केवल मां की बंदगी नहीं है वंदेमातरम्

वेंकटेश सिंह

फूल-सा खिल जाता है मन… जब कोई मां की वंदना करता है। रोमांच से भर जाता है रोम-रोम… जब कहीं से वंदे मातरम् की धुन गूंजती है
वंदे मातरम् सिर्फ गीत नहीं है। यह सिर्फ बंदगी भी नहीं है। यह कृतज्ञ राष्ट्र की आराधना है। यह उस शस्य श्यामला धरती की आरती है, जिसकी रातें चांदनी की गरिमा में प्रफुल्लित होती हैं… और जिसकी जमीन खिलते हुए फूलों वाले वृक्षों से ढकी हुई है; जिसमें हंसी की मिठास है, वाणी की मिठास है; जो अपने सभी संतानों को एक जैसा पालती है।
जज़्बा आजादी का हो… जोश गुलामी की जंज़ीरों को तोड़ने का हो… दिल में बगावत का इरादा हो और दिमाग में क्रांति का जुनून हो तो लबों पर वंदे मातरम् का तराना खुद-ब-खुद आ जाता है
आजादी के परवानों को वंदे मातरम् कहने के लिए किसी ने उकसाया नहीं था। मादरे-वतन की खिदमत में जान लुटाने को तैयार दीवानों ने इस गीत को अगर आजादी का तराना बना लिया तो सिर्फ इसलिए कि ये बोल उनके दिल से निकले थे… और इस गीत में उन्हें अपना अधूरा ख्वाब दिखता था।
आजादी के 70वें साल में भी इस गीत में वही रोमांच है, वही कशिश है… दिलों में जोश भरने वाला वही जादू है। ठंडे खून में भी उबाल ला देने वाली वही शक्ति है जिसने देश के करोड़ों किसानों-मजदूरों को आजादी की लड़ाई में शरीक होने के लिए प्रेरित किया था
आजादी की पहली लड़ाई… पहली बगावत… पहला विद्रोह। साल 1770, जगह- बंगाल।
ये बागी किसी एक राजा के सैनिक नहीं थे… ना ही किसी नबाब के गुलाम। बगावत के बाद उन्हें तख्त-ए-ताऊस पर बैठने की इच्छा भी नहीं थी। वो संन्यासी थे और अपनी मातृभूमि के लिए अंग्रेजों से लड़ रहे थे।
1770 में बंगाल में पड़े भीषण अकाल के बाद किसानों, मजदूरों और शिल्पकारों का दर्द इन संन्यासियों से देखा नहीं गया और वे बागी बन गए। दसनामी संप्रदाय के संन्यासियों ने मठों में रहने वाले साधुओं और गांव-गांव घूमने वाले मुस्लिम फकीरों को एकजुट किया और वो अंग्रेजों से भिड़ गए।
संन्यासियों के उसी विद्रोह से नारा निकला- वंदे मातरम्। बंगाल के मशहूर उपन्यासकार बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास ‘आनंद मठ’ में संन्यासी विद्रोह की गाथा लिखी तो ‘वंदे मातरम्’ एक गीत की शक्ल में सबके सामने आया। तब से लेकर आज तक यह गीत हिंदोस्तां के दिलों में जोश भरता आ रहा है… मादरे-वतन पर जान लुटाने को तैयार नौजवान इस गीत पर कुर्बान होने को तैयार रहते हैं
आनंद मठ में लिखे गीत का पहला दो पद भारत का राष्ट्रगीत है। इस राष्ट्रगीत को करोड़ों बार गाया गया है। मूल रूप से बांग्ला में लिखे गए इस गीत का सैकड़ों भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। 1906 में महर्षि अरविंद ने वंदे मातरम् का अंग्रेजी गद्य और पद्य में अनुवाद किया था। महर्षि अरविन्द के अंग्रेजी गद्य-अनुवाद का हिन्दी अनुवाद इस तरह है-

मैं आपके सामने नतमस्तक होता हूं। ओ माता!
पानी से सींची, फलों से भरी,
दक्षिण की वायु के साथ शांत,
कटाई की फसलों के साथ गहरी,
माता!
आपकी रातें चांदनी की गरिमा में प्रफुल्लित हो रही हैं,
आपकी जमीन खिलते फूलों वाले वृक्षों से बहुत सुन्दर ढकी हुई है,
हंसी की मिठास वाली, वाणी की मिठास वाली,
माता! वरदान देने वाली, आनन्द देने वाली।
मैं आपके सामने नतमस्तक होता हूं।

धरती माता है। जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। जन्मभूमि पर होने का सुख स्वर्ग में होने के सुख से भी बढ़कर है। लंकापति रावण का संहार करने के बाद भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा था- जननी जन्मभूमिश्चि स्वर्गादपि गरीयसी… अर्थात् माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। आर्यावर्त की यही परंपरा रही है। इस नजरिये से देखें तो वंदे मातरम् गीत में हिंदुस्तान की परंपरा घुली मिली है।

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