उदयराज की कहानी ‘उसकी हंसी’

उदयराज

वह मुझे बन्धु कहकर बुलाती थी। साथ काम करती, साथ गप्पें करती, कभी – कभी गुमसुम हो कर बैठ जाती। मुझे उसका चुप बैठना एकदम अच्छा नहीं लगता, कोई न कोई बहाना बनाकर मैं उसके पास चला जाता, सरगोशी करता, आज मौसम उदास तो नहीं है… ‘फिर’ ? वह अपनी बड़ी सी आंखें उठाती एकटक निहारती पता नहीं कब उसकी आंखें पनीली हो जातीं। पनीली आंखों से मैं सिहर उठता। मेरी आंखों से बहने लगते वे आंसू। अपनी किसी और खूबी को भले न जानता होऊं इस – कमजोरी को अवश्य जानता हूं। हमदर्द के आंसू को मेरी आंखों का रास्ता भी जरूर मिल जाता है। सो पनीली आंखों को अपनी ओर निहारता या मैं बेचैन हो जाता – तब वह खिलखिला कर हंस पड़ती और बोलती, ‘कुछ नहीं रे! बस उदास हो गया थोड़ी देर को मन ही तो है।‘ मुझे लगता वह बेवकूफ समझती है मुझे। शायद किसी न किसी पल में हर औरत मर्द को बेवकूफ समझती है। मैं यह भी समझता था कि वह मुझे अपनी बात कभी नहीं बता सकती। मैं होता ही कौन हूं उसका ? एक कुलिग और वह भी जूनियर।

ऑफिस के अन्य कुलिग उसके बारे में बड़ी रोमान्टिक बातें करते। साड़ी कम कीमत की हो या अधिक कीमत की उसके शरीर पर बहुमूल्य लगती। सलीके से पहनती, एक संगीतमय अन्दाज में चलती और खनकीली आवाज में बोलती। इसीलिए सभी उसके निकट होने के बहाने ढूंढते। जब वह बॉस के कमरे में जाती तो सभी के होंठों पर एक अजीब सी कड़वाहट आ जाती। बॉस के प्रति घृणा और घृणा की अभिव्यक्ति सरे आम सुनाई पड़ जाती। साला …. बूढ़ा.. खूसट…. दृष्टि मैथुन से बाज नहीं आता। नया – नया मैं इन सारे स्नेह सम्बन्धों को समझ नहीं पाता था। फिर भी मजा आता। अनायास ही हम सभी उसके प्रति संवेदनशील थे। हम सभी अपना निजी अधिकार समझते थे। उस अधिकार के मैदान में बॉस को देखना भी नहीं चाहते थे। शायद ऑफिस के उस घेरे में हम सब में वही क्षमतावान था। हम सब की इच्छा के प्रतिकूल बॉस को ही उसकी निकटता अधिक नसीब हो रही थी। यह एक ऐसी समस्या थी जो पूरे कार्यालय पर असर और वह भी बुरा असर डाल रही थी। कार्यक्षमता प्रभावित कर रही थी। किसी कुशल और निष्पक्ष कमीशन द्वारा इसकी जांच करवाई जाती तो उस बूढ़े – खूसट बॉस को अवश्य ही मुअत्तल कर दिया जाता जिसकी वजह से राष्ट्रीय विकास दर धीमी हो गई थी। सभी अपने – अपने ढंग से उसे इम्प्रेस करते। मिस्टर प्रसाद अपनी तोंद पर हाथ फिराते हुए कहते, ‘ऑफिस की कुर्सी से चिपक कर ये थोड़ा बहुत चर्बी जम गई है – मगर फुर्ती में कोई कमी नहीं, थोड़े से प्रयास में ही बेन जानसन को हण्ड्रेड मीटर में पछाड़ सकता हूं।‘ वह मि0 प्रसाद को देखती और खिलखिला पड़ती, ‘प्रसाद बाबू आपके सामने बेन जान्सन क्या टिकेगा ? उसे कैलकुलेशन थोड़े ही न आता है। वह तो सिर्फ दौड़ सकता है – वह भी ड्रग लेकर… आप तो ऑफिस के एकाउण्ट की जान हैं।‘ प्रसाद गदगदा जाते और हत्थे वाली कुर्सी में धंस जाते। भट्टाचार्य महोदय मच्छरों जैसे मिनमिना उठते, सारी रात मच्छरों ने परेशान कर दिया, सोने नहीं दिया। साला आजकल का मच्छर है कि शैतान। लगता है आदमी को उठा ही ले जायेगा। नहीं सोने से सूरत बिगड़ गया। किसी और ही कारण से चेहरे पर उगे चकतों पर हाथ धर देते और सहानुभूति की आस में कान खड़े कर लेते। वह हंसती रहती।

