सोने की पाजेब

संजय स्वतंत्र

लेखक जनसत्ता, दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार हैं।

ग्यारहवीं किस्त

कुछ दिन पहले की बात है। न्यूजरूम में काम करते हुए एक खबर पर मेरी नजर ठिठक गई। खबर थी-दुल्हन ने किया नशेड़ी से शादी से इनकार। यह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की खबर थी, जहां एक युवती ने बारात लौटा दी थी। हुआ यों कि द्वारपूजा और दूसरी रस्मों के बाद दुल्हन की बहनें और सखियां उसकी आरती लेने गर्इं तो उसके मुंह से बदबू आ रही थी। पैर भी लड़खड़ा रहे थे। लड़कियों ने आरती छोड़ दुल्हन को यह बात बताई। इसके बाद पढ़ी-लिखी उस युवती ने नशेड़ी से विवाह करने से साफ इनकार कर दिया। रिश्तेदारों के समझाने पर भी वह नहीं मानी। अपनी जिद पर अड़ गई कि एक शराबी के साथ वह अपने जीवन की डोर नहीं बांध सकती। खैर बारात लौट हई। .......तो यह है आज की दुल्हन।
वह जमाना गया, जब मां-बाप किसी के भी पल्ले बांध देते थे। रोती-कलपती बेटी उसे ही किस्मत में लिखा मान लेती थी। विवाह के बाद अकेली कहीं भी बाहर नहीं निकलती थी। मगर आज न केवल वह तमाम वर्जनाओं को तोड़ रही है बल्कि परिवार और समाज के सोच में भी बदलाव ला रही है। 
शादी के चार दिन बाद दुल्हन अकेली किसी जरूरी काम से जाती दिख जाए तो आप अचरज मत कीजिएगा। छोटे शहरों के लोग बेशक कुछ हैरत में पड़ जाएं मगर बड़े शहरों और खासकर मुंबई व दिल्ली जैसे महानगरों में तो यह सामान्य है। हालांकि पुराने रिवाजों से ऊपर उठने के बावजूद कुछ परंपराओं से जुड़े रह कर वे यह बोध करा देती हैं- ‘हां मैं नई नवेली हूं। मगर किसी जरूरी काम से क्या घर से नहीं निकलूंगी? देखो मेरे हाथों में लाल रंग की भरी-भरी चूड़ियां। ये मेरी सोने की पाजेब देखो। यह छमछम की आवाज तो नहीं करती पर कुछ परंपराओं को किस तरह निभा रही हूं आप देख रहे हैं न?’ ...........तो यह है आज की दुल्हन। एकदम बिंदास। जीवन से कदमताल करती हुई। 
हमेशा की तरह दोपहर दफ्तर के लिए निकला तो सोचा नहीं था कि ऐसी ही दो दुलहनों से रू-ब-रू होऊंगा। ......... तो आज आखिरी कोच की आखिरी सीट मिली है मुझे। सामने की कोने की सीट पर गुलाबी साड़ी में दुल्हन ने मेरा ध्यान बरबस खींच लिया है। चांद जैसे चेहरे पर उसकी मोहक मुस्कान से चार चांद उतर आए हैं। कजरारी अंखियां ऐसी लग रही हैं गोया दो सखियां रात की चादर को भोर में सहेज रही हों........। बैग और चार-पांच मोटी फाइलें संभाले बैठी इस नवेली के पांवों से तो अभी महावर भी नहीं उतरा है। मगर पायल और बिछिया ने उसके सौंदर्य को बढ़ा दिया है। 
आधुनिक दौर में जहां सुंदरता के कई प्रतिमान बदले हैं, वहीं सुहाग के कई प्रतीक आज भी कायम हैं। जैसे पाजेब को ही ले लीजिए। इससे मोह नहीं छूटा है लड़कियों का। महावर लगे पांवों में पायल और कलाइयों पर सजी लाल-लाल चूड़ियां, दुल्हन के सौंदर्य की निशानी भर नहीं हैं। विवाह के समय पिता एक मान्यता और इस भावना से बेटी को पायल देता है कि उसे कभी धन-संपत्ति की कोई कमी न हो। मगर आज युवतियां इसे फैशन के रूप में लेती है। तो बहाने से ही सही, एक परंपरा कायम है। चाहे यह सोने की ही क्यों न हो। यह बात और है कि पांव में सोना पहनना वर्जित है। 
