गुलमोहर सी दहकती दोपहर

संजय स्वतंत्र

हर शनिवार, किस्त 17

राजीव चौक पर कुल्हड़ की चाय पीते हुए मुक्ति जीवन की नश्वरता का बोध करा कर चली गई थी। इतनी कम उम्र में वह जीवनदर्शन को खुद में उतार चुकी थी। हैरत होती, जब वह बार-बार बुद्ध की कही गई बातों को बतौर उद्धरण सामने रख देती। वह अक्सर कहती- सर, परिवर्तन प्रकृति का नियम है। प्रकृति में ही मुक्ति का मार्ग है। मगर कहीं माया भी तो है, जो बार-बार अंधेरे से लड़ती है। माया से सब घिर जाना चाहते हैं। मगर उसे कोई नहीं बचाता, जो लड़ रही है खुद से। वह भी उज्ज्वला हो जाना चाहती है, सफेद परी की तरह। क्यों उसे अंधेरे में निर्वासित कर दिया गया।
आकाश अक्सर सोचता और एकाकीपन के बियावान में भटकता। सोशल मीडिया पर उसकी आवाजाही बढ़ गई थी। और लिखना पढ़ना भी। न्यूजरूम में काम खत्म हो जाने के बाद वह अक्सर आभासी दुनिया में खो जाता।
आज आकाश बहुत उदास था। नीला के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आया था। वह उसे छोड़ कर मॉडलिंग की दुनिया में लौट जाना चाहती थी। वह जान गया था कि उसे रोकना मुमकिन नहीं अब। नियति ने उसका अकेलापन निर्धारित कर दिया था। पर क्यों। उसने किसी का क्या बिगाड़ा था। अवसाद से बचने के लिए अक्सर वह खबरों में डूबा रहता।
उस दिन न्यूजरूम में काम करते हुए आकाश की नजर एक समाचार पर टिक गई- रुमानी रिश्ते बेहद पेचीदा होते हैं: दीपिका पादुकोण। ………सच में रिश्ते की सहज व्याख्या की दीपिका ने, उसने सोचा। हेमा मालिनी : बियांड द ड्रीमगर्ल का लोकार्पण करते हुए दीपिका बता रही थी कि ऐसा साथी मिलना मुश्किल होता है जो किसी की सफलता और जुनून को समझता हो। और जब सफल हो जाएं, तब आपके रिश्ते की परीक्षा का समय होता है।
ओह! ये रोमानी रिश्ते। ये कब रुहानी रिश्ते में बदल जाते हैं, आकाश जान गया था। जीवन से मोहभंग हो गया था। शायद इसीलिए। दीपिका की बात दिल को छू रही है- बहुत से लोगों को मेरी सफलता बर्दाश्त नहीं हो पाई। और वे मुझसे दूर हो गए। जिंदगी इसी तरह चलती है। लेकिन जो लोग आपके करीब हैं और आपके लिए मायने रखते हैं, वे यह समझते हैं।
………. तो क्या सच में रोमानी रिश्ते बेहद जटिल होते हैं। आकाश ने सोचा, अगर स्त्री-पुरुष के बीच दोस्ती के साथ आदर भी हो तो यह सहज भी हो सकते हैं। पर यहां तो कुछ भी न था। फिर आकाश रिश्ते को निभा भर रहा था नीला से। क्या जिंदगी यूं ही चलती रहेगी। नीला से संवाद कम होने के कारण आकाश अक्सर गुम रहता।
आभासी दुनिया में उसने अपनी अलग दुनिया बसा ली थी। एक दिन वहीं मिल गई थी- माया। अंधेरे से लड़ती हुई, अपने वजूद को तलाशती हुई माया। अपने भावों में डूबी माया। उसकी कविताओं को पढ़ते हुए आकाश ने ही उसे मैत्री संदेश भेजा था, जिसे उसने सहज ही स्वीकार कर लिया था। आकाश ने स्त्री मन को उकेरती उसकी कविताओं में उसके मन का सूनापन पाया। वह तमाम जद्दोजहद के बीच प्रेम के नए प्रतिमान गढ़ना चाहती है। द्वंद्व में उलझी माया अपने सूनेपन की देहरी को पार कर उज्ज्वला बन जाना चाहती है। हां, यही तो नाम है उसका।
अंधेरे से बार-बार लड़ती माया यानी उज्ज्वला को आकाश ने देर से जाना। किसी लौकिक प्रेम में मात खा चुकी माया, अलौकिक प्रेम की चाह लिए एक सच्चे मित्र की तलाश में भटकती अब उज्ज्वला बन चली आई थी मित्रता का संदेश पाकर। लंबे संवादों के बाद एक दिन उसी ने कहा- मैं टॉर्च लेकर आप जैसा ही मित्र ढूंढ रही थी। कहां थे आप अब तक?