हर आदमी के पास कुछ न कुछ ऐसा जरूर होता जिसकी चर्चा करके उसका ध्यान खींचा जा सकता हो। इस सबमें राम शंकर दास आगे निकले। ऑफिस ही नहीं बाहर तक साथ दीखते। अब कुलिग्स की चिन्ता बढ़ गई। बुरा तो मुझे भी लग रहा था। मगर मैं किस अधिकार से बोलता, सो चुपचाप सहता रहा, प्रसाद से नहीं सहा गया। वो विफर पड़ा। कैसे – कैसे अहमक हैं, साथ काम करने वाली लेडी के साथ बीहेव करना भी नहीं आता। भट्टाचार्या ने सुधारा, अरे भाई, अपना ही तो कलिग है, गैर थोड़े ही है – चलने दो – इसी तरह कभी अपना भी दिन आ सकता है। मगर अब उसके सामने कोई नहीं बोलता – पीछे खूब बोलते, मन की भंड़ास निकालने लगते जैसे इनकी सम्पत्ति सामने तो है मगर दबोचा किसी और ने है। एक हद तक बॉस को आशीष के रूप में दी जाने वाली झकझकें बंद हो गई थीं। राम शंकर साथ बैठता था। सामने तो कोई गाली दे नहीं सकता था। हिकारत भरी नज़रों से देखा जा सकता था और चिढ़ा जा सकता था। चिढ़ इतनी बढ़ गई कि राम शंकर से बात – सलाम – दुआ बन्द हो गई, कार्यालय – बहिष्कार के शिकार हो कर रह गये राम शंकर दास मेरे लिए कोई अंतर न था, मैं सबसे बातें करता – हंसता। धीरे – धीरे मैं महत्वपूर्ण होता गया। जब लोग एक दूसरे से खुलकर बातें नहीं करते तब चुपके – चुपके दूसरे की बातें जानना चाहते हैं – और इसके लिये उन्हें कोई न कोई चाहिए – मैं ही सहज उपलब्ध थ। सभी मेरा उपयोग करने में लग गए और मुझे लगा मैं ऑफिस की शांति वापिस ला सकता हूं सो मैं भी खुलकर इस उपकार में लग गया। इनकी बात उनको, उनकी बात इनको बताता और मजा लेता। वो भी खुश और मैं तो महाखुश। राम शंकर बहुत खुश थे। पूरे ऑफिस में वही उसके निकट थे। मर्द कुलिग ही नहीं औरत कुलिग्स भी ईर्ष्यालु थीं। एक ही कार्यालय में साथ बैठकर एक दूसरे से मुंह फुलाए रख पाना बहुत दिनों तक सम्भव नहीं था। आदमी की जात में ही यह विचित्रता है वह झगड़ता है – भड़कता है। जान तक ले लेता है मगर समय के बीतने पर फिर निकट आता है। प्रेम करता है – सब कुछ भूलकर।

एक दिन चपरासी ने आकर कहा, ‘आलोक साहब आपको बड़े साहब बुला रहे हैं।‘ मैंने याद किया कोई काम पेंडिंग न था आज का कोई अप्वायंटमेंट भी नहीं था। फिर बड़े साहब के बुलावे से मैं परेशान हो उठा। क्या बात हो सकती है ? मैं बड़बड़ा उठा। जाते – जाते उससे नजरें मिलीं। वह तब भी मुस्कुरा रही थी। मैं झुंझला गया। यह औरत मुस्कुराती ही रहती है। इतने ताने-बाने सुनती है – मुस्कुराती है जैसे हंसने की दीवार बनाती रहती है। उसे हंसता छोड़ कर मैं बॉस के कमरे की ओर बढ़ गया। ‘मे आई कम ईन सर!’ दरवाजा अन्दर ठेलते हुए मैंने कहा। ‘ओ आलोक बाबू! आइए।‘ मोटे चश्में से घूरते हुए बॉस ने अंदर आने की इजाजत दे दी।

‘एक काम है – जिसके लिए सिर्फ आप पर भरोसा किया जा सकता है।‘ मैं गर्व और उत्सुकता से तन गया।