मेरे सामने बैठी इस दुल्हन की पायल छमछम तो नहीं कर रही, लेकिन अपनी चमक से एक पूरी परंपरा को जगमग कर रही है। यह नवोढ़ा किसी जरूरी काम से ही निकली होगी। क्योंकि वह अकाउंट्स संबंधी मसलों को लेकर दफ्तर के सहयोगी को मोबाइल पर हिदायत दे रही है। उसकी बात सुन पा रहा हूं, इसलिए कह रहा हूं। संभवत: वह चार्टर्ड अकाउंटेट है और कोई जटिल केस निपटाने निकली है। उसे राजीव चौक जाना है। 
वह दिखने में जितनी कोमल है, प्रोफेशन में उतने ही कड़े फैसले लेने वाली दिख रही है। वह लगातार बरस रही है, ‘तुम लोग एक काम ठीक से नहीं कर सकते। हर वक्त छुट्टी मांगते रहते हो। मुझे देखो शादी के चार दिन नहीं हुए और मुझे आफिस आना पड़ रहा है।’ वह बात करते हुए कभी पांवों में बंधी पायल को देख रही है तो कभी ढीली हो गई सैंडिल को। इसे फिर से कसने के क्रम में उसकी पायल सात रंगों में झिलमिला उठती है। क्या पायल आत्मविश्वास बढ़ा देती है महिलाओं में? इसे बरसों से नारियों के लिए बेड़ी स्वरूप माना गया, लेकिन आधुनिक दौर में आज भी यह खास अलंकार है। एक फैशन स्टेटमेंट है आधुनिकाओं का। 
इस समय मुझे तमिल साहित्य की एक कहानी याद आ रही है। इस कहानी के अनुसार एक अविश्वासी पति वेश्या के पास सब कुछ हार जाता है। तब घर का खर्च चलाने के लिए उसकी पत्नी अपने पैरों में बंधी रत्नजड़ित पायल उतार कर उसे देती है। पति जब दुकानदार के पास बेचने के लिए जाता है तो उसे दोषी मान कर बंधक बना लिया जाता है। मगर उसकी पत्नी उसे बेगुनाह साबित करने में कामयाब हो जाती है। तब पति को अपनी गलती का अहसास होता है और वह सारे बुरे काम छोड़ देता है। यह थी पायल की शक्ति। 
आज की दुल्हनें तमाम चुनौतियों और सामाजिक बुराइयों से लड़ रही हैं। घरों में शौचालय बनवा रही हैं, तो नशेड़ियों को सही रास्ता भी दिखा रही हैं। मगर पायल से उनका आज भी मोह नहीं छूटा है। क्या पायल सच में स्त्रियों में आत्मविश्वास बढ़ाती हैं। यह खयाल बार-बार यों ही न जाने क्यों आ रहा है।
मुझे याद आ रही है अजय भैया की, जो शादी के लिए कई साल पहले लड़की देखने पटना गए तो उसने कहा था कि सोने की एंकलेट यानी पाजेब दोगे तो हां करूंगी। भावी जीवन साथी के अनुपम सौंदर्य पर फिदा अजय भैया रिश्तेदारों को वहीं छोड़ उसे लेकर मौर्य कांप्लेक्स जा पहुंचे थे। वहां उन्होंने भाभी के लिए न केवल उनकी पसंद की पायल खरीदी बल्कि नीले रंग का लहंगा भी उपहार में दिया। फिर उसी शॉपिंग कांपलेक्स में दक्षिण भारतीय व्यंजन की फरमाइश की गई तो वहीं बैठ कर दोनों ने एक रंग-एक मन से एक दूसरे के लिए सपने बुने। इस तरह उस दिन पूरे महीने की सैलरी खर्च कर भैया लौटे तो घर में सभी ने टोकाटाकी की। अलबत्ता पायल वाली बात दोनों ने सब से छुपा ली। तो पायल का जलवा हर दौर में रहा है। आज तो एंकलेट के रूप में यह लोकप्रिय है। 
इस किस्से में उलझ कर आपको यह बताना भूल गया कि राजीव चौक आने वाला है। सामने बैठी दुल्हन उठ गई है। काम का तनाव है मगर चेहरे पर मोहकता अब भी विराजमान है। उसकी हिदायतों का दौर खत्म नहीं हुआ है। आज वह आफिस पहुंच कर सबकी खबर लेगी। .......... खैर स्टेशन आ गया है। वह बैग और फाइलों को सावधानी से संभाले बाहर निकली है। उसे जाते हुए देख रहा हूं। उसके कदमों में गजब का आत्मविश्वास है। एक ऐसा भरोसा जिसमें वह बिखरते जीवन को भी संभाल सकती है। तो ऐसी है आज की दुल्हन। 
