डॉ संध्या तिवारी की लघु कथा ‘ठेंगा’

उसके आगे तंगी हमेशा मुंह बाए खड़ी रहती थी लेकिन देह को धंधे के लिये उपयोग में लाना उसे कभी मंजूर न था लेकिन गरीबी कैसे दूर की जाये इस का उपाय वह खोजती ही रहती थी। इसी क्रम में किसी ने उसे बताया , कि वह गुरुवार का व्रत और विष्णु भगवान की पूजा करे । विष्णु जी तो उसके इष्ट देव भी हैं। बहुत श्रद्धा है श्यामा की उन पर।
अरे ! इसमें कौन बड़ी बात। फांके तो जब तब हो ही जाते हैं , अब व्रत के नाम पर कर लेंगे। उसने सिर को लापरवाही से एक ओर झटका, जैसे मन ही मन कह रही हो चलो ये करके भी देख लें।

आज गुरुवार था ,उसका पहला उपवास।

पड़ोस की आंटी सुबह सुबह उसके पास आकर बोली.  ” एक काम है श्यामा ,घर बैठे तुझे बहुत सारे पैसे मिलेंगे। बस फोन पर तुझे बातें करनी हैं। वह भी मीठी मीठी। लेकिन शर्त है कि फोन कभी भी आ सकता है ,और उसे उठाना ही पड़ेगा और बातें भी तब तक करनी पड़ेगी तब तक ग्राहक चाहेगा। तू करेगी क्या ?”

“हां ,हां ।क्यूं नहीं चाची । जरूर करूंगी ।” श्यामा चहक उठी ।

भगवान विष्णु के प्रति मन श्रद्धा से भर उठा। आज पहले गुरुवार को ही काम मिल गया।
उसने जल्दी से नहाया-धोया। पटली पर भगवान विष्णु का फ्रेम किया फोटो रखा और पूजा शुरू ही की थी कि फोन आ गया। शर्त के अनुसार उसे फोन उठाना ही था। उसने फोन कान पर लगाया नाम काम की साधारण औपचारिकता के बाद  ग्राहक धीरे धीरे मीठी बातों पर आ गया। श्यामा का देवता को फूल चढ़ाता हाथ कांपने लगा। मीठी बातों का किसी  अजनबी के साथ पहला अनुभव था ।वह शर्म से गड़ी जा रही थी ।भुरभुरी मिट्टी सा उसका अस्तित्व ढांचे से फिसलता जा रहा था शर्त के मुताबिक उत्तर प्रतिउत्तर तो देने ही थे लेकिन श्यामा सामने विराजमान भगवान के उस चित्र को और सहन नही कर पा रही थी। उसे लगा जैसे भगवान विष्णु न उससे नजरें मिला पा रहे है और न वह उनसे।
उसने जल्दी से उठाकर विष्णु जी के चित्र का चेहरा दीवार की ओर कर दिया।और खुद उनकी और पीठ करके मीठी बातों में उलझ गयी
आखिर पैसे ने ज़मीर को ठेंगा दिखा ही दिया।

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