‘ऑर्डर कीजिए सर। आएम फारचुनेट टु हैव इट।‘

‘यस, यस…. यू आर! खड़े क्यों हैं… बैठ जाइए।‘

मैं बैठ गया। मैं बेचैन था कि वो जल्दी से काम बताएं और मैं जल्दी से बाहर जाऊं वरना वहां मेरे बारे में भी पता नहीं कौन – कौन से फिकरे बन बिगड़ रहे होंगे। बॉस गम्भीर हो रहे थे और शायद संजीदा भी। जब गम्भीर हो गए और मेरे अन्दर की सारी बौखलाहट उनकी बातें सुनने के लिए पूरे तौर पर शान्त हो गई तब उन्होंने बोलना शुरू किया।

‘आलोक बाबू एक आप ही हैं – जो सबसे हिले – मिले हैं। आप मिसेज रेवा घोष से भी समान रूप से परिचित हैं।‘ मैं चौका – उन्होंने मेरा चौंकना नोटिस किया और आगे बोले, ‘मैंने उसे मिसेज कहा। हां वह मिसेज ही है – शादी – शुदा। परन्तु अपने पति से अलग रहती है उसका पूरा चरित्र ही रहस्यमय है। आज वह राम शंकर के साथ पिक्चर जा रही है – और आप मेरी ओर से इनका पीछा करें देखें ये लोग कहां – कहां जाते हैं और क्या – क्या करते हैं…..।‘ बॉस चिन्ता में लीन थे। मुझे लगा कि कहां फंस गया मैं। ऑफिस के इतने सारे महत्वपूर्ण मुद्दों और कार्यों की अहमियत कितनी कम है – दो कुलिग्स का संबंध ज्यादा महत्वपूर्ण मामला है – जिसकी जासूसी के लिए एक जांबाज, चालाक आदमी की जरूरत थी और वो आदमी मैं निकला। मैंने याद किया। मुझे जासूसी करने का शौक कभी न था। परन्तु अब जासूसी करनी थी। शौक के मारे नहीं, नौकरी के मारे। पेट के मारे। पर अपना खिसियाना मैंने बंद किया और इस काम के मजे के बारे में सोचा। चलो एक अनुभव यह भी अच्छा रहेगा। मन ही मन मैंने अपने को तैयार कर लिया। सामने देखा। बॉस और भी गम्भीर हो गये थे। पता नहीं क्यों मुझे खूब ठठाकर हंसने की इच्छा हो आई परन्तु मैं शांत बना रहा। बॉस की आंखें सिकुड़ गई थी। ऑफिस की प्रतिष्ठा का प्रश्न है भले घरों की महिलाएं तो काम करने का सोच ही नहीं सकती ऐसी घटनाओं से और हम पुरूष लोग क्या कम बदनाम होंगे ? मुझे लगा बॉस पर कितना भार है – टेन्शन है। बेचारे ऐसे ही असमय तो खूसट नहीं हो गए। ऐसी महत्वपूर्ण चिन्ताओं ने उन्हें बूढ़ा बना दिया। पर समाज की भलाई करने की लत भी छूटती है कहीं। छूटती नहीं गालिब लव से लगी हुई। इतनी चिन्ता तो उस औरत रेवा घोष को भी नहीं है। दिनभर खिलखिलाती रहती है ससुरी मर्दों के संग। लुटता तो बेचारा बॉस है। रेवा का क्या जाता है ? पुरूषों को भी अकल नहीं। राम शंकर तो अहमक ही है – बॉस पर तनिक भी तरस नहीं खाता। मेरे मन में बॉस के प्रति हमदर्दी पसरती जा रही थी। बॉस अब फुसफुसाने लगे। ‘लेकिन सावधान रहिएगा। इस बात की खबर न लगे किसी को अब आप जा सकते हैं….। हां! जाते समय पैसे हमसे लेते जाइएगा।‘ मैं झट से बाहर आ गया। सामने रेवा घोष अपनी मेज पर थी। मुझे देखकर हंस पड़ी। मगर मुझे हंसी न आई घृणा भरने लगी। हंसने बोलने से आगे बढ़कर सिनेमा तक पहुंच गई मोहतरमा! मेरे मन में गरम लावे फूटने लगे। राम शंकर तो जैसे कुलिग न होकर मेरे दरवाजे पर बबूल के पेड़ से हो गए। मैं ऑफिस से निकल आया। कुछ देर इधर – उधर घूमता रहा फिर इवनिंग शो के समय पर निकट के हॉल पर जा पहुंचा। भीड़ जुट रही थी। कुछ लोग खिड़की पर लाईन में थे तो कुछ इधर – उधर मंडरा रहे थे। अधिक भीड़ न थी। मैंने चारों ओर नज़रें दौड़ाई। कई – कई जोड़ियां थीं। नहीं थी तो रेवा और राम शंकर की जोड़ी। मन में आशंका थी। यहां इस हॉल में वो आएं ही नहीं तब! दिल धड़कने लगा। यहां तो कई हॉल हैं। कहां – कहां भटकूं। एक आदमी एक ही समय कितनी जगहों पर भला जा सकता है ? समय गंवाना बेवकूफी लगी। सिनेमा शुरू हो और लोग अंदर हो जाएं तब तक तीन चार जगहों पर तो पहुंच ही जाना चाहिए। बॉस की चिंता लहरा रही थी। मैं दौड़ने लगा। कई – कई जगह गया। परन्तु रेवा घोष और राम शंकर कहीं न दिखे। अपनी बदहवासी पर झल्लाहट हुई। अब समझ में आया। कैसी मूर्खतापूर्ण घटना का हिस्सा बन गया था मैं ? बड़ी कोफ्त हुई। सीधे घर चला आया।

