ये लाल रंग है सृजन का…

संजय स्वतंत्र
किस्त 23, हर शनिवार

पड़ोस के पांडे जी के घर से उनकी पत्नी के चीखने-चिल्लाने की आवाज सुन कर मेरी नींद टूट गई है। सौतेली मां बेटी पर बुरी तरह बरस रही है। घर की इकलौती मासूम सुबक रही है-‘मम्मी फिर गंदा नहीं होगा।’ ….. मैं शोरगुल सुन कर दरवाजे के पास पहुंच गया हूं। समझ में नहीं आ रहा कि आखिर हुआ क्या है। तभी धड़ाम से फ्लैट का दरवाजा खुला। उस निर्दयी महिला ने बाल पकड़ कर खींचते हुए बच्ची को धक्का दिया- ‘ले मर कुतिया। रोज चादर खराब कर देती है। तेरी मां धोएगी आकर। कितनी बार कहा, बिस्तर पर मत सो …. मत सो….। कोने में सोफे पर जाकर लेट। मगर सुनती नहीं।’ वह गुस्से से तमतमाई और बच्ची के कोमल गाल पर तड़ातड़ कई चांटे जड़ दिए।

मैं सन्न रह गया यह देख कर। सौतेली मां फ्लैट का दरवाजा बंद कर चुकी थी। दस साल की अंजलि वहीं दरवाजे पर बैठी बिलख पड़ी। पास जाकर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए मैंने पूछा-‘ऐसा क्या हो गया बेटा कि मम्मा ने आपको मारा?’ नन्हीं बच्ची मुझसे लिपट गई है और फूट-फूट कर रो पड़ी है। उसके रूदन से मेरा हृदय कांप उठा है। उसका बदन थरथरा रहा है। …… उफ्फ। बिन मां की बच्ची। क्या गुजर रही है इस पर? इतना कुछ होने पर भी पास-पड़ोस से कोई झांकने नहीं आया। आज के दौर में पड़ोसी कहां पूछते हैं किसी का दुख-सुख।

……. मैं अंजलि की पीठ थपथपा रहा हूं। उसे दिलासा दे रहा हूं। बच्ची शांत हो गई है। उसे अपने घर ले आया हूं। मेरी मां उसे दूध-बिस्कुट खिलाने के लिए किचन में ले गई हैं। अंजलि अब सहज हो गई है। उससे बात कर मां ने जो बताया, वह बेहद दुखद है। अंजलि के पिता सरकारी अफसर हैं। दौरे पर हैं अभी। कुछ देर में लौटने वाले हैं, अभी मां ने बताया। मैंने अंजलि को कहानियों की किताब देते हुए कहा-‘जब तक पापा आते हैं, तुम इसे पढ़ो।’ दफ्तर के लिए तैयार होते-होते 12 बज गए हैं। मैं अंजलि के लिए चॉकलेट लेने बाजार निकल गया हूं।

बाजार में अंजलि के पापा सरकारी गाड़ी से उतरते दिख रहे हैं। लगता है वे सरकारी दौरे से लौट आए हैं…., मैंने सोचा। पांडे जी से दुआ-सलाम के बाद मैंने सुबह की घटना बताई तो उनका चेहरा उतर गया। ‘ पांडे जी, मासूम बेटी पर क्या गुजर रही है, आपको मालूम नहीं? सौतेली मां उसको पसंद नहीं करती, सबको पता है। मगर आप तो उसके पिता हैं।’ …… सब कुछ जानने के बाद उनकी आंखें छलक उठी हैं। वे मेरा हाथ पकड़ कर बोले-‘चलिए मेरे साथ। सामने केमिस्ट शॉप के काउंटर पर जाकर जोर से बोले- ‘सेनेटरी नैपकिन देना चार पैकेट।’

दुकानवाला उनका मुंह ताक रहा है। कह रहा है- ‘थोड़ा धीरे बोलिए।’ इस पर पांडे जी उस पर बिगड़ गए हैं- ‘क्यों जी? इसमें शर्म कैसी? जैसे दवाइयां बेचते हो, वैसे ही यह स्त्रियों की जरूरत की चीज है।’ उनकी बात सुन कर दुकानदार ने हड़बड़ाते हुए काली पन्नी में पैड लपेट कर दिया तो पांडे जी फिर नाराज हो गए- ‘भाई इसमें ऐसा क्या है, जो मुझे छुपा कर दे रहे हो। यह छुपाने की चीज है क्या?’ सरकारी रुआब वाले अफसर की डांट सुन कर दुकानदार खामोश ही रहा।

