उदयराज की कहानी ‘विश्वास-यात्रा’

उदयराज

रितेश और मोहिनी बड़ी सतर्कता से प्लेटफॉर्म पर पहुंच एक कोने में दुबकने के अंदाज़ में बैठ गए। दिल्ली के लिए टिकट आते ही ले लिया था। उनकी नज़रें निरंतर प्लेटफॉर्म पर आने के सभी प्रवेश द्वारों पर घूम रही थीं और कान अनाउंसमेंट पर लगा हुआ था। यूं तो मोहिनी को पूरा यकीन था कि उसका पति मानस कोई दौड़ धूप करने वाला नहीं है। उसे तो इस बात की भी खबर नहीं होगी कि उसकी मोहिनी उसे यूं धत्ता बता कर नौ दो ग्यारह हो जाने वाली है। वह तो पूरे विश्वास से लबालब भरा कहीं गप्पे मार रहा होगा। लौटेगा आधी रात को, और मोहिनी को न पा इस ख्याल में सो रहेगा कि उसकी मोहिनी किसी बहन के यहाँ रूक गई होगी। ऐसा तो हमेशा ही होता रहता है। लेकिन धक्का तो तब लगेगा जब दोनों बहनों से पूछ कर ‘नहीं’ सुनना पड़ेगा। तब जुटेगी पूरी जमात। जुटे उसकी बला से। कौन सा उन लोगों ने मोहिनी की इज्ज़त का ख्याल किया था। वो मिलते हैं तो मिलें एक दूसरे से । मोहिनी अब उन मिलने वालों में नहीं होगी। मिलने की गुंजाइश ही कहाँ छोड़ी थी मानस ने। आशा का जो घरौंदा कभी बना था, टिका तो था इतने दिनों तक, भले ही रंगीन नहीं था बहुत। मगर…मगर…. । तभी गूँजते अनाउंसमेंट से उन्हें अपनी गाड़ी की सूचना सुनाई पड़ी। मोहिनी ने रितेश की ओर ताका। वह बैग सम्हाल रहा था। मोहिनी ने गोद में सोई बच्ची को कांधे से लगाया और रितेश के पीछे पीछे चल पड़ी। सभी हड़बड़ी में थे। जैसे गाड़ी उन्हें छोड़ कर चली जाएगी। धक्कम-धुक्कम से गुजरते हुए रितेश और मोहिनी को भी बैठने की जगह मिल गई। रितेश ने गाड़ी की खिड़की से ही पानी और कोल्ड-ड्रिंक की बोतलें खरीद ली। थोड़ी देर में ही उनकी घबराहट को शांत करती गाड़ी स्टेशन पर सरकने लगी। अन्य यात्रियों को छोड़ने आए अपने या अपनों जैसे सभी हाथ मिला कर, हिला कर विदाई दे रहे थे। और कुछ लोग खिड़कियों से ही बाहर छूटते जा रहे परिजनों के लिए हाथ हिला रहे थे। हिलते हाथों को देख बिन पहचाने ही कोई न कोई उसे अपनी विदाई मान ले रहा था। रितेश हमेशा की तरह यहाँ भी शांत था। उसकी शायद यह पहली लंबी यात्रा थी वह भी अंजान शहर की ओर अंजान लक्ष्य की ओर। बस साथ थी मोहिनी और उसकी बच्ची, जिन्हें उसने विश्वास दिलाया था कि वह उनकी ज़िंदगी को खुश रखने के लिए ही उनके साथ था।