……….. एक महीने की मित्रता के दौरान आकाश एक सदी जी चुका था। उसका दिल करता कि कई सदियां यूं ही बीत जाए और उज्ज्वला उसके हृदय के अंधकारमय अरण्य में उजाला भरती रहे। मगर क्या यह हमेशा के लिए मुमकिन होगा। जो भी हो अब आसमान में उज्ज्वला के निर्मल भावों की रश्मियां हर पल बिखरने लगी थी।
…….. तो उस रात उज्ज्वला ने ही मैसेंजर पर आकर अभिवादन किया। कितना अच्छा लगा था उसका यूं चले आना सौम्यता-सहजता के साथ। उसने जीवन, साहित्य और प्रेम जैसे जटिल विषयों पर जिस तरह संवाद किया, उससे साबित हो रहा था कि वह संबंधों को किस अर्थों में लेती है।
आकाश और उज्ज्वला की संवाद यात्रा इस कदर बढ़ी कि वह कब अनंत यात्रा के सहयात्री हो गए, इसका पता ही नहीं चला। अलौकिक प्रेम में डूबी उज्ज्वला उसे उस शिखर पर ले जा रही थी, जहां से सब कुछ पीछे छूट जाता है। सब बंधन टूट जाता है। वह उसे अंधकारमय अरण्य से बाहर निकाल कर उस क्षितिज की ओर ले जा रही थी, जहां से धरती और आसमान एक हो जाते हैं।
आज नीला से विवाद के बाद मन खट्टा हो गया था आकाश का। निराशा उसके तनाव को बढ़ा रही थी। मेट्रो स्टेशन पहुंचा तो मैसेंजर की बीप ने ध्यान खींचा। देखा तो उज्ज्वला का संदेश- …….. सुनिए न। हमने एक कविता लिखी है। पढ़ कर बताइए कैसी है। …… आप मेट्रो कोच में बैठ गए? …… आकाश उसकी कविता पढ़े, इससे पहले ही मेट्रो के आने की उद्घोषणा होने लगी।
आखिरी कोच में सीट मिल जाने पर उज्ज्वला की कविता सामने थी। उफ, क्या कविता लिखती है। आकाश ने सोचा- सच ये रुला देगी पगली। उसने तुरंत पलट कर मैसेज किया- बहुत अच्छी कविता। दिल को छू गई। उज्ज्वला का जवाब- आप न, मेरी झूठी तारीफ बहुत करते हैं। अच्छा छोड़िए ……. अपने इसे पढ़ा, यही मेरे लिए गर्व की बात। बहुत आभार…..। दोनों के बीच संवाद होता रहा। मेट्रो चलती रही। सहयात्री अपनी मंजिलों पर उतरते रहे। आकाश ने सोचा उसकी मंजिल कब मिलेगी। जो भी हो, यह भी एक अनंतयात्रा है, जिसमें उज्ज्वला हर पल की उसकी सहयात्री है।
विजयदशमी की रात खबरों में डूबे आकाश को उज्ज्वला ने मैसेंजर पर आकर टोका- एडिटर साब, कभी हमारी सुध भी ले लिया कीजिए। देखिए आज कितना ट्रैफिक जाम है। खिड़की खोली तो पल्यूशन से सिर घूम गया। आकाश ने काम रोक कर उसे बधाई दी। पान के दो चित्र भेजते हुए कहा-‘लीजिए पान-सुपारी के साथ के साथ त्योहार का समापन कीजिए। आपका मूड ठीक हो जाएगा।’ इस पर उज्ज्वला ने रोनी सूरत वाली स्माइली भेजते हुए कहा- ‘शुक्रिया। …… देखिए न, आज हमें पान खाने को नहीं मिला। वैसे हर दशहरे पर यह जरूर खाती हूं। आपने सेलिब्रेट किया पान खाकर?’ उसने पूछा। ‘नहीं तुम्हारे साथ पान खाकर सेलिब्रेट करूंगा’ आकाश ने सहज ही जवाब दिया। इस पर उज्ज्वला चहक उठी- पान खिलाइएगा मुझे? आकाश ने कहा- ‘हां बिलकुल। आ जाओ संडे को राजीव चौक। वैसे भी हम लोग बात ही किए जा रहे हैं।’