अब मैं स्टेशन के ऊपरी हिस्से पर जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ रहा हूं। प्लेटफार्म नंबर तीन के अंतिम छोर की ओर मेरे कदम बढ़ चले हैं। यहां से मुझे नोएडा जाने के लिए आखिरी डिब्बे में सवार होना है। आज अजब इत्तिफाक है। मेरे पीछे जो युवती खड़ी है, वह भी नवेली दुल्हन है। ........... मेट्रो आ गई है। मैं कोच में सवार हो गया हूं। थोड़ी भीड़ है। इसलिए मैंने गेट के पास ही अपने लिए जगह बना ली है। वह भी एकदम मेरे बगल में खड़ी हो गई है। उसके बदन से फूलों की खुशबू आ रही है। ब्लैक टॉप और ब्लू जींस में ऐसी दुल्हन तो कभी नहीं देखी। लंबा कद और छरहरा बदन। मदमाती अंखियों में शरारतों का पुलिंदा और सुर्ख होठों पर मृदुल मुस्कान। गोरी कलाइयों में लाख की भरी-भरी चूड़ियां। ठेहुने से नीची जींस से आगे मुस्कुराते हुए पांवों में महावर तो नहीं, लेकिन लाल रंग की नेल पॉलिश से सौंदर्य देखते बनता है। 
सबसे खास बात इस आधुनिक दुल्हन के एक पांव में बंधी सोने की पतली सी पाजेब है, जो मेट्रो की पीली रोशनी में रह-रह कर झिलमिला रही है। ..........मैं इन दिनों मेट्रो में सफर करते समय पांवों की ओर ज्यादा गौर करने लगा हूं। क्योंकि लोगों के चेहरे अब बहुत जल्दी बदल जाते हैं। मगर कदमों से एक सच्चाई बयां होती है। चाहे वो आत्मविश्वास से भरे हों या बहक गए हों, मगर वे चेहरे की तरह नहीं बदलते ............।
आज की नई पीढ़ी में एक बड़ा बदलाव आया है। वह अब अपनी स्टडी या करिअर या फिर अपनी रुचि में केंद्रित रहती है। उन्हें अपने आसपास से कम ही सरोकार रहता है। यह आधुनिक युवती भी उन्हीं में से एक है। मोबाइल पर चैटिंग करती हुई और पसंद के गीत सुनती खुद में खोई हुई। ........... अभी किसी की कॉल आई है। उसने कहा- ‘कहां है अभी। एक घंटे के लिए मिल सकती है क्या। मैं यमुना बैंक उतर रही हूं। वहीं बैठ कर कॉफी पियेंगे। थोड़ी गप्पे मारेंगे। फिर मैं जल्दी लौट जाऊंगी। वरना डांट पड़ेगी घर में। समझी।’ उधर से इसकी सहेली ने क्या जवाब दिया मालूम नहीं। क्योंकि इस दुल्हन ने सोनी का हैडफोन लगा रखा है। 
यमुना बैंक स्टेशन आने में अभी एक स्टेशन बाकी है। इंद्रप्रस्थ से गाड़ी चल चुकी है। वह गेट के किनारे खड़ी हो गई है। मेरी नजर बार-बार उसकी इकलौती पाजेब पर जा टिकती है। आधुनिक परिधान में यह दुल्हन जिस अंदाज में सामने खड़ी है, उसे देख कर फिर सोच रहा हूं कि क्या पायल सच में नारी का आत्मविश्वास बढ़ा देती है। कुछ तो बात है इस पाजेब में। 
यमुना बैंक आ गया है। एक आधुनिक भाव बोध लिए और अपनी परंपरा को संजोती नए दौर की एक और दुल्हन को जाते हुए देख रहा हूं। उसके कदमों में भी वही आत्मिवश्वास है। ...... दरवाजे बंद हो गए के मेट्रो के। यह फिर से इठलाती, मगर सधी हुई चाल से चल पड़ी है। काश कि कोई इसे भी पाजेब पहना दे। छमछम करती यह एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन जाती तो कितना अच्छा लगता। उद्घोषणा की भी जरूरत नहीं रहती। प्लेटफार्म पर इंतजार कर रहे यात्रियों को भी उसके आने की आहट दूर से मिल जाती- ....छम ...छम छनननन...छम छम ......। 
भीड़ छंट गई है। खाली सीट पर बैठ गया हूं। मैंने आंखें बंद कर ली हैं। पाजेब पर एक गीत याद आ गया है अभी। हंसिएगा नहीं। आप भी गुनगुना लीजिए-
इस रेशमी पाजेब की झनकार के सदके
जिसने ये पहनाई है उस दिलदार के सदके.........।

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1 Response

  1. Bhaskar Choudhury says:

    सशक्त स्त्री की कहानी ‘सोने की पाजेब’ बहुत अच्छी लगी. संजय जी को दिली बधाई

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