       गाड़ी रफ्तार पकड़ रही थी। मोहिनी के भीतर भी कुछ तेज़ी से घुमड़ने लगा था। अपनों या अपने कहे जाने वालों से बिछड़ कर अनजानी जगह जाने की दूसरी यात्रा थी यह उसकी। पहली बार तो सचमुच ही वह अपने जन्म-दाताओं जैसे अपनों से बिछुड़ कर मानस के संग वह कलकत्ते आई थी। तब वह आशा से भरी विहंस रही थी।उसके जैसे पौ बारह थे। मानस ने उसे उसकी आशा के बगीचे में किसी देवी की तरह स्थापित किया था। देहात में रहने वाली मोहिनी मानस की बातों से मुग्ध हो गई थी। मानस उसे ‘सच्चा’ और अच्छा  लगा था। मानस ने अपने बारे में कुछ भी बहुत ज्यादा बढ़ा चढ़ा कर नहीं कहा था। कलकत्ता पहुँच कर मोहिनी को मानस की सभी बातें सच मिली थीं । धक्का थोड़ा सा लगा था मोहिनी को, रहने की जगह देख कर।उसके मन में कलकत्ता की सुनी-सुनाई तस्वीर थी-ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएँ, रात में रोशनी से जगमगाता शहर, ट्राम, बस, टैक्सी से भरा शहर। लोगों की बाढ़ में डूबा शहर। मगर वह जहां पहुंची थी, वह एक मजदूर बस्ती थी। सड़क थी, मगर साथ ही गलियां और गंदगी भी गुत्थम गुत्था थे। जूट मिल थी। मानस उसी में ‘भागा’ पर काम करता था। यह ‘भागा’ कोई अच्छा सा पद होगा, यही समझा था मोहिनी ने। बहुत बाद में जा कर उसने जाना कि कोई परमानेंट आदमी अपनी जगह किसी को काम पर लगा देता है तो उसे ‘भागा’ पर काम करनेवाला कहा जाता है। कुछ पैसे तो प्रायः मिल ही जाते थे। और जब ‘भागा’ नहीं मिलता था तब वह लोकल ट्रेन में भुनी हुई बादाम बेचता था। ट्रेन में ऐसे सामान बेचने वालों को हाकर कहा जाता है। रेल की ओर से इन लोगों का भी ‘हाकर-पास’ होता है। यह पास उसके मानस के पास भी है। मानस को भी इस पास पर बहुत नाज़ है। मोहिनी को ‘भागा’ से बढ़िया ‘हाकर’ का काम लगता था। उस काम में मोहिनी की भी मदद रहती थी। वह बादाम को साफ कर बड़े मन से भुनती थी, नमक,अदरक और मिर्च को मिला कर बादाम का ‘नमक’ बनाती थी। मोहिनी का बनाया नमक इतना स्वादिष्ट होता था कि दूसरे हाकर मानस से वह नमक खरीद लेते थे। इस तरह मानस की दोहरी आमदनी हो जाती थी। मानस कमाई से खुश होता तो मोहिनी को सिनेमा भी दिखा लाता था। कभी कभी उसी फिल्मी अंदाज़ में मोहिनी का हाथ पकड़ कर चूम लेता और कहता ‘ ये हाथ मेरी कंगाली को दूर भगाने वाले हाथ हैं। ये मानस का भाग्य बनाने वाले हाथ हैं’। और उन हाथों को अपने सीने से लगा लेता। मोहिनी तो धन्य हो जाती। वह भी आगे बढ़ कर पति को सीने से भींच लेती।

    दौड़ती हुई गाड़ी अचानक हिचकोले खाने लगी। मोहना ने खिड़की से बाहर झाँका। दिन डूब चुका था। रात उतर रही थी। गहराई नहीं थी अभी। मगर जगह जगह बल्ब चमकने लगे थे। रितेश ने कोल्ड-ड्रिंक की बोतल बढ़ाई थी, मोहिनी ने देखा मगर थाम न पाई क्योंकि गोद में पड़ी बच्ची उसी समय कुनमुना उठी थी। दूध की बोतल निकाल बच्ची के मुंह में निपल पकड़ा कर ड्रिंक ले लिया। कुछ ठंडे घूंट गले के नीचे उतरे तो कुछ अच्छा लगा।

