शिवदयाल की तीन कविताएं

प्रतीक्षा प्रियजन-स्वजन सारे छूट गए, मेरी सूनी-रातों के तारे हाय बुझ गए ! इस एकाकी अन्धियारे पथ पर एक टिमटिमाते प्रकाश –स्तम्भ के नीचे तब भी प्रतीक्षा करती- सी मैं क्या जानूँ कि तुम ? हाँ तुम ही खड़ी हो ! प्रतिबद्धता कुछ नहीं कहीं कुछ नहीं इस उबड़- खाबड़ अंतहीन...