दूसरे दिन ऑफिस में रेवा और राम शंकर आए ही नहीं। सभी के चेहरे पर रहस्य – रोमांच झलक रहा था। मैं शान्त था। तभी बॉस ने बुला भेजा। रिपोर्ट चाहिए थी। लेकिन मुझमें बॉस के प्रति हमदर्दी शेष नहीं थी। जाते ही मैंने कहा, ‘सॉरी सर, कल जितना फूलिश तो मैं अपनी जिन्दगी में कभी नहीं बना। अब इसी इलाके में कोई पांच छः सिनेमा घर हैं – मैं अकेला एक ही समय कहां – कहां पहुंचता। फिर यह जरूरी नहीं था कोई इसी इलाके के सिनेमा घरों में सिनेमा इन्ज्वाय करे। दूसरे इलाके में भी तो जा सकता है।‘ कहकर मैं चुप हुआ तो पाया कि कल की स्थिति से मुझमें उत्तेजना की मात्रा ज्यादा थी। बॉस का चेहरा फक्क पड़ गया। जैसे सरे राह बैठाकर पचासों जूते मारा गया हो। बोले, ‘इतनी छोटी सी बात कल हमारे दिमाग में क्यों नहीं आई। अफसोस तो हमें है। आप परेशान न होइए। यह हमारा सिर दर्द था आपने तो हमारी सहायता करने की कोशिश की ही… वैसे आज रेवा दीख नहीं रही।‘ मैं उसी तैश में बोल गया, ‘आए तो राम शंकर भी नहीं हैं।‘ बॉस कुछ न बोला। राम शंकर के नाम पर उसका मुंह बिगड़ गया जैसे रकीब का नाम सह न पाया हो। मैं बिना कुछ और कहे लौट आया। अपनी मेज पर जमा रहा। किसी की ओर न देखा और न बातें की। रेवा के न रहने पर मुझे स्वयं भी अच्छा नहीं लग रहा था।

छुट्टी होते ही मैं घर की ओर चल पड़ा। बाजार से गुजर रहा था कि आवाज आई, ‘आलोक, ठहरना जरा!’ पहचानी आवाज थी। देखा रेवा घोष थी। हंस रही थी वो। मैं शान्त बना रहा। निकट आ गई। बोली, ‘कोई नई बात? आज हम ऑफिस नहीं जा सके। छोटे भाई को अस्पताल ले जाना था। पोलिओ का मरीज है।‘ फिर तुरंत ही बोली, ‘तुम तो मेरे सबसे प्रिय बंधु हो, चलो न घर, चाय पी के जाना।’ मन में आया झटक दूं उसकी बात। पता नहीं उसके घर जाते कोई देख ले और कल से होने लगे पचासों बातें – कयासें। परन्तु तुरन्त ही एक लोभ मन में आ गया। इसी से इसके बारे में जान लूं। बस चला गया घर उसके।

तीन कमरों का पूरा घर। रेवा, माँ और बीमार भाई। दो कमरे सोने के लिए और बैठकखाना। उसी से लगा किचन और बाथरूम। बैठकखाना में मुझे छोड़ वह चाय बना लाई। तब तक मैं भी सहज हो गया। चाय पीते हुए मैंने उससे पूछ लिया, ‘आप शादी – शुदा हैं पर सिंदूर नहीं लगातीं?’