     अच्छा लगा था मानस का उसकी ज़िंदगी में आ जाना भी। देहात या गाँव में पलने बढ़ने पर भी मोहिनी में अपने प्रति गजब का विश्वास था और था एक सम्मान का भाव। वह सब कुछ औरों की मर्ज़ी से ही नहीं कर सकती थी। उसके कुछ करने में उसकी मर्ज़ी, उसकी इच्छा, उसकी सहमति तो होनी ही चाहिए। अपनी इसी आदत के कारण वह गाँव के दबंगों की आँख का कांटा बन गई थी। खेत, खलिहान, बगीचे में कई बार उसे घेरने की कोशिश को वह नाकाम कर चुकी थी। मोहिनी के घर वाले जानकर भी अनजान बने रहते थे। उनकी मजबूरी का पूरा-पूरा ख्याल था मोहिनी को। इसलिए उसने कभी इस बात पर हो-हल्ला नहीं मचाया और न रोया-धोया। लाभ भी नहीं था। उन्हीं दिनों मानस का गाँव आना हुआ था, और अचानक घर वालों की हुलस भी उसने देखी थी। मोहिनी में कोई हुलस नहीं थी। बस एक राह मिल रही थी जिससे वह कभी भी लुट जाने वाली अपनी इज्ज़त को बचा सकेगी। फिर माता-पिता भी तो तैयार दीख रहे थे। मानस ने बात चलते ही कहा था, ‘भरपूर आशा रख सकती हो ….’ ।

मोहिनी सम्मान सहित मानस के साथ आ गई कलकत्ता। मानस के साथ एक हुलस सी बनी थी जो बीच-बीच में उफान भी मार लेती थी। इस हुलस और इस उफान के बीच एक बच्ची का जन्म हुआ। बच्ची को लेकर और भी सपने उगे। सपने तो सपने होते हैं। देखे ही जा सकते हैं बल्कि मानस ने हर रोज़ सपना बुना, खुश हुआ और सो रहा। हर रात बुनना, खुश होना और सो रहना होता। अगली सुबह फिर वही चूल्हा, वही कढाही, वही बादाम। वही नमक, वही फेरा फिर डेरा।

      गाड़ी किसी जंक्शन पर रुकी थी। रितेश उतर कर खाने के लिए कुछ लेने चला गया । गाड़ी चल पड़ी । मोहिनी ने देखा रितेश आसपास न था। वह घबड़ा उठी। कहीं…. । एक आशंका से भर उठी। मगर अगले ही पल पत्तल समेटता रितेश सामने आ गया था। मोहिनी ने अपनी घबडाहट छुपा ली थी। वह रितेश को व्यर्थ ही परेशान नहीं करना चाहती थी। वह तो उसे ‘विश्वास’ दिलाने वाला शख्स था। आशा तो उसकी मानस ने तोड़ी थी। पिछली दो ही घटनाओं ने मोहिनी को मानस से दूर कर दिया था। बात फिर से इज्ज़त और सम्मान की ही थी।

