तन्वी सिंह की कहानी ‘छोटी सी मुलाक़ात’

आज अगर लास्ट मेट्रो मिल जाए बस। कल से कैसे भी जल्दी निकालूँगा। चाहे साला बॉस कुछ भी कहे। लोग वैलेंटाइन वीक मनाने में बिज़ी है। हम साला गर्ल्फ़्रेंड की जगह बॉस को पटा रहे है। ज़िन्दगी ही ख़राब है। दीपक मन ही बड़बड़ता और भागता हुआ मेट्रो स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचा।

मेट्रो के दरवाज़े बंद होने का अलार्म बज चुका था कि अचानक दरवाज़ा दोबारा खुले। दीपक भागकर मेट्रो में घुस गया। वो भगवान को धन्यवाद ही दे रहा था कि उसकी नज़र अपने आसपास पड़ी। वो जल्दी में महिला कोच में चढ़ गया था।  कोच में ३-४ लड़कियाँ थीं, जो उसे इस तरह देख रही थी, जैसे उसने किसी को छेड़ दिया हो।

तभी एक लड़की तपाक से बोल पड़ी, ‘ये महिला कोच है, आप आगे चले जाइए।’

‘सॉरी, मैं जल्दी से चढ़ गया’ दीपक ने माफ़ी माँगी।

‘कोई बात नहीं हो जाता है।’ लड़की ये कहकर वापस अपने फ़ोन में बिज़ी हो गयी और दीपक अगले कोच में चला गया।

अगला स्टेशन साकेत है, दीपक उठा और थका हुआ सा बाहर आया। उसने देखा वो लड़की भी उसी स्टेशन पर उतरी। वो फिर से संभल गया। दीपक स्टेशन से बाहर आया तो उसने देखा दूर तक कोई ऑटो नहीं था। वो लड़की आगे जाकर खड़ी हो गयी, जो मेट्रो से उसके साथ बाहर आयी थी। वहाँ दूर तक बस वही दो लोग थे। लड़की भी दूसरे तरफ़ स्ट्रीट लाइट के पास खड़ी हो गयी। बहुत देर हो चुकी। रात के ११:३० बज चुके है। दीपक ने देखा वो लड़की फ़ोन पर किसी से बात कर रही है।

लड़की को दीपक ने ठीक से देखा। साँवली ,पतली। ज़्यादा ख़ूबसूरत तो नहीं थी पर उसने ख़ुद को बहुत अच्छे से मेंनटेन किया हुआ था। उसके कपड़े भी उस पर बहुत फ़ब रहे थे। जैसे वो अच्छे से जानती थी, कि उस पर क्या और कौन सा रंग ख़ूबसूरत लगता है।

काश! ये लड़की ही मिल जाए। भगवान कितनी हॉट लग रही है ये इस सिम्पल सूट में। इसका कोई बॉयफ़्रेंड ना हो, बस।

कुछ समय इंतज़ार करने के बाद उसे एक रोशनी दिखाई दी। वो दूर से बाइक लग रही थी लेकिन वो ऑटो था।दीपक उसे रोक पाता उससे पहले ही लड़की ने ऑटो रोक लिया। साला आज का दिन ही ख़राब है। वेलेंटाइन का पहला दिन इससे बुरा और क्या होगा। इस सूनसान रोड पर मैं और दूर तक ये तन्हाई। आज ही ऑटो की स्ट्राइक भी होनी थी। वो लड़की उसे भी इसी ऑटो को रोकना था। दीपक अपनी क़िस्मत को कोसता हुआ ख़ाली रोड पर चल दिया था। तभी एक ऑटो उसके पास आकर रूका। उसने देखा ऑटो में वही लड़की थी, जो मेट्रो स्टेशन के बाहर खड़ी थी। जिसने उससे घर पर समय से पहुँचने की आख़िरी उम्मीद भी छीन ली थी।

लड़की ने कहा- हमें अभी पता चला ऑटो का स्ट्राइक है, आपको कहाँ जाना है।हम आपको छोड़ देते है।

दीपक ख़ुश हो गया और झट से बैठ गया। दोनों बहुत देर तक ख़ामोश रहे। ख़ामोशी को तोड़ते हुए दीपक ने पूछ लिया, ‘आप शहर में नई हैं क्या?

नहीं, मैं नयी नहीं हूँ। मैं दिल्ली से ही हूं।

आप कहां से हैं। लड़की ने बातचीत आगे  बढ़ाई।

मैं आगरा से हूँ, यहाँ e-commerce कम्पनी में असिस्टेंट मैनेजर हूँ। अभी 1 साल हुआ है। वैसे आप क्या करती है। आपको डर नहीं लगा किसी अनजान इंसान को ऐसे ऑटो में बैठाने में। आप दिल्ली से है, कोई आपको लेने नहीं आया। आपका बॉयफ़्रेंड ??

मेरा कोई बॉयफ़्रेंड नहीं है।

आई मीन,  आपके पापा या भाई..दीपक ने अपनी बात को सम्भालते और मन ही मन ख़ुश होते हुए पूछा।

लड़की हँसने लगी, आपको ऐसा क्यों लगता है। दिल्ली की हर लड़की का बॉयफ़्रेंड होना ज़रूरी है। मैं जॉब इंटर्व्यू के लिए गयी थी। वैसे मैं दिल्ली की लड़की हूँ, तुम्हें देखकर लगा था। तुम अच्छे लड़के हो ऐसा कुछ नहीं करोगे।

दीपक ने झट से पूछा…कौनसी कम्पनी?

लड़की ने अजीब तरीक़े से देखा…आप क्या करेंगे जानकर। तभी लड़की ने ऑटो रोकने के लिए कहा, मेरा घर आ गया है। भैया कितना पैसा हुआ।

नहीं मैं दे दूँगा आप जाइए। वैसे आपका नाम?? दीपक ने बहुत उत्सुक होते हुए पूछा।

अगर दुबारा मिले तो नाम बता दूँगी। बाई….

दीपक लड़की को दूर तक जाते हुए देखता रहा। जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हुई। दीपक ने ऑटो वाले को चलने का इशारा किया। दीपक…हे! भगवान प्यार का सप्ताह है। ये तेरा ही इशारा है। जो ये लड़की मुझे आज गुलाब जैसी मिली। शायद आप भी नहीं चाहते मैं अकेला प्यार का दिन सेलीब्रेट करूँ। ऑटो वाले ने उसकी प्रार्थना को रोकते हुए कहा…साहब आप कहाँ उतरोगे।

बस थोड़ा आगे छोड़ दो। ऑटो से उतर दीपक ऑटो वाले को देने के लिए पैसे दिए.

.साहब मैडम अच्छी थी, वरना कोई किसी की मदद नहीं करता।

हाँ आप सही बोल रहे है। दीपक मुस्कुराया और अपने फ़्लैट की तरफ़ चल दिया।।

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