बंद कमरे से आतीं चीखें

संजय स्वतंत्र

हर शनिवार, किस्त 18

उस शहर में किराए के दो कमरे वाला हमारा घर था। तब छठी कक्षा का विद्यार्थीं था। बस होश संभाल ही रहा था मैं। मकान मालिक की बेटी सुनीता मेरी अच्छी दोस्त बन गई थी। वह आठवीं में पढ़ती थी। बात बरसों पुरानी है। उस समय गुड्डे-गुड़ियों का खेल लोकप्रिय था बच्चों में। गैजेट की दुनिया का आज जैसा बनावटीपन नहीं था। सुनीता स्कूल से लौट कर गुड्डे-गुड़ियों का खेल खेलती। जिसमें वो पत्नी बन जाती और और मैं पति। हालांकि इन सब बातों की समझ नहीं थी मुझमें।

दरअसल, रात में बंद दरवाजे से आती मां की चीखें सुन-सुन कर सुनीता एक ऐसे दौर से गुजर रही थी, जिसे समझ पाना मेरे बस की बात नहीं थी। आज सोचता हूं तो लगता है कि वह उस उम्र में मेरे साथ एक काल्पनिक दुनिया जी रही थी। जिसमें पति कोमल हो और जिससे वह बेहद प्यार करती हो।

........ तो गुड्डे-गुड़ियों के खेल में वह खिलौने जैसे बर्तनों में खाना बनाती। फिर हम हम झूठ-मूठ खाना खाते। फिर सुनीता कहती, ‘देखो रात हो गई है। हमें सो जाना चाहिए।’ इसके बाद एक चादर लेकर मेरे साथ सो जाती। चादर के अंदर हम दोनों। वह मेरे गालों को सहलाती। बालों में अंगुलियां फेरते हुए कहती, ‘तुम कितने अच्छे हो।’ मेरी पलकों को चूम कर वह अपनी आंखें बंद कर लेती। तब उस तपती लू वाली दोपहर में शीतलता छा जाती। फिर वह एक मीठा गीत गुनगुनाने लगती-

जैसे राधा ने माला जपी श्याम की,
मैंने ओढ़ी चुनरिया तेरे नाम की.......
बिना मोल की बिकी मैं बिना दाम की.....
पा लिया तुझे, पाई हर खुशी.......।

किशोरावस्था की ओर कदम बढ़ा चुकी वह लड़की सचमुच संवेदनशील थी।

पिछले दिनों मैरिटल रेप यानी वैवाहिक जीवन में बलात्कार विषय पर भारतीय समाज और कानून के संदर्भ में जब खुली बहस हो रही थी तो सुनीता की बेहद याद आई। एक लड़की जो अपने मां-बाप के रोज के झगड़े और बंद दरवाजों से आती चीखें सुन-सुन कर सहम गई थी। उसे इतना पता था कि पिता उसकी मां पर जुल्म करता है। और उसका मतलब क्या होता है। दहशत में गुम वह लड़की गुड्डे-गुड़ियों के खेल में अपना भावी जीवन तलाश रही थी। वैवाहिक सुख क्या हो, उसकी उसने अपनी दुनिया बना ली थी, जिसमें वह मुझे भी शामिल कर लेती थी।

............. गर्मियों के वो दिन थे। उस रात छत पर चला गया था सोने के लिए। दरी बिछा कर लेटा ही था कि सुनीता चली आई। ‘तू अकेला सोएगा यहां? डर नहीं लगता तुझे?’ उसने मेरे सिर को सहलाते हुए पूछा। ‘लगता है......पर तुम आ गई हो न। अब नहीं लगेगा। अच्छा, तुम राजकुमारी की कहानी सुनाओ न।’ मैंने उससे इसरार किया। वह कहानी सुनाने लगी- ‘एक दैत्य था। उसने एक दिन राजा की बेटी से जबर्दस्ती शादी कर ली। सारा धन लूट कर उसने राजा और रानी को भी मार डाला। फूल सी राजकुमारी रोती-बिलखती रही। दैत्य का जोर-जुलम शुरू हो गया। जब चाहे उसे नोंचता-खसोटता। रात में ....... दिन में। जब चाहे।’ कहानी सुनाते हुए सुनीता की आंखों से टप-टप आंसू गिरते। मैं उसके आंसू पोंछता तो वह गले लगा लेती और कहती, ‘तुम सो जाओ। मैं बैठी हूं तुम्हारे पास।’