मैं तब तक बगल की दुकान से अंजलि के लिए चॉकलेट खरीद चुका हूं। पांडे जी घर की तरफ लौटते हुए बोले-‘निश्चिंत रहिए। अंजलि का मैं अब ध्यान रखूंगा। मुझे पता नहीं था कि उसे डेट आने लगे हैं। मैंने मुस्कुराते हुए कहा -‘पांडे जी बिटिया बड़ी हो रही है। प्रकृति उसे सृजन का हिस्सा बनाने जा रही है। समझ रहे हैं न। इसकी पढ़ाई-लिखाई और सेहत पर भी ध्यान रखना है आपको।’

घर पहुंचा तो अंजलि अपने पापा को देख कर खिल उठी। पांडे जी ने उसे गले से लगा लिया। मैंने उसे चॉकलेट देते हुए कहा- ‘बेटा अब कोई दिक्कत न होगी। पापा रखेंगे खयाल। घर जाओ। कल से स्कूल जाना और मन लगा कर पढ़ना।’ …… अपने फ्लैट की तरफ जाते हुए अंजलि ने मुड़ कर मुझे देखा और पलकें झपकाते हुए मानो कहा-‘थैंक्स अंकल।’ मेरी आंखें भीग उठी हैं, उसके मासूम चेहरे पर खिली मुस्कान देख कर।

घड़ी की सुइयां एक बजा रही हैं। ‘दो सुइयों’ के मिलन के बाद एक का जन्म। यही है समय चक्र का प्रतिफल। इसी तरह स्त्री-पुरुष के मिलन के बाद होता है नव सृजन। मगर इसके आधार मासिक चक्र को हेय दृष्टि से क्यों देखा जाता है। यह शर्मिंदगी का विषय क्यों है, यह समझ से बाहर है। घर को साफ तो सब रखना चाहते हैं मगर महावारी स्वच्छता की जब बात आती है, तो समाज से लेकर सरकार तक में सन्नाटा पसर जाता है। खुद स्त्रियां घरों में पुरुषों से बात करने से कतराती हैं। बेटों को तो पता भी नहीं चलता। एक ऐसा विषय जो अभी तक मां-बेटी के बीच सिमटा है। कई बार इस रिश्ते में भी संवादहीनता रहती है। जैसा कि अंजलि के साथ है।

आफिस के लिए निकल गया हूं। मेट्रो के लास्ट कोच में बैठते ही मोबाइल घनघना उठा है। कॉल रिसीव करते ही दूसरी तरफ से- ‘मैं गोपाल, मुंबई से। कहां हो दोस्त।’ मेरा जवाब- ‘दफ्तर जा रहा हूं। तुम सुनाओ।’ गोपाल बोला- ‘यार पिछले हफ्ते शादी कर ली। सब कुछ इधरइच हुआ। निमंत्रण भेज नहीं सका। सब जल्दबाजी में हुआ। बुरा मत मानना। बरोबर…….।’ ‘ठीक है, नहीं बुरा मान रहा। पर ये बताओ दुलहन कैसी मिली?’ मैंने पूछा। उसने कहा-‘बहुत सुंदर और समझदार। और क्या चाहिए जीवनसाथी से। तीन दिन पहले हनीमून के लिए निकला था। अब लौट रहा हूं मारेथान से।’ ‘वाह! खुश हो न दोस्त।’ मैंने पूछा। गोपाल का जवाब है- ‘हूं भी और नहीं भी।’ मुझे उसकी बात पर आश्चर्य हुआ। ‘क्या मतलब? खुश भी हो और नहीं भी। इसकी वजह?’ मैंने सवाल किया।

