Tagged: Water

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सुधीर कुमार सोनी की छह कविताएं

बेमिसाल मुहब्बत पानी के गहरे तल में पत्थर है पत्थर के गहरे तल में पानी है पानी है पत्थर है अटूट प्रेम है यह शायद कोई नहीं जानता कि इनके प्रेम की मिसाल दी जाए धीरे-धीरे कटकर प्रेम में सब कुछ मिटा देना पत्थर के सिवाय कोई नहीं जानता युगों-युगों से...

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केशव शरण की 15 कविताएं

क्या कहूंगा क्या मैं कह सकूंगा मालिक ने अच्छा नहीं किया अगर किसी ने मेरे सामने माइक कर दिया क्या मैं भी वही कहूंगा जो सभी कह रहे हैं बावजूद सब दुर्दशा के जो वे सह रहे हैं और मैं भी क्या मैं भी यही कहूंगा कि आगे बेहतरीन परिवर्तन...

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वेद प्रकाश की तीन प्रेम कविताएं

एक लंबी प्रेम कविता तुम धूप में अपने काले लंबे बाल जब-जब सुखाती हो सूरज का सीना फूल जाता है और पूरे आकाश पर छा जाता है मैंने देखा है गुलमुहर के नीचे बस का इंतजार करते हुए बस आए या न आए तुम्हारी छाया गुलमुहर को चटख कर देती...

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डॉ छवि निगम की पांच कविताएं

स्वतंत्रता एक भेड़ के पीछे पीछे खड्ढे में गिरती जाती अंधाधुंध पूरी कतार को भाईचारे को मिमियाती पूरी इस कौम इतनी सारी ‘मैं’ हम न हो पायीं जिनकी अब तक, उनको… चंहु ओर होते परिवर्तन से बेखबर चाबुक खाते आधी आँखों पे पड़े  परदे से सच आंकते झिर्री भर साम्यवाद...

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विजय ‘आरोहण’ की नौ कविताएं

सारंडा, जंगल और आदिवासी,जल, जंगम और प्रतिरोध की कवितायें 1. हमारे पहाड़ों के बच्चे हमारे पहाड़ों के बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते है वह छुप्पम-छुपाई खेलते शाल के पेड़ों के पीछे छिप जाते हैं वह तीर-धनुषों से निशाना साध रहे हैं इसके लिए वह एक बिजुका बनाते हैं और दनदनाती आती है...

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डॉ. राकेश जोशी की चार ग़ज़लें

1 आदमी के लिए ज़िंदगानी तो लिख धूप कोई कभी आसमानी तो लिख छुट्टियों में भला, जाएं बच्चे कहाँ हर किसी के लिए एक नानी तो लिख हो शहर में कोई एक ऐसी नदी जिसमें सबको मिले, थोड़ा पानी तो लिख आज फिर बैठकर कोई कविता सुना और जनता हुई...

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वहाँ पानी नहीं है : दर्द को जुबान देती कविताएँ

पुस्तक समीक्षा वीणा भाटिया ‘वहाँ पानी नहीं है’ दिविक रमेश का नवीनतम कविता-संग्रह है। इसके पूर्व इनके नौ कविता-संग्रह आ चुके हैं। ‘गेहूँ घर आया है’ इनकी चुनी हुई कविताओं का प्रतिनिधि संग्रह है। गत वर्ष ‘माँ गाँव में है’ संग्रह आया और बहुचर्चित हुआ। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने...

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विमलेश त्रिपाठी की पांच कविताएं

 सपना गाँव से चिट्ठी आयी है और सपने में गिरवी पड़े खेतों की फिरौती लौटा रहा हूं पथराये कन्धे पर हल लादे पिता खेतों की तरफ जा रहे हैं और मेरे सपने में बैलों के गले की घंटियाँ घुँघरू की तान की तरह लयबद्ध बज रही हैसमूची धरती सर से...