.......... मैंने जैसे ही आंखें बंद की। पड़ोस से महिला की चीख सुनाई दी। ‘क्या हुआ उसे?’ मैंने पूछा, तो सुनीता ने कहा- ‘कुछ नहीं। एक दैत्य के चंगुल में है राजकुमारी। तुम सो जाओ। अभी छोटे हो। नहीं समझ पाओगे। जब बड़े हो जाओगे न, तब तुम्हें सुंदर सी राजकुमारी मिलेगी। तुम उसका हमेशा खयाल रखना। रखोगे न?’ ....... हां, जरूर रखूंगा। यह कह कर मैं उसकी गोद में सिर रख कर सो गया। और सुनीता चांदनी रात की दूधिया रोशनी अपने भावी जीवन के लिए अंतस में भरती रही।

उस दिन न्यूजरूम में खबरों पर नजर गड़ाए था। तभी एक समाचार पर निगाह रुक गई। आदिवासी क्षेत्र से आई खबर में बताया गया था कि शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करने पर पति ने उसके कोमल अंग में तेजाब डाल दिया था। खबर पढ़ कर हतप्रभ था। ऐसे भी पति होते हैं? घटना की तस्वीर आ चुकी थी। उसे देख कर मैं विचलित हो गया। याद आई दैत्य और राजकुमारी की कहानी, जो सुनीता ने कभी सुनाई थी। यौन लालसा में आकंठ डूबा पुरुष दैत्य ही हो जाता है। यह आदिवासी महिला एक उदाहरण भर है।

स्त्रियों पर दैहिक अत्याचार की न जाने कितनी घटनाएं हैं, जो कभी सामने आई ही नहीं। ऐसी लाखों महिलाएं हैं इस देश में, जो अपने विवाहित जीवन में कभी न कभी यौन हिंसा की शिकार जरूर होती हैं। कई तो अनेक बार होती हैं। मुझे अभी उस अभिनेता की याद आ रही है जो अपनी पत्नी के जिस्म को जलती हुई सिगरेट से दागा करता था। पत्नी की चीखें सुन कर लोग कैसे खुश होते हैं? यह समझ नहीं आता। ये सुनीता की कहानी वाला दैत्य ही होगा। हालांकि बाद में उस अभिनेता की समर्थ पत्नी ने उसका त्याग कर दिया और नए सिरे से जीवन की शुरुआत की। फिर भी उस अभिनेता की आदत नहीं बदली। बाद में रातें रंगीन करने के लिए लाई गई औरतों के साथ भी वह वही सलूक करता रहा। बताते हैं कि बंद कमरे से आती चीखें सुन कर अभिनेता के सेक्रेटरी की नींद उड़ जाती।

आज सुखिया घर में काम करने आई तो बता रही थी कि दामाद उसकी बेटी से ठीक से पेश नहीं आ रहा। उसकी आंखें सूजी रहती हैं और पेट में अक्सर दर्द रहता है। कुरेदने पर उसने यही कहा- वहीं पति-पत्नी का रात का झगड़ा। ........ आप समझते हैं न बाबू। क्या बताऊं? सुखिया ने कहा। तुम चिंता मत कर करो। बेटी को घर बुला लो। सोचता हूं पुरुषों का व्यवहार पशुवत क्यों हो जाता है। क्यों नहीं वह अपनी आदिम प्रवृत्ति से अभी तक ऊपर उठ पाया है? अप्राकृतिक, अमर्यादित और असंयमित आचरण करने वाले पुरुषों में मुझे आज भी सुनीता की कहानी वाला दैत्य ही नजर आता है।

अगर आपको याद हो। भारतीय सुंदरी का खिताब जीतने वाली युवती ने कुछ साल पहले अपने पति पर अप्राकृतिक यौन संबंध के लिए बाध्य करने का आरोप लगाया था। लेकिन आज ऐसी कितनी विवाहिताएं हैं जो खुल कर अपनी पीड़ा बता पाती हैं। यौन आधारित हिंसा का एक निष्कर्ष बताता है कि उत्तर भारत में करीब 40 फीसद पुरुष अपनी पत्नियों की सहमति के बिना यौन संबंध बनाते हैं। यूनाइटेड पापुलेशन फंड के एक अन्य अध्ययन में भारत की 17 फीसद महिलाओं ने अपने साथ यौन हिंसा की बात कबूली है। ये तो रही अध्ययन और सर्वे की बात। मगर सच्चाई यही है कि यौन उत्पीड़न की शिकार ज्यादातर स्त्रियां मुंह नहीं खोलती।