गोपाल बता रहा है………. यार हनीमून के लिए गए थे हम। दोपहर में होटल पहुंचे। मीरा बहुत खुश थी। थकान के कारण नींद लग गई। जागा तो देखा कि मीरा वॉशरूम से बाहर निकल रही है। वह कुछ परेशान दिखी तो पूछा, क्या हुआ? तो वह उदास होकर बोली-आज हमारे अरमान पूरे नहीं होंगे। जाइए सेनेटरी नैपकिन ले आइए। जीवन में पहली बार सेनेटरी पैड खरीदने बाजार निकला। दुकान पर मुंह से इतना भर ही निकला-नैपकिन देना। दुकानदार बोला- कौन सी? तो मैंने झल्लाते हुए कहा- अरे वही और कौन सी? वापस आते समय यही सोच रहा था कि मांएं बेटों से यह सब लाने के लिए क्यों नहीं कहतीं। उन्हें भी इसकी जानकारी क्यों नहीं देती कि बेटा बहू की महावारी आए तो उसका खयाल रखना। या बहन को डेट आ रहे हैं, जाओ, पैड ले आओ। इसमें संकोच कैसा।

………गोपाल होटल लौटा तो मीरा बार-बार वॉशरूम जा रही थी। उसे नैपकिन देते हुए बोला- ‘शाम हो गई है। तुम फ्रेश होकर आओ। नीचे लांज में चाय पीने चलते हैं।’ ……..कुछ देर बाद गुलाबी रंग के लहंगे और टॉप में मीरा वॉशरूम से बाहर निकली तो गोपाल को लगा जैसे कोई परी चली आई हो। होटल के लांज में जब वे पहुंचे तो मीरा ने टोका-‘उदास क्यों हो?’ इस पर उसका जवाब है-‘कहां हूं। वो तो तुमको परेशान देख कर उदास हो गया था।’ ‘…..अच्छा जी। जैसे मैं समझती नहीं।’ मीरा ने उसे छेड़ा। इस पर गोपाल ने कहा- ‘देखो मीरा, सुहागरात में वहीं सब कुछ नहीं होता। हमें अब एक दूसरे को समझने का इससे बेहतर मौका कहां मिलेगा। आज हम पूरी रात बातें करेंगे। एक दूसरे की भावनाओं को समझेंगे। कितना अच्छा अवसर दिया है ईश्वर ने हमें।’

गोपाल की बातें सुन कर मीरा उसकी पत्नी से ज्यादा दोस्त बन चुकी थी। रूम में लौटने पर उसने गोपाल को चूमते हुए उसके कानों में हौले से कहा-‘तुम मेरे हसबैंड ही नहीं, माई डियर फ्रेंड भी हो अब। समझे।’

….. तो गोपाल का यह हनीमून उन मर्दों के लिए संदेश है जो स्त्रियों को महज भोग्या समझते हैं। उन दिनों में उसे जानने की कोशिश नहीं करते कि वे किस सिंड्रोम से गुजर रही हैं। भारत जैसे देश में जहां इस विषय पर चर्चा करना किसी को अच्छा नहीं लगता, वहां अजय जैसे युवा भी हैं जो उन खास दिनों का खयाल करते हुए हर महीने कैलेंडर पर निशान लगाते हैं और अपनी हमसफर के चेहरे पर मुस्कान के लिए हर तरह का जतन करते हैं।

……… मेट्रो चल रही है। मुझे याद आ रही है अजय की। तब उसकी उम्र यही कोई 35 साल रही होगी। शादी हुए अभी कुछ दिन ही हुए थे कि उसे इंग्लैंड जाना पड़ गया कंपनी के काम से। दस दिन बाद लौटा तो उसने प्रियंका की गोरी कलाइयों पर प्यारा सा एक बैंड बांध दिया। उसने मुस्कुरा कर पूछा-‘ये क्या है?’ तो अजय का जवाब था-‘जल्दी ही पता चल जाएगा। मगर इसे उतारना मत। ये मेरा तोहफा है।’

दो दिनों बाद ही अजय ने प्रियंका की कलाइयों पर बंधे तापमान सूचक बैंड से जान लिया कि वह पीएमएस यानी प्री मेंस्ट्रुअल सिंड्रोम से गुजरने वाली है। उसकी थोड़ी उदासी, थोड़ा गुस्सा और चिड़चिड़ेपन पर अजय ने कोई प्रतिकूल इजहार नहीं किया। बल्कि उसके लिए उन दिनों कभी चॉकलेट तो कभी फूल तो कभी उसकी पसंद की मिठाई लेकर दफ्तर से लौटता। इस पर प्रियंका मुस्कुरा भर देती। उसकी दिन भी की थकान मिट जाती, पति के इस प्यार पर।