       बच्ची तीन वर्ष की हो गई थी। मोहिनी उसे लेकर बहुत सतर्क रहती थी। आए दिन छोटी बच्चियों के संग भी कुकृत्यों की घटनाओं से वह भी चिंतित रहती थी। अपनी बच्ची की सुरक्षा उसकी ज़िम्मेदारी थी। मानस तो सुबह से आधी रात तक अपने काम में ही लगा रहता था। एक दिन वह थोड़ी देर के लिए पास की दूकान में अदरक लेने गई थी। वहीं कोई मानस को जानने वाली मिल गई तो बातचीत करने में कुछ देर हो गई। लौटी तो घर में बच्ची को नहीं पाया। बाहर तो आते हुए ही देखा था। मोहिनी बेचैन हो उठी। अगल बगल के घरों की ओर दौड़ी। दो चार घरों के बाद एक घर में उसकी बच्ची रोती हुई खड़ी थी। पैंट उतरी हुई…… । और उस घर में रहने वाले बूढ़े काका अपनी धोती सम्हालते दीखे। मोहिनी का सिर भन्ना गया। उसकी आँखों के आगे अपने गाँव के दबंगों की सुनी देखी हरकतें कौंध गईं। मोहिनी ने जलती हुई आँखों से उस घर के मालिक बूढ़े को निहारा। वह शायद मोहिनी के अचानक आ जाने और शक भरी नज़रों से देखने के कारण थर-थरा उठा था। लड़खड़ाती जुबान से बोल उठा,’बच्ची को सू-सू लगी थी तो पैंट उतार दिये हम….बस। ‘ मोहिनी ने अपनी बच्ची को ध्यान से देखा। कुछ अटपटा नहीं दीखा। वह शायद समय पर पहुँच गई थी। बच्ची का रोना और बूढ़े की आवाज़ का लड़खड़ाना शायद यही बता रहे थे। क्रोध की एक लौ सी उठी, विवश सी, हताश सी। उसने बच्ची को उठाया और घर चली आई। वह बेचैन हो गई थी। रात में मानस आया। मोहिनी अपनी रौ में दिन बीती घटना सुना गई। मगर सुना कौन? मानस तो नशे में धुत था। मोहिनी को झटका लगा। इधर कुछ दिनों से तो मानस ऐसी ही दशा में लौटता रहा है। मगर आज उसे मानस का नशे में रहना अखर गया था। बुरा भी लगा। मोहिनी ने शायद मानस के घर अपने को पहली बार असहाय पाया था। एक  अनहोनी तो टल गई थी, बच्ची बच गई थी, पर दूसरी अनहोनी अज्ञात सी दरवाजे पर दस्तक दे रही थी। मानस और मोहिनी के बीच एक शून्य कैसे आ गया ? वह सारी रात खलबलाती रही, उबलती रही, छटपटाती रही। मानस को झिंझोड़ा भी और चीखी भी,’आप से ऐसी आशा नहीं थी, हम तो बहुत आसरा करके आए थे । आप तो ऐसी चीज़ के आसरे हो गए जो हमें बेसहारा ही करके छोड़ेगी……… ।’ मगर मानस तक बात कैसे पहुँचती? मोहिनी ही बिलखती रही। मानस खर्राटे लेता रहा। मोहिनी के भीतर कुछ चटख कर रह गया था।

        उस दिन के बाद से तो मानस ने मोहिनी को न सुनने की ज़िद ही जैसे कर ली थी। वह रोज़ धुत हो कर आता था। काम करता था,पैसे भी पूरे लाता था मगर धुत भी होता था। मोहिनी के मन में किसी अनजाने शक का तिलचट्टा अपनी मूंछें हिलाने लगा था। सुबह पूछती तो मानस की शेख़ी भरी आवाज़ सुनने को मिलती, ‘यार दोस्त की कमी थोड़े ही न है, वो तो तुम्हें भी साथ लाने को कहते हैं…. । ‘  मोहिनी ने देखा भी था कि रितेश मानस को घर पहुंचाने आता था, मगर चुपचाप उसे छोड़ कर चला जाता था। मोहिनी अपनी बेबसी पर झल्ला उठती और मानस चुपचाप हँसकर स्थिति टाल जाता।

