उसका सुनने वाला कोई नहीं होगा उसकी अपनी ही आवाज...

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निर्मल गुप्त की तीन कविताएं

निर्मल  गुप्त लोग घर वापस जा रहे हैं लोग घर वापस जा रहे हैं कंधे पर लटकाये बेलनाकार टिफिन जिसमें अब भी पड़े हैं रोटी के कुछ सख्त कुतरे हुए कोने भूख चाहे जैसी भी हो बचा रहता है फिर भी कुछ न कुछ। लोग घर वापस जा रहे हैं...