मेरी मित्र डॉ. उज्ज्वला उस दिन बता रही थी। हां, ये सब बंद दरवाजों के पीछे होता है। लोक-लाज और संकोच की वजह से महिलाएं खामोश रहती हैं। उसने एक शोध के हवाले से बताया कि भारत का ऐसा कोई राज्य नहीं जहां पुरुष यौनिक हिंसा में लिप्त न हों। ............उसे बताया कि मैं भी इस विषय पर पढ़ रहा हूं। मैंने इसे आसपास महसूस किया है। एक ऐसा विषय, जिस पर किसी से विमर्श नहीं कर सकता। ‘नहीं आप मेरे साथ बात कर सकते हैं।’ उज्ज्वला ने बातचीत के दौरान मुझे सहज किया।

वैवाहिक बलात्कार पर पति को सजा के विरोध में जहां सारा समाज खड़ा नजर आता है, वहीं इसके समर्थन में डटे लेखकों-समाजसेवकों और कानून के जानकारों की आवाज दब गई है। आज जब दफ्तर के लिए निकला तो सामने के फ्लैट में रहने वाली महिला को असहजता से जाते हुए देखा। टी शर्ट और जींस में वह बेशक को खुद को आत्मविश्वास से भरी जता रही हो, मगर सूख होंठ और पलकों के नीचे स्याह घेरे निर्मम रातों की कहानी बयां कर रहे हैं। यह मेरा अनुमान नहीं हैं। पड़ोसी ही बताते हैं कि देर रात बंद फ्लैट से उसकी चीखें गूंजती हैं। ........उसने मुझे देख कर नजरें फेर ली हैं।

.......... मेट्रो स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर खड़ा हूं। डॉ. उज्ज्वला का कॉल है। मैं जेब से मोबाइल निकाल रहा हूं। ‘यस डॉक्टर कैसी हो तुम?’ मेरी भारी आवाज सुन कर उसने कहा, ‘अरे, आपका तो गला खराब हो गया है। आपने दवा नहीं ली? लगता है आप रात को ठीक से सोए नहीं।’ उज्ज्वला ने एक साथ कई सवाल किए। ‘हां तुम्हें पता तो है। उस विषय पर पढ़ रहा था। फिर तबीयत भी ठीक नहीं थी।’ मैंने जवाब दिया। ‘अच्छा तो आप किस नतीजे पर पहुंचे’ उसने पूछा। ........... इस बीच मेट्रो के आने की उद्घोषणा हो रही है।

आखिरी कोच में बैठते ही मैंने डॉ. उज्ज्वला से कहा, ‘बताता हूं .......... सीट मिल गई है। अब आराम से बात कर सकते हैं। तुम कुछ कह रही थी?’ मैंने उससे पूछा। ‘हां..... मैंने भी इस मुद्दे की गहराई में जाने की कोशिश की है। और स्टडी करते हुए वैदिक काल तक चली गई। जब स्त्रियों का बहुत सम्मान था। उसे समान अधिकार हासिल था। तब नारियां विद्वानों के साथ सभाओं में उन विषयों पर भी शास्त्रार्थ कर लेती थी, जिसकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती। मंडन मिश्र की पत्नी भारती ही तो थीं, जिन्होंने आदि शंकराचार्य को वैवाहिक संबंध और उसकी जिम्मेदारियों पर शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी थी। मेरे कहने का मतलब है कि उस काल में नारियों को बहुत सम्मान हासिल था। उस वक्त पर्दा भी नहीं थी। पुरुष अपनी पत्नियों से मर्यादित व्यवहार करते थे। यहां तक कि पुत्र न होने पर बेटी को पिता की संपत्ति पर पूरा अधिकार हासिल था। बताइए उस दौर में स्त्रियों के दमन का कोई उदाहरण मिलता है क्या?’ उज्ज्वला एक सांस में बोल गई। 
‘नहीं उज्ज्वला। मुझे ऐसा उदाहरण नहीं मिला। मगर ये समझ में नहीं आता कि वैदिक काल का वो सम्मान कहां खो गया।’ मैंने कहा। ‘..........देखिए भारतीय नारियों की दुर्दशा उत्तर वैदिक काल से शुरू हुई। जब पुरुषों को उनके अधिकारों, उनकी विद्वता और उनके फैसले लेने की क्षमता से डर लगने लगा। जिस दिन पति को भगवान का दर्जा दे दिया गया, उस दिन से स्त्रियां पुरुषों से कई पायदान नीचे चली गर्इं। बाल विवाह का चलन, विधवा विवाह पर रोक और शिक्षा के अधिकार के हनन के बाद, इन सब ने महिलाओं को अंधेरी दुनिया में धकेल दिया। मुगलों के आक्रमण और उनके शासन काल में और दुर्दशा हुई।’ उज्ज्वला बोले जा रही है। मैं उसकी बात ध्यान से सुन रहा हूं।

