चरित्रहीन

संजय स्वतंत्र

हर शनिवार, किस्त 19

उस दिन नोएडा जाने वाली मेट्रो के आखिरी कोच में सवार हुआ, तो मुझे नहीं पता था कि स्त्रियों को चरित्रहीनता का प्रमाणपत्र देने वाले उस शख्स से मेरी मुठभेड़ हो जाएगी। मैं दरवाजे के पास कोने की सीट पर बैठा नोटपैड पर लिख रहा था। बगल में बैठे भारी-भरकम अधेड़ के बार-बार हिलने डुलने से मुझे लिखने में बाधा तो आ रही थी, मगर जो बात सबसे ज्यादा खल रही थी, वह थी महिला सहयात्रियों को उसका बेतरह घूरना।

शायद वह इंद्रप्रस्थ स्टेशन था, जहां से दो युवतियां कोच में सवार हुर्इं। हालांकि अगले स्टेशन पर उसकी सहेली उतर गई। यमुना बैंक से जब मेट्रो इठलाती हुई अक्षरधाम की ओर बढ़ी तो अकेली रह गई वह युवती वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित सीट पर ठीक उसी सहजता से बैठ गई, जैसे वह घर में बैठती होगी।

लाल टीशर्ट और नीली जींस में वह खूब फब रही थी। खाली दोनों सीटों पर वह पैर फैलाए बैठी थी। अपने बंधे बालों को उसने खोल कर लहरा दिया था। सेल्फी मोड वाले कैमरे से कभी अपने बालों में अंगुलियां फेरती तो कभी अपनी लिपिस्टिक की लाली ठीक करती। इधर-उधर नजर दौड़ाने के बाद वह मोबाइल पर कोई फिल्म देखने लगी।

उस पर गिद्धदृष्टि डाल चुका मेरे ठीक बगल में बैठा शख्स सहसा उठ गया और उसके सामने जाकर खड़ा हो गया। युवती ने अधेड़ को देखा ही नहीं। इस अनदेखी पर उसने कहा-‘पैर हटाओ। मुझे भी बैठना है।’ युवती ने उसे प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा- क्या है? वह अधेड़ मूर्खों की तरह खड़ा रहा, तो वह बोली- ‘इतनी सीटें खाली हैं। यही क्यों? कहीं और जाकर बैठिए।’ उस शख्स ने जिद की- ‘नहीं। मैं तो यहीं बैठूंगा। मेरी मर्जी।’ तब बिंदास युवती ने साफ कह दिया- ‘नहीं हटाती अपने पैर। क्या कर लोगे। कहीं और जाकर बैठो।’

अधेड़ झल्लाया। मेरे पास आकर बैठ गया। और बोला- कैरेक्टरलेस लड़की। यह शब्द वह लड़की सुन लेती तो हंगामा तय था। मगर यह सब देख-सुन कर मेरा धीरज टूट गया। बेसाख्ता बोल गया-‘कैरेक्टरलेस तुम हो या वह है?’ मेरी बात सुन कर उसका चेहरा तमतमा गया। मैंने उसको घुड़का- ‘ज्यादा तीन-पांच करोगे तो उस लड़की को जाकर बता दूंगा कि सीट खाली न करने पर तुम उसे गाली दे रहे हो। फिर अच्छी कुटाई होगी तुम्हारी।’ मुझे धमकाने के अंदाज में दिख रहे उस शख्स ने मेरी बात सुन कर चुप्पी साध ली। आंखें बंद कर ऐसे गुम हो गया, मानो कुछ हुआ ही न हो।

कोई स्त्री आपकी बात न सुने तो वह चरित्रहीन है। यह है समाज का पैमाना! उसका सर्टिफिकेट हरदम तैयार रहता है, हर उस लड़की के लिए जो नई राह अख्तियार करती है, खुद अपने फैसले करती है या फिर एकतरफा प्यार को ठुकरा देती है। तब वह चरित्रहीन हो जाती है पुरुष की नजरों में।

नए दौर की युवतियां इस समाज से पूछ रही हैं – सदियों से आप मुझे चरित्रहीन कह कर किसका चरित्र दिखा रहे हो। यह एक बड़ा सवाल है। पाषाण युग की मानसिक कंदराओं में बंद पुरुष वर्चस्व वाला यह समाज इसका जवाब नहीं देगा। कुछ दिनों पहले एक युवा लेखिका ने यहीं सवाल किया था-कैसा हो अगर एक बात चरित्रहीनता पर चले। निसंदेह इस पर बहस होनी चाहिए। यही तो वह हथियार है, जिससे पुरुष किसी भी स्त्री का आत्मबल और उसकी संकल्पशक्ति को तोड़ देता है। उसे किसी भी तरह समर्पण करने के लिए।

पिछले दिनों नोएडा जाने वाली मेट्रो में एक युवती ने अपने प्रेमी की चरित्रहीनता की कलई ही खोल दी। अंतिम कोच में बैठे हम सभी यात्री हक्का-बक्का रह गए कि यह कह क्या रही है। संभवत: वह उत्तर प्रदेश के किसी कस्बे की रही होगी। आधुनिक परिधान, मगर मिजाज एकदम खांटी। बिल्कुल एकनिष्ठ नारी। पारा सातवें आसमान पर……..।