         बात टलने जैसी नहीं रह गई थी। मानस को धुत करने वाला उसका साथी एक दिन साक्षात प्रकट हो गया। धुत मानस को रितेश के साथ उठाकर लाया था। मोहिनी ने बिस्तर की चादर ठीक कर दी थी। उसी पर मानस को लगभग पटकते हुए उस साथी ने मोहिनी का हाथ पकड़ लिया था और कहा था,’ भौजी! हम तुम्हारे देवर हैं। देवर-भौजाई का रिश्ता तो जानती होगी। आगे तुम सुना है बहुत समझदार हो। तो हम क्या समझाएँ ! बोलो! ये तो तुम्हारे किसी काम का है नहीं। ऐसे ही रात भर पड़ा रहेगा। न तुम्हारी सिसकी सुनेगा, न रोना, न हिचकी। बहुत सुनते हैं तुम्हारे बारे में इससे, है हिम्मत तो एक रात रुक जाने दो हमें अपने पास…… । बोलो। ‘ और मोहिनी के पकड़े हुए हाथ को अपनी ओर ज़ोर से खींचा। मोहिनी जैसी चौकन्नी थी। गिरने का नाटक करते हुए उस साथी का गिरेबान पकड़ लिया जो मोहिनी के भार से चरचरा कर फट गई। मोहिनी आज़ाद थी। रितेश ने तबतक उस साथी को अपनी ओर खींच लिया था। मोहिनी ने उस घर में रूकना मुनासिब नहीं समझा। बच्ची गहरी नींद में थी। रात भर जागने वाली नहीं थी। मोहिनी घर से निकल कर लगभग दौड़ते हुए मानस की बड़ी बहन के घर चली गई। उसने राह में देखा था कि रितेश उसके पीछे साये की तरह लगा हुआ था। मगर उनके बीच कोई बातचीत नहीं हुई थी। बहन ने सारी बातें सुनी और उस रात मोहिनी को अपने पास ही रोक लिया था। बाद में रितेश ने बच्ची को चुपचाप वहीं मोहिनी के पास पहुंचा दिया था।

          अगले दिन मानस होश में बैठा था। उसकी बड़ी बहन मोहिनी के साथ घर आई। मोहिनी ने बहन को मानस को पीने की लगती लत और अपने से की गई उसके साथी की गंदी हरकत के बारे में रात को ही बता दिया था। दीदी ने मानस को झिड़कते हुए बार बार पूछा,’ यह सब क्यों ? पहले तो कोई बेटा साथी पास नहीं आता था। अब कोई इतना मेहरबान क्यों है?’ मानस चुप बैठा रहा। मोहिनी का क्रोध फट पड़ा-‘बोलिए न जी ! बहुत आशा-दिलासा तो देकर लाये थे हमें। अब इस सौतन का साथ क्यों कर लिए?’ मानस ने वहाँ आ गए रितेश को देखा। रितेश हमेशा की तरह चुप बैठ गया था आकर। वहाँ तनाव फैला हुआ था। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। मानस की बहन ने मोहिनी को ही समझाने की गरज से कहा,’तू बात का बतंगड़ क्यों बनाती है ? पीता ही है न ! तो का हुआ ? ‘ मोहिनी ने तपक कर बताया,’ दीदी ! जब अपना कमाया पूरा पैसा घर लाते हैं तो पीते किसका हैं ? और क्यों ?’ बड़ी बहन चौंकीं,’ किसका का क्या मतलब?’ मोहिनी ने अपनी बात दुहराते हुए कहा,’ मतलब अपनी कमाई तो पूरा घर लाते हैं तो फिर……’ बहन चिंतित होती सी बोली,’ ओह ! तो तू समझती कि कोई इससे अपना मतलब साधने के लिए पिलाता है।’ बहन भड़क उठी थी,’इतना सस्ता है क्या ?’ अबकी बार रितेश ने धीमी आवाज़ में कहा था,’ नहीं दीदी ! ऊ इसको मतलब से ही पिलाता है। उसकी नज़र मोहिनी पर है।’ दीदी चुप हो गई। मोहिनी ने पहली बार इस पतली काया के आदमी को देखा ध्यान से। वह उसके इर्द-गिर्द हमेशा रहा था मगर मोहिनी ने तवज्जो नहीं दिया था कभी। गहरे विश्वास से लबालब भरा रितेश । निडर, बेहिचक हो सरल किन्तु घाती बात बता दिया था रितेश ने। यह वही बात थी, सत्यता थी जिससे आतंकित थी मोहिनी। उसके सम्मान पर अनचाहे आघात की आशंका उत्पन्न कर दिया था मानस ने, उसके पति ने, उस आदमी ने जो आशा दिलाकर लाया था इज्ज़त बचाने की ! मोहिनी उबल पड़ी,’ संदेह था हमको, लेकिन अब तो विश्वास हो गया।’ मगर मानस की बड़ी बहन भड़क गई,’ क्या विश्वास हो गया ? हम जैसों के साथ ऐसी ऊंच-नीच होती रहती है, तो हम क्या सती-सावित्री होने का ढिंढोरा पीटें? कोई हम पर नज़र न डाले। नज़र है गिरेगी। मगर….. । ‘ शायद उसे कुछ आगे कहने के लिए कुछ नहीं सूझा। उसने मोहिनी को समझाया,’ भूल जाओ यह सब ! आगे से कोई कुछ नहीं कहेगा, कुछ नहीं करेगा। बात फैलेगी तो और नज़रें उठेंगी, और लार टपकेंगे, भेड़ियों की कमी है क्या हमारे चारों ओर ?’