अपनी शादी की बात पर वह कुछ उदास हो गई। उदासी धीरे – धीरे गम्भीर होती गई। चाय की चुस्कियां लेते रहे हम। उसकी गम्भीरता गहरी खामोशी में तब्दील हो गई। तब मुझे अफसोस हुआ। बेकार ही यह बात उठाई। अब वह हंसने की कोशिश करने लगी। फिर एक फीकी हंसी के साथ कहा, ‘पहले ही दिन से तुमसे खूब बातें करने को जी कर रहा है। तुम भी सुनना चाहते हो आज तो। बताने के लिए मुझे तुमसे अच्छा और कौन मिलेगा ?’ फिर वह मेरी तरफ शरारत से देखने लगी। बस कोई बड़ी छोटे की चुटकी ले रही हो। मेरे मन में आया कह दूं मुझसे ही क्यों, जैसे भी हमदर्द हैं। उन्हीं से कहो – डबल गेम होगी। पर कहा कुछ नहीं। लेकिन उसने मुझे विस्मित किया, ‘तुम्हारे मन में आ रहा होगा कि जब इतने लोग मेरी निकटता के लिए लालायित हैं, बॉस भी, तो मैं तुमसे ही क्यों कहना चाहती हूं – है न!’ मैं चुपचाप हंस पड़ा। वह गम्भीर हो गई। ‘मानो न मानो तुमसे सब कुछ बताने का मन करता है – तुम भले लगते हो। किसी लड़की से प्यार किया है ?’

मैं चौंक गया। मेरे प्रेम की बात कहां से आ गई। पर शायद उसकी भूमिका का अंग थी यह बात। मेरी प्रतीक्षा किये बिना वह बोल रही थी।

“मेरी शादी भाग्य का भयानक खेल थी। अभी मैं बी.ए. की परीक्षा दे रही थी तभी मेरे मामा ने एक पुराने समय के जमींदार और अब खाते – पीते घर में मेरी शादी की बात पक्की कर दी। लड़के वालों से मामा को मोटी रकम मिली थी। मेरे मना करने पर मां को साथ मिलाकर सख्ती पर उतर आए। मैंने सुना कि मेरी होने वाली सास को कई – कई सौतों को सहना पड़ा था। मेरा मन अशांत हो गया था। बुद्धि काम नहीं कर रही थी। मन को मनाती कि कोई जरूरी तो नहीं कि मुझे भी अपनी सास की गति ही मिलेगी। मां को बहुत खुशी थी। बिन बाप की बेटी के दिन फिरे थे। मैं बहुत रोई, चिल्लाई कहा किसी गरीब से ही कर दो मेरी शादी पर वहां न करो। पर मेरी एक न सुनी गई। ब्याह हो गया। धड़कते दिल के साथ मैं ससुराल पहुंच गई। ठाठ बाकी थे। दिन लद चुके थे। वहां पहुंचकर पता चला कि मेरे पति भी शादी के खिलाफ थे। मगर उनकी मां की जिद थी। पता नहीं क्यों मेरे मन में हमदर्दी सी आ गई। मेरा गुस्सा कुछ कम हो गया। पहली रात को मैंने उन्हें देखा। कम प्रकाश में देखा था एकदम सुंदर औरत से लगे। मेरी खाट पर आए। इधर – उधर की बातें की। परिवारों के बारे में बातें हुईं कई दिनों की चिन्ता अचानक हटी तो मैं सोए बिना न रह सकी। सुबह जब नींद खुली तो रात की बात याद कर बहुत अफसोस हुआ। अगल – बगल देखा। उनके वहां सोने का कोई लक्षण न दिखा। दूसरी रात आई। आधी रात के बाद वे आए। आज मैं तैयार थी पहले दिन की तरह नींद भी हावी नहीं थी। खाट पर बैठे तो मैंने अपना सिर उनकी गोद में रख दिया। साड़ी हटाकर बाल सहलाते रहे। जब मैंने उनका हाथ पकड़ कर खींचा तो जैसे नींद से जगे हों – हड़बड़ा कर खाट से नीचे उतर गए। बाहर जाते हुए कहा, सो जाओ… अभी थकान होगी। मैं चकित रह गई। खैर उनकी अच्छाई समझ कर मैं सो रही।“