‘हां….. एक बार मिले तक नहीं। एक दूसरे को देखा तक नहीं। अच्छा मैं आती हूं। मगर पान जरूर खिलाइएगा। पक्का।’ उज्ज्वला ने कहा। ‘हां पक्का, एकदम पक्का। आओ तो सही।’ आकाश ने जवाब दिया।
……….. रविवार का दिन। गुलमोहर सी दहकती दोपहर। आकाश आज अपनी आभासी मित्र से मिलने चला, तो न जाने कितनी ही आशंकाओं को उसने अपनी पोटली में बांध लिया था उसने। ………. उज्ज्वला कह रही थी ‘मैं देखने में सुंदर नहीं हूं। आपको निराशा होगी मुझसे मिल कर।’ इस पर आकाश ने जवाब दिया था-‘हमने चेहरे से नहीं, तुम्हारी भावनाओं से, तुम्हारे उत्तम विचारों से दोस्ती की है। चेहरे तो बदल जाते हैं, भावनाएं एक दूसरे के प्रति हमेशा एक जैसी रहें, सच्ची मित्रता और सच्चा रिश्ता वही है।’
‘राजीव चौक पहुंच रही हो न?’ मेट्रो में सवार होते हुए आकाश ने उज्ज्वला को कॉल किया। ‘चल रही हूं। एक सहेली से नोट्स लेना है। करोलबाग स्टेशन पर वेट कर रही हूं उसका।’ उज्ज्वला ने जवाब दिया। ……. उसने बताया था कि वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए तैयारी कर रही है। वह बार-बार कहती रही है कि समय कम है और बहुत कुछ करना है जीवन में। उज्ज्वला की भीतर की छटपटाहट महसूस करने लगा था आकाश।
……….. मेट्रो अपनी रफ्तार से चली जा रही है। आकाश के मन में यही सवाल- पता नहीं, मुझे देख कर क्या सोचेगी उज्ज्वला। कितना सादा सा व्यक्तित्व है मेरा। वह संकोच से गड़ गया। शायद इसीलिए वह कैडबरी का चॉकलेट लेकर नहीं चला। क्या सोचेगी वो? हालांकि एक खूबसूरत रिश्ते की सौगात दे रही उज्जवला के मन में वह मिठास भर देना चाहता है। अलबत्ता प्रेम कविताओं के दो संग्रह जरूर साथ रख लिए थे। उसी ने कहा था कि लेते आइएगा। मुझे पढ़ना है।
आज किसी भी स्टेशन की उद्घोषणा पर ध्यान नहीं। एक के बाद एक स्टेशन गुजरते जा रहे हैं। अगला स्टेशन चावड़ी बाजार है- उद्घोषणा हो रही है। आकाश को लगा कि अब ज्यादा सोचा तो कहीं राजीव चौक न निकल जाए। वह सीट से उठ कर गेट के किनारे खड़ा हो गया। गला सूख रहा है। क्या करूं। आकाश ने सोचा। ……… अगला स्टेशन राजीव चौक है। गेट के शीशे में खुद को निहारते हुए आकाश ने तसल्ली की, ठीक दिख रहा हूं न? फिर उसने अपने बालों को ठीक किया।
……….. प्लेटफार्म नंबर तीन पर भीड़ है, मगर ज्यादा नहीं। आभासी दुनिया की मित्र का आभास अभी हो जाएगा। मगर सैकड़ों युवतियों के बीच उसे कैसे पहचान पाएगा? उज्ज्वला ने उसे कॉल कर के कहा था, ‘वह सबसे आगे वाले डिब्बे में रहेगी। आप वहीं रहिएगा। मैं पहचान लूंगी आपको।’ ‘कैसे पहचान लोगी तुम’, आकाश ने पूछा था। उज्ज्वला का जवाब था, ‘यह मुझ पर छोड़ दीजिए।’ …… वैसे ड्रेस कोड की बात हुई थी। पर दोनों ने तय किया था कि यह न ही बताएं तो बेहतर। देखते हैं हम एक दूसरे को कैसे पहचानते हैं।