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मार्टिन जॉन की पांच कविताएं

 बची रहे चिड़िया    चख रही है चिड़िया खिला रही है बच्चों को पेड़ के पके –अधपके फल तृप्ति का मधुर गीत गाते हुए अपनी हरी –भरी बाहों से संभाले फलों की टोकरी गुनगुना रहा है पेड़  क़ुर्बानी वाली कविता मौन रहकर सबकुछ लुटा देने का ज़ज्बा दिखाते हुए |  ...

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भरत प्रसाद की कहानी ‘देख तमाशा पानी का’

यह पानी भी न, कमाल का मायावी है भाई। पूछो तो कहाँ नहीं घुसा हुआ है ? जीव में, जानवर में, मिट्टी और पत्थर पेड़-पालों, बंजर-धरती, आकाश यहाँ तक कि हवा का भी पीछा नहीं छोड़ता। होगी हवा उड़नछू, पानी उसका भी बाप है। वैसे पानी है बेरंगा, मगर इसके...

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शहंशाह आलम की पांच कविताएं

राग : पाँच चित्र एक उस लड़की ने तीली जलाई माचिस की तीली की ज़रा-सी रौशनी ने आग का नया गीत ईजाद किया   तीली की वही आग हमारे भीतर बची है और सूरज के भी।   दो आज जिस भी द्वार को खोला मैंने उसमें चुप्पी नहीं मिली अनंत...

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राज्यवर्द्धन की चार कविताएं

पक्ष जो लेखक,कलाकार,वैज्ञानिक,अधिकारी उद्योगपति एवं बुद्धिजीवी हिन्दू हैं और हमारे पक्ष में नहीं हैं वे कम्युनिस्ट हैं या फिर दरबारी हैं कांग्रेस के …और जो मुस्लिम हैं हमारे पक्ष में नहीं हैं वे पाकिस्तानी हैं सिर्फ मेरी ही विचारधारा देश की सभ्यता से जुड़ी है पवित्र है देश की संस्कृति...

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उमेश कुमार राय की दो कविताएं

सपना देख रहा हूं मैं बदल रहा है देश छू रहा है विकास के नये आयाम गरीबी का कहीं कोई नामोनिशां नहीं माँ-बहन-बच्चों के शरीर पर पूरे वस्त्र बच्चा नहीं तरसता बचपन को बूढ़े नहीं तड़पते तीमारदारी को महफूज हैं माँ-बहनें घर में भी बाहर भी, उन्हें डर नहीं निर्भया...

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‘रेजाणी पानी’ : इस पूरे समय की अंतर्व्याधि प्रकट करती कविताएँ

पुस्तक समीक्षा शहंशाह आलम समकालीन हिंदी कविता की स्वरलहरियाँ ऐसी हैं, जैसे हम पेड़ों के हरे पत्तों से जगमग किसी प्रदेश से गुज़रते हुए उन पेड़ों का जो संगीत कानों को सुनाई दे और मंत्रमुग्ध हम उसी पेड़ों के अनुभवों से भरे प्रदेश का होकर रह जाने के एहसास से...

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ऋचा साकल्ले की पांच कविताएं

 काश!  सूरज की जुबान होती काश सूरज की जुबान होती वो बताता हमको प्रकृति नहीं करती अंतर उसने दिया है सबको अपना-अपना वजूद वो बताता हमको इंसान की परिभाषा में जितना पुरुष है शामिल उतना स्त्री भी है शामिल न कोई प्रथम, न कोई द्वितीय दोनो अद्वितीय न कोई बड़ा,...

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शुक्ला चौधरी की 5 कविताएं

शुक्ला चौधरी युद्ध न मिसाइलें दाग न अस्त्र दिखा तू देखता जा युद्ध आरंभ हो चुका है एक बूंद पानी के लिए एक और युद्ध की तैयारी रात सरपट दौड़ रही है पानी के लिए बरतन खाली कर रही है औरतें/रात दो बजे सार्वजनिक नल से पतली सी धार पानी...