…….अगला स्टेशन कश्मीरी गेट है। उद्घोषणा हो रही है। मेरे मोबाइल की घंटी फिर बज उठी है। कॉल रिसीव करते ही फेमनिज्म इंडिया #FEMINISM INDIA की हिंदी संपादक और मुहिम #MUHEEM की संस्थापक स्वाति सिंह का पहला वाक्य-‘गुड आफ्टरनून सर। कैसे हैं आप?’ ‘ठीक हूं। कैसी चल रही है तुम्हारी मुहिम?’ मैंने पूछा। वह बता रही है- ‘सर, गांव-गांव जाकर माहवारी स्वच्छता पर काम कर रही हूं। उनकी चुप्पी तोड़ रही हूं। उन लड़कियों का डर दूर कर रही हूं, जिनकी अभी महावारी नहीं आई है। या कुछ समय पहले आई है।’

स्वाति से बात करते हुए अंजलि का मासूम चेहरा एकबारगी आंखों के आगे घूम गया है, जिसे सेनेटरी पैड न मिलने पर यातना सहनी पड़ी है। उन गांवों में क्या हाल होगा, जहां मांएं खुद अपने लिए पैड नहीं खरीद पातीं। पिछले दिनों अभिनेत्री ट्विंकल खन्ना ने कहा कि पैरों के बीचे गंदे पुराने कपड़े, मोजे या कागज के टुकड़े लगा कर बैठने की आप कल्पना कीजिए। क्या उस हालत में लड़कियां बैठ कर पढ़ सकती हैं? यह अजीब बात है कि स्वच्छता अभियान चलाने वाले इस देश में सेनेटरी नैपकिन पर 12 फीसद कर है लेकिन झाड़ू टैक्स से मुक्त है।

उधर, स्वाति सिंह बता रही हैं- ‘सर पैड बांटने से कुछ न होगा। सबसे पहले महावारी स्वच्छता और जागरूकता की जरूरत है। भ्रांतियां दूर करने की जरूरत हैं। फिर पैड इतना महंगा है कि गांवों की महिलाएं एक ही नैपकिन को तीन- चार बार प्रयोग करती हैं। जिससे प्लास्टिक के बने ये पैड संक्रमित हो जाते हैं। नतीजा महिलाओं को दूसरी कई बीमारियां घेर लेती हैं। फिर पैड से हेल्थ हाइजिन वाली बात ही कहां रही?’

उसकी बात सुन कर विचलित हो गया हूं। ‘……. तो फिर उपाय क्या है स्वाति?’ मैंने पूछा। ‘कुछ ज्यादा नहीं सर। बस कॉटन पैड को बढ़ावा दिया जाए। सरकार इसके लिए कुटीर उद्योग लगाने में महिलाओं की मदद करे। इससे उनको रोजगार मिलेगा और प्रकृति व स्वास्थ्य को भी नुकसान नहीं होगा।

…..इसीलिए हम गांवों में जाकर महिलाओं को अपना पैड खुद बनाना सीखा रहे हैं। गांवों में जहां दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष चल रहा हो, वहां सेनेटरी पैड खरीदने की नसीहत देना बेमानी है। तो सर, महिलाएं पुरानी साड़ियों-चादरों और फटे पेटीकोट-ब्लाउज और जींस के टुकड़े से कॉटन पैड बना रही हैं। इससे जहां खर्चा बचता हैं, वहीं इसे बेच कर कुछ रुपए भी वे कमा लेती हैं। सर, यह नारी सशक्तीकरण की ओर बढ़ता कदम है, जिसे कोई देख नहीं रहा।’

………अगला स्टेशन राजीव चौक है। उद्घोषणा हो रही है। स्वाति से बात करते हुए प्लेटफार्म पर उतर रहा हूं। वह बता रही है- हम कैम्प लगा कर पुरुषों को भी समझा रहे हैं कि भाई, उन दिनों में पत्नी और बेटी की दिक्कत को समझिए। उन्हें घर के काम से दो दिन तो छुट्टी दीजिए। और कुछ नहीं तो घरेलू काम में उनकी मदद कीजिए।