एक के बाद एक तीन मेट्रो निकल गई। मगर उज्ज्वला का कोई अता-पता नहीं। उसने बेचैन होकर वाट्सऐप पर जाकर पूछा- कहां हो? जवाब- आ रही हूं। बस दस मिनट लेट। वहीं खड़े रहिए प्लीज। सॉरी, आपको इंतजार कराया।
आकाश की धड़कनें तेज हो रही हैं। लगता है दिल एक धमाके के साथ ‘ब्लास्ट’ हो जाएगा। उसके सूनेपन को निर्बाध तोड़ चुकी उज्ज्वला से पहली मुलाकात कैसी रहेगी, यह सोच कर ही दिल संभले नहीं संभल रहा। ये क्या हो गया है मुझे, आकाश ने मन ही मन सोचा। नोएडा वाली मेट्रो के आने की घोषणा हो रही है। शायद इसी में होगी उज्ज्वला। आकाश ने दिल को तसल्ली दी। कोच सामने रुकते ही उसकी निगाहें बेसब्र हो उठी। हर चेहरे में उज्ज्वला की तलाश। कहां है वो?
वो आ रही है …….उसने गुलाबी रंग की साड़ी और ब्लू कलर की ब्लाउज पहन रखी है। अधरों पर गुलाबी मुस्कान। कितनी सौम्य और कितनी मृदुल…. एकदम छुईमुई के पौधे की तरह हैं! जरा सा खयाल न रखो तो कुम्हला जाए। गोल फ्रेम वाले चश्मे से झांकते सपनों से जगमगाते दो दीप। आकाश ने चाहा कि वह अपना हाथ आगे बढ़ाए। मगर न जाने क्यों उसने खुद को रोक लिया। उज्ज्वला ने ही एक दिन कहा था कि मैंने तो दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया है। अब आप स्वीकार कर लीजिए। ‘तो क्या मुझे हाथ बढ़ा देना चाहिए?’ आकाश ने मन ही मन सोचा। उस बात को याद करते हुए उसने झिझकते हुए अपना हाथ बढ़ाया तो उज्ज्वला ने बेझिझक थाम लिया। एक पल को लगा कि उनकी बरसों पुरानी पहचान है।
एक दूसरे का हाथ थामे वे कॉफी शॉप की तरफ चल पड़े। आकाश को लग रहा था कि उज्ज्वला उसकी हथेलियों में मोम की तरह पिघल रही हो। वह अभासी कहां रही अब। कॉफी शॉप में वह सामने बैठी तो उसने पूछा, पानी पियोगी? मेरा तो गला सूख रहा है। उज्ज्वला ने कहा- हां मेरा भी। आकाश के इशारे पर वेटर पानी की बोतल रख गया। वह घूंट-घूंट कर पानी पीती रही।
……. उज्ज्वला के चौड़े ललाट पर सांझ की दुल्हन को मुस्कुराते देखता रहा आकाश। बीते हुए कल और आज के बीच झूलती हुई वह मन की परतें खोलती रही। उज्ज्वला के अधरों से शब्द नहीं, फूल झड़ रहे थे। वह पहली मुलाकात में ही जीवन की किताब खोल कर बैठ गई थी। कितना कुछ है पढ़ने को। रुको उज्ज्वला। मुझे समय चाहिए……..।
उसकी उलझनें नम होतीं आंखों से बह जाना चाहती हैं। मगर वह अपनी पलकों में उन्हें बार बार समेट रही है। उसे सुनते हुए शून्य में खो गया आकाश। सामाजिक दंश झेलती उज्ज्वला कितनी जीवट है। उसने सोचा। उसकी नजरें बार-बार उसकी अधरों पर टिक रही थीं। उज्ज्वला ने ही छेड़ते हुए कहा- ‘क्या देख रहे हैं आकाश?’ ‘कुछ नहीं। बस तुम्हारे चेहरे को। तुम बोलती रहो’ आकाश ने जैसे हड़बड़ाते हुए कहा, मानो उसकी चोरी पकड़ी गई हो। यह सुन कर वह मुस्कुराई। तब तक कॉफी आ चुकी थी।
