उमेश कुमार राय की दो कविताएं

सपना

देख रहा हूं मैं
बदल रहा है देश
छू रहा है विकास के नये आयाम
गरीबी का कहीं कोई नामोनिशां नहीं
माँ-बहन-बच्चों के शरीर पर पूरे वस्त्र
बच्चा नहीं तरसता बचपन को
बूढ़े नहीं तड़पते तीमारदारी को
महफूज हैं माँ-बहनें घर में भी बाहर भी,
उन्हें डर नहीं निर्भया बन जाने का।
नहीं सोता कोई भी खाली या आधा पेट
गरीबी-अमीरी का फर्क नहीं है कोई
नदियों में बह रहा है अमृत
खेतों में फसलें नहीं, उग रहा है सोना
जर्द नहीं हैं हरखुओं के चेहरे,
नहीं कर रहे हैं वे आत्महत्याएं।
बेरोजगार व तनाव में नहीं है कोई समर
कोई अनपढ़ भी नहीं
घरों में रिद्धि सिद्धि का है बसेरा,
धन धान्य से भरा है घरों का हर कोना।
माल-असबाबा खुला छोड़ देते हैं लोग
चोर-राहजन का नहीं है खौफ।
बाघ-बकड़ी एक घाट पर पी रहे हैं पानी
पशु-पक्षियों को बहेलियों का नहीं है खौफ
वे आजाद भी हैं, घरों में आने-जाने पर नहीं है पाबंदी।
मजहब के नाम पर नहीं है सीनाजोरी,
राम-रहीम रहते हैं सगे भाइयों-सा।
बस, विश्वगुरू बनने को है अपना देश

तभी मेरे कानों में पड़ा एक उन्मादी शोर
झन्ना उठा मेरा दिमाग
उठ बैठा मैं बिस्तर से
खिड़की से बाहर झाँका तो देखा-
एक गुस्साई भीड़ जा रही थी चौराहे के जानिब
माँ ने बताया-
गली से कुछ दूर एक चौराहे पर अल्लसुबह
मजहबी उन्माद में
गरीब परिवार के इकलौते चिराग
कामकाजी एक युवक का कर दिया गया कत्ल।

मैं नींद में था, देख रहा था सपने
उन्मादी शोर ने जगा दिया था मुझे नींद से
टूट गये मेरे सपने
हाँ ! टूट गये मेरे सपने।

माफ करना, प्रिये !

तुम्हारे होठ हैं रस भरी गुलाब की पंखुड़ी
गरीबी-भुखमरी के रिसते गुलाबी जख्म से
छलनी हैं लाखों लोग।
समंदर-सी गहरी हैं तुम्हारी आँखें,
जी करता है डूब जाऊँ इनमें
असंख्य लोग तरसते हैं बूंद-बूंद पानी को।
कितनी घनेरी है तुम्हरी जुल्फ
बादल की मानिंद
सोचता हूँ जिंदगी गुजार दूँ इनकी छाँव में
न जाने कितने लोगों को
धूप-बारिश से बचने को एक अदद छत नहीं।
कितना सुकून है तुम्हारी बाहों में
दिल करता है इन्हीं बाहों के घेरे में सो जाऊं हमेशा के लिए
लेकिन अगणित बचपन वंचित है माँ की गोद से।
ये जो तुम्हारी धानी चुनरी है न
लहलहाते खेत-सी लगती है
लेकिन खेत तो कब से पड़े हैं परती।
पूरी प्रकृति की झलक है तुममे
मगर बोलो- आज प्रकृति कहाँ है सुरक्षित ???

दुनिया का सबसे खुबसूरत एहसास है प्रेम
प्रेम में जीना, बहिश्त में जीना
प्रिये ! माफ करना, लेकिन
प्रेम के लिए यह वक्त माकूल नहीं।

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1 Response

  1. अच्छी कवितायें!

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