वह रूकी, मेरी ओर देखा। मैं जैसे भूत की कहानी सुन रहा होऊं – वैसे ही उत्सुकता पूर्ण चुप्पी की दशा में था। वह फिर बोलने लगी, “उसके बाद उनका आना लगभग बन्द सा हो गया। मैंने पता लगाया। कोई एक या दो मित्र आते थे और वो उन्हीं मित्रों की आवभगत में रह जाते थे। कुछ दिन और बीत गए। एक रात जब सब सो चुके तब मैं उठकर उनके कमरे की ओर आहट लेने गई। वहां पहुंच कर दरवाजे की एक झिर्री से जो बड़े छेद सी बन गई थी मैंने अन्दर झांका। अन्दर का दृश्य देखकर मैं ठगी सी रह गई। दिल धुकधुकाने लगा।“ बोलने का उसका क्रम फिर टूट गया। वह अपने को सम्हालने लगी थी और शायद अनिश्चित भी हो रही थी कि आगे बताये या न बताये। मैंने चुप रहना ही उचित समझा। कुछ देर रूक कर रेवा फिर बोलने लगी, “आलोक भाई ऐसा भी होता है, मैंने उसी दिन जाना। मेरे पति चित्त लेटे थे एक दम नंगे और उनके मित्र उनके ऊपर झुके हुए थे। जैसे स्त्री – पुरुष की लीला हो। मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा। अपने भीतर एक धधकती आग का अनुभव हुआ। लगा पूरे शरीर में कोई ज्वाला फैलती चली जा रही है। मैं वहां टिक न सकी। आकर अपनी खाट पर धडाम से गिर पड़ी। कब मेरी सांसें ठीक हुई। मुझे पता ही न चला। कहां तो मुझे सौतों का डर था। पर यहां क्या कहूं एक हिजड़े पति का सामना हो रहा था। अगले दिन मैंने शाम होते ही उन्हें अपने घर में बुला लिया। दरवाजा बंद किया और अपने सारे कपड़े उतार कर अलग रख दिया। मेरे भीतर कोई आग थी जो ये सारी बेशर्मी करवा रही थी और शायद मेरी
आखिरी कोशिश भी थी। उनके कपड़े भी खींच लिये। बेतहाशा चिपटने लगी, चूमने लगी। मुझ पर जैसे कोई दौरा पड़ चुका था। पर वो शान्त थे। जब मैं अपनी कोशिशों से थककर निढाल हो रही थी तो वो धीरे से उठे और अपने कपड़े उठा लिए। मुझमें बला की फुरती दौड़ी। मैंने फिर कपड़े छीन लिए। वो हंसा या कराहा, बोला मैं इस लायक नहीं मगर चाहो तो… मैं हिजड़े पति के यारों के लिये थी यह सोचकर मेरा खून खौल उठा। मैंने नाखूनों और दांतों से छील – छील कर, काट –काट कर उसे लहूलुहान कर दिया। उसके पलिंग को नोच डाला। वह कराह कर जब जमीन पर गिरा तब मुझे होश आया। यह मैंने क्या कर दिया ? उसका क्या कसूर था अबकि बार वह थमी तो उसकी सांसें निढाल हो रही थी।“

चाय कब की खत्म हो गई थी। वह किचन में गई। एक गिलास पानी पिया, और मुझे भी लाई। पर मैं उस घटना से ही ठण्डा हो रहा था। न वह हंसी और न नजरें मिलायी – बस सिर झुकाकर बता दिया कि दूसरे दिन मैं वह घर छोड़कर चली आई। फिर मां और भाई के साथ यहां आ गई। नौकरी पर। …. बॉस, प्रसाद, भट्टाचार्य सभी की हरकतों को मैं समझती हूं पर पुरूष के नाम पर वही दृश्य मेरी आंखों के आगे आ जाता है और उस पर ठठाकर हंसना चाहती हूं। परन्तु औरत हूं इसलिये हल्की हंसी पर ही संतोष कर लेती हूं।

जब मैं वहां से घर के लिये चला तो मेरे मुंह में शब्द ही नहीं आए। मैं तो बस रेवा घोष और उनकी हंसी के बारे में सोचने में लिप्त था। हंसी जो रेवा की दीवार थी।

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