कप के बड़े साइज देख कर उज्जवला चौंकी। फिर एक घूंट लेकर बोली- ये तो कड़वी है। लाइए चीनी मिलाती हूं। वह चम्मच से कॉफी में चीनी घोलती रही। लगा कि वह खुद भी उस में घुलती रही है। आकाश उसकी गोरी हथेलियों को देखता रहा। सच में उज्ज्वला बहुत जीवट है। ये नाजुक जरूर हैं हथेलियां, पर कितनी मजबूत और बड़ी हैं। किसी भी चुनौती से निपट लेंगी। ………. कॉफी की खुशबू के साथ उस पल को आकाश ने हमेशा के लिए संजो लिया।
कॉफी शॉप से बाहर निकले तो उज्ज्वला ने ही कहा- अब कहां चलिएगा? आकाश का जवाब- ‘मंदिर और कहां? हमारी पहली मुलाकात के साक्षी बनें भगवान।’ ……. ‘देखिए तभी तो आज साड़ी पहन कर आई हूं। चलिए चलते हैं।’ उज्ज्वला ने कहा। दोनों राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से बाहर निकल गए।
………. कनाट प्लेस का हनुमान मंदिर। पूजा की थाली और दीप लेकर उज्ज्वला बढ़ चली सीढ़ियों की ओर। आकाश को लग रहा था जैसे कोई स्वयंसिद्धा देवी चली जा रही हो अपने सभी निर्मल भावों का अर्पण करने। वह गुलाबी परिधान में भव्य लग रही है। अपनी उम्मीदों का झिलमिलाता दीप श्री के चरणों में रखने के लिए उसने पुजारी को सौंप दिया है। आंखें बंद किए उज्ज्वला हाथ जोड़ कर प्रार्थना कर रही है। आकाश ने मन ही मन सभी देवताओं को नमन किया। वह उज्ज्वला के बगल में खड़ा रहा। उसने ईश्वर से क्या मांगा होगा? उसने सोचा।
सभी देवताओं की परिक्रमा लगाने के बाद उज्जवला बोली- ‘अब चलें बॉस। भगवान साक्षी हो गए हमारी इस मित्रता के। अब खुश।’ ‘…… हां बिलकुल, अब हम तुम्हें पान खिलाएंगे। वादा किया था न हमने’, आकाश बोला। यह सुनते ही उसकी कजरारी आंखों में चमक आ गई -चलिए-चलिए। जल्दी चलिए। बच्ची की तरह वह मंदिर की सीढ़ियां उतरने लगी। नीचे आकर उसने आांखें बंद कर एक बार फिर देवताओं को नमन किया।
हनुमान मंदिर परिसर में दोनों यूं ही बैठे रहे। आाकाश वहीं पास की दुकान से मीठे पान का एक बीड़ा ले आया और उससे पूछा, यहीं खाओगी या बाद में। इस पर उज्ज्वला ने कहा- नहीं यहां नहीं। करोलबाग चलिए पहले। वहां विक्रम एंड वाजी इंस्टीट्यूट में एक काम है। पहले वहीं चलते हैं। फिर हम पान खाएंगे।
आकाश ने ओला की कैब बुला ली। ………. गाड़ी इंस्टीट्यूट के बाहर खड़ी कराने के बाद वह अंदर चली गई। आकाश वहीं टहलता रहा। कुछ ही देर बाद वह लौटी तो उसके चेहरे पर विजयी मुस्कान थी। सच में वह स्वयंसिद्धा है। जो काम हाथ में लेगी, उसे जरूर पूरा करेगी। आते ही बोली- लाइए तो हमारा पान। आकाश ने पान का बीड़ा आगे बढ़ाते हुए कहा, ये लो हमारा वादा पूरा हुआ। उज्ज्वला ने उसे रोकते हुए कहा- न…न…आधा आप और आधा मैं। इस पर आकाश ने बीड़े को आधा करते हुए आगे बढ़ाया तो उज्ज्वला ने मुंह खोलते हुए कहा-खिलाइए अपने हाथ से। …….. उसके अधर और गुलाबी हो उठे हैं।