मैं प्लेटफार्म नंबर तीन की ओर जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ रहा हूं। उधर, स्वाति बता रही है-स्त्रियों के मन की बात जानने के लिए हम कला प्रतियोगिता भी कर रहे हैं सर। क्योंकि जो बात वे कह नहीं पातीं, उसे चित्रों से अभिव्यक्त कर देती हैं। पिछले दिनों हमने आदर्श ग्राम नागेपुर में प्रतियोगिता कराई। इनमें छह साल की बच्ची भी शामिल हुई, जिसने पैड का चित्र बना कर दूसरी लड़की की मदद से लिखवाया-जब मेरा पीरियड शुरू होगा तो मैं डरूंगी नहीं। उसकी यह भावना हम सबके दिल को छू गई। यही लगा कि अगर इस बच्ची को हम जागरूक करने में सफल रहे तो इसका मतलब हम सही दिशा में हैं।

स्वाति से बातचीत खत्म होने के बाद डॉ. उज्ज्वला के साथ पिछले दिनों कॉफी पीते हुए उनकी कुछ बातें याद आ गई। वह बता रही थीं कि पीएमएस की समस्या तो 75 फीसद महिलाओं में हैं। कमजोरी और पेट में मरोड़ व दूसरी कई समस्याएं अधिक ब्लीडिंग की वजह से है। उन्हें चक्कर आना और सिरदर्द आम है। इस तरफ कोई ध्यान नहीं देता कि इन दिनों महिला को न्यूट्रिशन की जरूरत है। पौष्टिक खाना न मिलने से किशोरियां एनीमिया का शिकार हो जाती हैं। वहीं महावारी में स्वच्छता न रखने से समस्या गंभीर हो जाती है।

डॉ. उज्ज्वला का यह भी कहना था कि स्कूलों में सेनेटरी पैड भेजे जा रहे हैं, पर जागरूकता न होने से लड़कियां मांगती नहीं। उन दिनों दाग दिखने की वजह से स्कूल भी नहीं जाती। अगर बच्ची स्कूल ही नहीं जाएगी तो इन सब बातों के बारे में जानेगी कैसे। मां-बाप को भी सरकारी सुविधाओं के बारे में मालूम नहीं होता।

नोएडा सिटी सेंटर की मेट्रो आ रही है……सोच रहा हूं कि स्त्री जन्म से लेकर मरने तक न जाने कितने स्तरों पर संघर्ष करती है। कभी आंसू पीती है, तो कभी हमारे जीवन में खुशियां बिखेरती है। बदले में हम उसे क्या देते है? क्यों नहीं हम उनके उन पांच दिनों को हैप्पी डेज में बदल देते। कोई तो पहल करे? कोई तो इस पर बात करे?

मेट्रो आ गई है। ……सोच रहा हूं कि इस मुद्दे पर किससे बात करूं? अक्षय कुमार से करता, मगर वे तो फिल्म पैडमैन बना कर आ चुके। अरुणाचलम मुरुगंणथम के जीवन पर उनकी फिल्म कैसी है, मालूम नहीं मगर उनकी ईजाद की गई कम लागत में सेनेटरी पैड बनाने वाली मशीन ने सबका ध्यान खींचा है। काश कि यह मशीन देश भर की ग्रामीण महिलाओं तक पहुंचा दी जाए तो कितना अच्छा हो। अक्षय सही कहते है कि जीएसटी को छोड़िए, आप महिलाओं को मुफ्त पैड देने की बात कीजिए।

इस वक्त मुझे दामिनी यादव और शुभमश्री की कविताएं याद आ रही हैं। दोनों लंबी कविताएं हैं। जिन्हें यहां लिखना संभव नहीं। फिलहाल सांत्वना श्रीकांत की पिछले दिनों लिखी गई कविता का एक हिस्सा आपसे साझा कर रहा हूं, जो स्त्री मन की विरलतम अभिव्यक्ति है-

मैंने तो पूरी सृष्टि रची है
अपने इस लाल रंग से।
तुमने दिया था श्वेत,
मैंने जब इसे रंगा
अपने लाल रंग से,
नौ माह कोख में रख किया
समर्पित तुम्हें।
फिर तुम्हें मिला तुम्हारा ‘लाल’
हुए तुम पूरित, सम्मानित, गर्वित।
फिर भी मेरा यह लाल रंग
क्यों है अछूत-अशिष्ट।

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