तलवार की धार पर खरबूजे की तरह रखी दुनिया में आप कैसे सो सकते हैं

अरविंद श्रीवास्तव

’तुम्हें सोने नहीं देगी’ सरला माहेश्वरी की दूसरी काव्य-कृति है।  संग्रह की तमाम कविताएं साम्राज्यवादी सामंती सोच को बेनकाब करती है। ये कविताएं जहाँ आदमी में धंस रही जड़ता, अकर्मण्यता एवं लिज़लिजेपन को झकझोरती हैं वहीं सत्ता को और अधिक मानवीय बनाने की बात करती है। नई सदी की नई समस्याओं से दो-चार करती उनकी कविताएं बाजारवाद में परफ़्यूम की जगह इत्र की सुगंध बिखेरती है निश्छल, कोमल, मुलायम.. अपनी ठसक के साथ!
वस्तुत: संग्रह की तमाम कविताएं मानव के जागने और सोने के बीच की संघर्षगाथा है, जिसे हम झेलते हैं.. भोगते हैं। यथार्थ की आंखों में बंधे साम्प्रदायिक व पूंजीवादी पोल-पट्टी को सरला जी ने जिस चतुराई से खोला है, तोड़ा है वह समकालीन कविता में अभिनव प्रयोग है.. -वे बहुत/ हाँ, हाँ बहुत डरते इंसानों से/ देखो ! तुम्हें भी तो डरा दिया था उन्होंने/ पानसारे, डाभोलकर, कलबुर्गी और मुझ जैसे बुढ्ढे इंसानों से/ अब बताओ तुम मेरे पास बैठे हो/ लग रहा है कोई डर मुझसे !
हिटलर सिर्फ़ जर्मनी में नहीं होता.. और सच कहें तो यह प्रत्येक प्राणी मात्र में निहित है, जो सुविधानुसार इस मानव जीवन उर्फ़ ’यातना शिविर’ में गैस विसर्जित करता है। 80 दशक की दुनिया 40 के दशक से कम भयावह नहीं थी। लैतिन अमरीका और अफ़्रीकी देश अंगोला के दृश्य हमारे आंखों के समक्ष अनायास ही नहीं उभरते। बतौर एक आम आदमी मैंने भी उस काल को जिया है। तलवार की धार पर खरबूजे की तरह रखी दुनिया में बच्चों की सलामती और भविष्य की चिंता तब भी सालती थी हमें। आज नए जाल लेकर बैठे पुराने शिकारियों एवं ’भक्तों’ से बचने की जरूरत है।  एक गहरी पीड़ा सरला जी की कविता ’हत्यारे समय में’ भी दिखती है-
आओ! खुद को बचा लें!/ हत्या से पहले/ कर लें आत्म की हत्या!/ पहन लें विदूषक की काया!
संग्रह की कविताएं सत्तापक्ष से उठी नाल के विरुद्ध आमजन के जंग का एलान है.. जिसे सलाम करने से हमें नहीं चूकना चाहिए !
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पुस्तक : तुम्हें सोने नहीं देगी (कविता संग्रह)
लेखिका : सरला माहेश्वरी
प्रकाशक : सुर्य प्रकाशन मन्दिर
दाऊजी रोड(नेहरू मार्ग), बीकानेर
मूल्य : चार सौ रुपये मात्र

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