पान खाते हुए वह कितनी प्यारी लग रही है। ……. मगर यह क्या? उसकी आंखें क्यों छलक उठी हैं? आकाश ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा- क्या हुआ तुम्हें? कोई पुरानी बात याद आ गई? ‘आप नहीं जानते हम कितनी उलझन में हैं।’ फिर अपने आंसुओं को समेटते हुए उज्ज्वला बोली, ‘आप पहले क्यों नहीं मिले मुझे? मेरी कितनी उलझनें सुलझ जातीं। पता है, आप जैसे दोस्त को मैं टॉर्च लेकर ढूंढ़ रही थी। मैं बहुत कुछ कहना चाहती हूं। मगर कह नहीं पा रही। आप समझ रहे हैं न।’
उज्ज्वला भावुक हो गई है। उसने आकाश का हाथ थामते हुए कहा- ‘मैं प्रेम के सही मायने तलाश रही हूं। आज पता चला कि एक दूसरे की भावनाओं को समझना और सम्मान देना भी प्रेम है। एक दूसरे की खुशी के लिए जीना भी प्रेम है। यही तो है प्रेम की परिभाषा।’ उज्ज्वला बोले जा रही है, ‘आप कहीं नहीं जाइएगा मुझे छोड़ कर। मेरे मन पर आज से सदा आपका अधिकार। यह दोस्ती अंतिम सांस तक चलने वाली है। आप समझ रहे हैं न? मैं क्या कह रही हूं।’ ‘आकाश ने उसकी कलाइयों को थामते हुए पलकें झपकाई- ‘हां……।’ उसकी आंखें भी नम हो उठी हैं।
उज्ज्वला के चेहरे पर एक निश्छल आभा देख आकाश भावुक गया है। उसने कहा- फेसबुक पर नकली लोग बहुत मिलते हैं। तुम तो सच में परी बन कर चली आई। ……. मैं भी तुम्हें कभी नहीं खोना चाहूंगा। शायद किसी जनम का नाता है तुमसे। यह किसी भी प्रेम से बढ़ कर है। समझ रही हो न तुम।’ आकाश ने यह कहते हुए उज्जवला की कोमल हथेलियों पर अपना हाथ रख दिया।
कार चल रही है। उज्जवला खामोश है। कामनाओं की नदी बह रही है मन में। दोनों को कहां तक ले जाएगी, मालूम नहीं। डूबते सूरज की लाली में उज्ज्वला की पलकों से उतरते अश्रुबिंदु में सात रंग के सपने झिलमिला रहे हैं। इसे चमकने दो उज्ज्वला। झिलमिलाने दो। …….. आकाश ने मन ही मन सोचा और रूमाल वापस अपनी जेब में रख लिया है।
‘घर तक छोड़ दूं तुम्हें?’ आकाश ने पूछा। ‘हां… शाम होने को आई। अब चलना चाहिए न। और इस वादे के साथ कि हम फिर मिलेंगे और मिलते रहेंगे हमेशा’, उज्ज्वला ने मुस्कुराते हुए कहा। ‘बिलकुल…..’, आकाश ने कहा। दिल कह रहा कि वह अभी नहीं जाए। …….. एक पल की खामोशr के बाद वह कैब ड्राइवर से इतना ही कह पाया- चलो भाई, इन्हें अभी आनंद पर्वत ड्राप कर दो और मुझे घर।
‘जी साब……..’, यह कहते हुए चालक ने रेडियो न आन कर दिया है। फिल्म दस्तक का एक पुराना गीत बज उठा है-

‘माई री……. मैं कासे कहूं पीर
अपने जिया की……
ओस नयन की उनके,
मेरी लगी को बुझाए ना
तन-मन भिगो दे आ के,
ऐसी घटा कोई छाए ना।
मोहे बहा ले जाए
ऐसी कोई लहर आए ना…..
माई री, मैं कासे कहूं पीर अपने जिया की…….’
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उज्ज्वला ने आकाश के हाथ को कस कर पकड़ लिया है। उसके मन का नीला आसमान सिंदूरी हो उठा है। उसके चौड़े ललाट पर सांझ की दुलहन एक बार फिर मुस्कुरा रही है।