मुझे लग रहा है कि मैरिटल रेप का मुद्दा कोई आज का नहीं। इसे समझने के लिए हमें हजारों वर्ष पीछे जाना जाना होगा। यह मेट्रो मुझे अंधेरी सुरंग से निकाल कर आगे ले जा रही है। सोच रहा हूं कि हम कब मन की अंधेरी सुरंगों से बाहर निकलेंगे। डॉ. उज्ज्वला सही कह रही है।

............वह अभी रुकी नहीं है। वह कह रही है, ‘आप जानते हैं मैरिटल रेप की वजह पुरुषों का अहंकार है। स्त्रियों के तर्क और विद्वता के आगे जब पुरुष खुद को कमजोर पाते हैं तो शारीरिक बल से उनका दमन करने की कोशिश करते हैं। छल-कपट कर उनके चरित्र पर लांछन लगाते हैं। सरेराह छेड़छाड़ और अकेली व बेबस पाकर बलात्कार करने की कोशिश, ये सब क्या है?’ उज्ज्वला से चर्चा करते हुए न जाने कितने स्टेशन निकल गए। उद्घोषणा हो रही है, अगला स्टेशन कश्मीरी गेट है।

डॉ. उज्ज्वला बता रही है, ‘......नववधू के कौमार्य का पता लगाने के लिए खुद सास ही सेज पर सफेद चादर बिछाती है। एक तरह से वह अपने बेटे को बहू से बलात्कार करने के लिए प्रेरित करती है। फिर मैरिटल रेप की शुरुआत तो सुहागरात से ही शुरू हो जाती है। जबरन संबंध बनाने का अधिकार उसी रात मिल जाता है मर्द को। सफेद चादर का खून से रंग जाना क्या संकेत देता है? हमारे यहां एक समुदाय में तो आज भी यह परंपरा है। कितनी भी पढ़ी-लिखी लड़की क्यों न हो, उसे यह साबित करना होता है कि उसका कौमार्य अक्षत है। मगर सोचिए कि उस कोमलता पर मर्दानगी दिखाते हुए पहली ही रात उसे रक्तरंजित करने को आप क्या कहेंगे?’ उसकी सांसों में उतार-चढ़ान से जाहिर है कि इस मसले पर कितनी आवेश में है।

मैं उसे शांत करने के लिए कह रहा हूं, ......... तुमसे सहमत हूं उज्ज्वला। हम इस सोसायटी को अकेले और एकदम से नहीं बदल सकते, लेकिन इसे संवेदनशील और जागरूक बनाने के लिए अपने स्तर काम कर सकते हैं। .......... जी, आप सही कह रहे हैं। उज्ज्वला ने सहज होते हुए कहा। अब वह चुप हो गई है।

उद्घोषणा हो रही है, अगला स्टेशन राजीव चौक है। मैं सीट से उठ रहा हूं। उज्ज्वला अभी कॉल पर है। मैं उसे कह रहा हूं, इस समाज को बदलने में अभी कई बरस लगेंगे। तब हम नहीं होंगे इस दुनिया में, पर इसे जागरूक करने के लिए फिलहाल पहल करते रहेंगे।

.........राजीव चौक उतर रहा हूं। सोच रहा हूं कि समाज के बंद दरवाजे के पीछे जो चीखें गूंजती हैं, उसे कोई क्यों नहीं सुनता। हम खिड़कियां तो खोल रहे हैं, मगर कानों में रुई क्यों डाल लेते हैं? सुनीता की कहानी वाला दैत्य आज भी अट्टहास लगाता है। राजकुमारी आज भी रोती है। सफेद चादर आज भी लाल होती है। स्याह अंधेरे में सलवटें क्रूरता का बयान करती हैं, जहां जिस्म को जख्म दिया जाता है उस दैत्य की इच्छा पूरी होने तक। मगर उस जख्म को कौन देखता है। ........... उज्ज्वला देख रही है। मैं देख रहा हूं। क्या आप देख रहे हैं?

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