मोबाइल पर बात करते हुए वह कभी भावुक होती तो कभी बच्चे की तरह प्रेमी को समझाती। कभी रो पड़ती तो कभी चीखने लगती- ‘जब मैं तुमसे प्रेम करती हूं तो उस एक बच्चे की मां से मिलने बार-बार क्यों जाते हो? तुम क्या सोचते हो, मुझे खबर नहीं। सब पता चल जाता है। अगर यही मैं करती, तो मिनट नहीं लगाते मुझे चरित्रहीन कहने में।’ 
उधर से उसका प्रेमी कुछ कहता, इधर यह युवती उसकी सफाई या दलील पर फट पड़ती- ‘मुझे मूर्ख समझ रखा है। चलो मैं सबको बुलाती हूं। उस औरत को भी। उसके बच्चे की कसम खाकर कहना कि मैं इसका मामा हूं। बोलो। कह सकोगे तुम?’ ….. उसकी आवाज में तल्खी आ गई थी।

चरित्रहीन कौन है? यह युवती या उसका प्रेमी? एकनिष्ठ लड़की प्रेम करती है तो पूरे दिल से करती है। वह किसी दूसरी स्त्री से अपना प्यार नहीं बांट सकती। क्या पुरुष अपनी पत्नी या प्रेमिका को इस बात की इजाजत दे सकता है कि वह किसी और से संबंध बनाए? जब वह ऐसा नहीं कर सकता तो स्त्रियां भी उसे एकनिष्ठ रहने के लिए क्यों न कहें। चरित्र एक शब्द भर नहीं है। यह एक संस्कार है, एक पावन भाव है, जो मनुष्य को अन्य जीवों से अलग करता है।

युवती की बातें सुनते समय उस आखिरी कोच में सन्नाटा पसर गया था। यह सन्नाटा उस समाज का था, जो गलत देख कर भी मूकदर्शक बना रहता है। यह सन्नाटा हर उस मन का था, जो स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर सशंकित रहता है और उस पर दोहरा मानदंड रखता है।

युवती अपनी आंखों से मोती लुटा रही थी। वह फफकते हुए पूछ रही थी- ‘अगर मैं भी छिप कर किसी दूसरे पुरुष से मिलूं, तो क्या तुम मुझे माफ कर दोगे? फिर तुमने कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हें बख्श दूंगी। अगर नहीं सुधरे तो मैं जहर खाकर जान दे दूंगी। देख लेना।’ … और वह फूट-फूट कर रो पड़ी?

मुझे एक फिल्म की एक नायिका का मशहूर संवाद याद आ गया- क्या शर्मा जी, हम थोड़े बेवफा क्या हुए, आप तो बदचलन हो गए।

अशोक नगर मेट्रो स्टेशन आने की घोषणा होने लगी तो मैं सीट से उठ गया। उस युवती के चेहरे की चमक गुम हो चुकी थी। उसका दर्द अब भी आंसुओं से रिस रहा था। स्टेशन पर उतरा, तो यही खयाल आया कि चरित्र की परिभाषा फिर से तय होनी चाहिए। इसके खांचे में उन पुरुषों को भी लिया जाना चाहिए जो स्त्रियों से शुचिता और एकनिष्ठता का प्रमाणपत्र मांगते हैं। जब चाहे चरित्रहीन होने का प्रमाणपत्र दे डालते हैं।

मैं सीढ़ियों से उतर ही रहा था कि मोबाइल की घंटी बज उठी। यह डॉ. उज्ज्वला का फोन था- ‘आफिस पहुंच गए आप? नहीं बस पहुंचने वाला हूं। कोई खास बात?’ मैंने पूछा। उसका जवाब था, ‘कुछ खास तो नहीं, पर पद्मावती को लेकर मचे बवाल पर आपकी नजर है न?’ मैंने कहा- ‘हां है। मगर अब मुझे यकीन हो गया है कि हमारा समाज आज भी जड़ है और वह सदियों पीछे लौटने लगा है।’ ‘सही कह रहे है आप। कभी समर्पण तो कभी संघर्ष तो कभी चरित्र को लेकर स्त्रियों से कब तक जवाब मांगा जाता रहेगा।’ डॉ. उज्जवला ने कहा।

‘फिलहाल चरित्रहीनता को लेकर समाज का जो नजरिया है, उस पर सोच रहा हूं।’ फिर मैंने लास्ट कोच में मिले दो अनुभव उससे साझा किए तो वह बोली- ‘किसी दिन बैठ कर इस पर बात करते हैं। मैं बताऊंगी कि कैसे मुझे भी एक दिन चरित्रहीन करार दे दिया गया। मुझे क्या नहीं सहना पड़ा।’

‘ठीक है उज्ज्वला। जल्द ही मिलते हैं। यह कहते हुए मैं दफ्तर की तरफ चल पड़ा। रास्ते में याद आई उत्तर प्रदेश के गांवों में समाज सेवा कर रही स्वाति की बातें। पिछले दिनों वह बता रही थी कि एक सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारी कर रही लड़कियों को एक गांव के मर्दों ने किस तरह गलत निगाहों से देखा और उनके चरित्र पर सवाल उठाए।

……तो यह है हमारा समाज! समाज के बीच में रह कर लड़कियां सकारात्मक काम करें तो मुश्किल और दूर शहर जाकर पढ़ाई करें या करियर बनाएं, तो मुश्किल। उनका रास्ता हमेशा कांटों से भरा है। क्या उनकी राहों में कोई फूल बिछाएगा? 
क्रमश:

(* मेरी अगली मुलाकात एक ‘चरित्रहीन लड़की’ से। जिसकी पवित्रता और सच्चाई पर न केवल समाज ने बल्कि रिश्तेदारों ने भी सवाल उठाए।)

You may also like...

1 Response

  1. बहुत सटीक शब्दों में आपने ****चरित्र हीन****लिखा संजय जी , कटु सत्य ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *