दूधनाथ सिंह कभी मरते नहीं, दिलों में रहते हैं

मैं

मरने के बाद भी
याद करूँगा
तुम्हें

तो लो, अभी मरता हूँ
झरता हूँ
जीवन
की
डाल से

निरन्तर
हवा में
तरता हूँ
स्मृतिविहीन करता हूँ
अपने को
तुमसे
हरता हूँ ।”

 

इन पंक्तियों के रचयिता मशहूर साहित्यकार और साठोत्तरी कहानी के नायक दूधनाथ सिंह नहीं रहे। 11 जनवरी गुरुवारी की देर रात इलाहाबाद के फीनिक्स अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। ववो प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे और पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में भर्ती थे। बुधवार देर रात दिल का दौरा पड़ने के बाद उन्हें वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया गया था लेकिन वो उबर नहीं सके। गुरुवार रात 12 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली।

उनकी कालजयी रचनाएं

आखिरी कलाम, लौट आ ओ धार, निराला : आत्महंता आस्था, सपाट चेहरे वाला आदमी, यमगाथा, धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे ‘एक और भी आदमी है’ ‘अगली शताब्दी के नाम’ ‘युवा खुशबू’। उन्होंने एक लंबी कविता- ‘सुरंग से लौटते हुए’ भी लिखी है।

उनकी नज़र हम पर रहेगी

ख़बरों के मुताबिक उनकी आंखें मेडिकल कॉलेज को दान की जाएगी। उनके बेटों और बेटियों ने उनकी इच्छा के अनुरूप यह फैसला लिया है।

 

उनके निधन से हिन्दी साहित्य जगत में शोक की लहर है। फेसबुक पर उन्हें वरिष्ठ से लेकर नए लेखक तक श्रद्धांजलि दे रहे हैं।

वरिष्ठ और मशहूर कवि-कथाकार उदयप्रकाश ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है

‘’सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के सृजन पर ‘आत्महंता आस्था’ जैसी पुस्तक, जो मुक्तिबोध के ‘कामायनी एक पुनर्मूल्यांकन’ जैसी अपनी सीमितिताओं के बावजूद एक अनिवार्य संदर्भ विवेचना पुस्तक है और फिर एक के बाद एक अविस्मरणीय कविताएँ … और उपन्यास, जिनमें ‘ आख़िरी कलाम’ सम्मिलित है …. और ‘… धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ … जैसी कहानियाँ ….

‘हक़ मेरी धरती’ , ‘कृष्णकांत की खोज में दिल्ली यात्रा’ …. वह विस्थापन अपनी ही भाषा से, वह अवमानना … वह तिरस्कार …
बहुत विचलित, उद्विग्न और शोकग्रस्त है … पराभूत, हताश … यह चेतना।

वे चले गये। 
अभी कुछ ही दिन हुए, उनसे बातें होती रहतीं थीं।

कोई अन्य नहीं था, न है, उनकी प्रतिभा, रचनाशीलता, साहित्यिक अवदान में उनके आसपास।

यह इलाहाबाद का ही नहीं, जनवादी, मानवतावादी, प्रगतिशील भारतीय साहित्य की अपूरणीय क्षति है।

‘आख़िरी कलाम’ के महान रचनाकार को 
आख़िरी सलाम !

गहरा दुख है। आघात।

उनकी स्मृतियाँ अमर रहें।”

 

वरिष्ठ कवि जयप्रकाश मानस ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है

“रात आधी से अधिक हो चुकी है। इस वक़्त यह जानकर बेहद दुखी और बेचैन हो उठा है मन कि दूधनाथ सिंह भी अब चले गये।

अपनी कहानियों के माध्यम से साठोत्तरी भारत के पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक एवं मानसिक सभी क्षेत्रों में उत्पन्न विसंगतियों को चुनौती देनेवाले सुप्रसिद्ध कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार एवं कवि दूधनाथ सिंह का कृतित्व सदैव हमारे मन-मनीषा में रहेगा!

मनीषी रचनाकार को सादर नमन!”

 

वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने लिखा है

“दूधनाथ सिंह हमसे विदा हो गए । यह उनके प्रियजनों के लिए अविश्वनीय खबर है । इतने जिंदादिल लेखक को मृत्यु ने अपना आखेट बना ही लिया । पिछले कई वर्षों से मेरे प्रति उनका अप्रतिम अनुराग था । वे मेरी कविताएं और कहानियां पढ़ कर जरूर फोन करते थे । वे लम्बी और आत्मीय बातें करते थे । अभी दो साल पहले फैज़ाबाद के शहीद शोध संस्थान ( जिससे मैं जुड़ा हुआ हूँ ) ने उन्हें सम्मानित किया था । वे हमारे बीच दो दिन तक थे । कवि मित्र अनिल कुमार सिंह के साथ हम लोगो ने अयोध्या का भ्रमण किया था । हम लोगो ने आखिरी कलाम के पात्रों से मुलाकात की थी । उस अनुभव को भूला।नही जा सकता है । एक साथ उन्होंने कई विधाओं में हस्ताक्षेप किया है ।
आगे पीछे सभी को जाना है लेकिन कुछ लोगो का जाना हमारे लिए बड़ा दुख होता है । यह आघात नही बज्राघात है । अपने प्रिय लेखक को भरे मन से श्रद्धांजलि ।”

 

कथाकार धीरेंद्र अस्थाना लिखते हैं

“दूधनाथ सिंह नहीं रहे, आई रिपीट दूधनाथ सिंह नहीं रहे, जब तक रहे दूधनाथ सिंह रहे । नमन”

 

जनवादी लेखक संघ बिहार ने भी फेसबुक पोस्ट के जरिए उन्हें श्रद्धांजलि दी है

“जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष,प्रख्यात कहानीकार और चर्चित उपन्यास ‘आखिरी कलाम’के रचनाकार आदरणीय दूधनाथ सिंह का निधन हो गया। उनके निधन से जनवादी-प्रगतिशील साहित्याकाश से एक लाल सितारा टूट गया।यह हमारे लिए अपूरणीय क्षति है।श्रद्धेय दूधनाथ जी के प्रति कोटिश:श्रद्धांजलि।”

 

 

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