         किन्तु दीदी के कहे अनुसार बात आई गई नहीं हो पाई। उसी रात फिर मानस उसी साथी के साथ लौटा। धुत नहीं था। धुत होने का सारा सामान साथ था। मानस सहज नहीं था। साथी उल्लसित था। मोहिनी को तो जैसे साँप सूंघ गया हो। एक भयंकर अनहोनी की आशंका घिर आई थी। शिकार की ताक में शिकारी बैठ चुके थे। शिकार उनकी नज़र के सामने बंधा सा पड़ा था जैसे। यह रात उस शिकार के लिए काली होकर रहने वाली है। शिकारियों को व्यस्त देख वह बड़ी दीदी के यहाँ गई। बच्ची साथ लेती गई थी। दीदी नहीं मिलीं। वह क्या करे न करे, इसी ऊहापोह में थी। कुछ दूरी पर उसने रितेश को देखा। वह शायद देर से उसके पास पास चल रहा था। रितेश ने मानस और उसके साथी के इरादों को भाँप लिया था। बुरा वह मोहिनी का होने देना नहीं चाह रहा था। मगर किस मुंह से बोलता। रितेश ने मोहिनी की काँपती सिहरती बेबसी को देखा समझा और हिम्मत कर आगे बढ़ आया। उससे पहले मोहिनी उस तक आ पहुंची। ‘क्या आप मेरा सहारा बन सकते हैं?’ मोहिनी ने निर्णायक स्वर में पूछ लिया। ‘यदि तुम मेरा विश्वास कर सको। ‘ रितेश की आवाज़ में दृढ़ता थी, ‘सोच लो’। मोहिनी का स्वर भींगा गीला था, ‘औरत की इज्ज़त आदमी के हाथ होती है। इज्ज़त औरत को प्यारी होती है। उसी इज्ज़त की धज्जी रक्षा करने वाला आदमी ही उड़ाए तो……..तो अपनी पसंद का चुनाव ही बेहतर है। ‘ रितेश ने समझाया,’ नहीं ! अभी वैसा कोई निर्णय न करो ! बस मुझ पर विश्वास कर सको तो अभी यहाँ से कुछ समय के लिए हट जाते हैं।’ “मेरे साथ चाहे जो भी हो उसमें क्या मेरी मर्ज़ी नहीं होनी चाहिए” मोहिनी ने कहा था। लेकिन शायद रितेश ने सुना नहीं था। अब मोहिनी के पास भी रितेश की बात मान लेने के अलावा जैसे कोई और उपाय नहीं था। आशा के साथ वह मानस के साथ आई थी। विश्वास के साथ उसे रितेश के साथ जाना पड़ रहा है।

        गाड़ी पूरी रफ्तार से दौड़ी चली जा रही थी। सारे यात्री अपनी अपनी यात्रा में थे। कोई दूसरे की यात्रा के बारे में नहीं जानता था। किसकी यात्रा आस की है और किसकी विश्वास की ?

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