वत्सला पांडेय की पांच कविताएं

एक
गमले में रोपना चाहती हूँ
तुम्हारी यादों के बीज
सीचूंगी इन्हें
बड़े जतन से
वक्त के साथ
फूटेंगे इसमें अंकुर
दो पत्तियों से
बढ़कर बनेगा पौधा
तना ,टहनियां ,पत्तियां
कुछ फूल भी खिलेंगे
उन खुशबुओं से लबरेज
जब तुमने अपना हाथ
मेरी ओर बढ़ाया था
घण्टों मुझे मनाया था
मैं मुस्कुरा कर मना करती
तुम खिलखिलाकर अपनाते
किसिम किसिम के फूल
उन मुलाकातों के
जब तुम बहाने से बुलाते थे
तरह तरह से मुझे रिझाते थे
ध्यान से देखो
इस पौधे में फूल बहुत है
खुशबू बहुत है इन फूलों में
क्योंकि तुम्हारे साथ बिताये
पलों ने हमेशा खुशियाँ दी थी
उन फूलों के साथ
कुछ कांटे भी हैं
उन यादों की
जिनमें हमने बेवजह
झगड़े किये
कभी तुमने कभी हमने
आरोप लगाये एक दूसरे पर
किसिम किसिम के कांटे हैं
हर उन लम्हों के
जब हमारे रिश्तों में
दरारें आती गयी
जब रिश्ते सिकुड़ते गए
नुकीले हो गये
चुभने लगे एक दूसरे को
खटकने लगे एक दूसरे के मन में
ऐसा होगा तुम्हारी यादों का पौधा
काश कोई बागबानी ऐसी भी हो
जिससे तराश सके उस पौधे को
हटा सके उन कांटों को
केवल महके तुम्हारी यादों के फूल
चारों तरफ
दो
ओ ज़िन्दगी
जब भी देखा है तुझे
खूबसूरत लगी हो मुझे

मिट्टी में लिपटे..
सड़क के किनारे
उन नन्हे मासूमों
के होंठो पर
मुस्कुराती ही दिखी हो…..

ईंटों के चूल्हे
चूल्हे पे हांडी

निहारती उसे चंद आँखें
उन आँखों में
मुस्कुराती ही दिखी हो ……

चिथड़ों में लिपटे
यौवन को ढंकते
उलझी लटों के पीछे
हौले हौले से
मुस्कुराती ही दिखी हो …..

गलियों में ,आँगन में
घर की देहरी पर
छत की मुंडेरों पर
तुलसी के चौरे पर
मुस्कुराती ही दिखी……

रोपना चाहती हूँ
इसी मुस्कुराहट को
पीड़ा के बंजर खेतों में

उगाना चाहती हूँ
मुरझाई सी
होंठों की क्यारियों में
तुझे बारंबार……

क्यूंकि तुम दुबारा नहीं
मिल पाओगी
इसीलिए मैं
दुःख पीड़ा निराशा
नहीं देख पाती

देखती हूँ भी तो
उन विषमताओं के
मध्य तुझे
उम्मीदों से मुस्कुराते
प्रतिपल जीवन के
नए ताने बाने बुनते……
और मुस्कुराहट से
जीतते हुए

ओ ज़िन्दगी
ओ ज़िन्दगी…

तीन
जैसे पंख फैलाकर कोई पंक्षी उड़ता है
जैसे बालू के कण से कोई मोती बनता है
जैसे बादल के बरतन से छल नीर छलकता है
या फिर तारों का आँचल ये नटखट गगन पहनता है
ये अहसास कितना अच्छा लगता है

प्यार में मीठी तकरार कितनी अच्छी लगती है
जैसे खटर पटर सी करती छुक छुक रेल चलती है
जैसे चट्टानों से लड़कर कोई लहर लौटती है
जैसे तीखी लाल मिर्च की छन से छौंक लगती है
या फिर डाइनिंग टेबल पर छूरी संग काँटा सजता है
ये अहसास कितना अच्छा लगता है

प्यार में हल्का स्पर्श कितना अच्छा लगता है
जैसे फूलों की पंखुरियाँ कोई भंवरा छूता है
जैसे सर्द हवा का झोंका गालों को सहलाता है
जैसे रात की बाहों में प्यारा चाँद चमकता है
या फिर विस्तृत अम्बर में लप से कौंध लपकता है

कितना अच्छा लगता है ,कितना अच्छा लगता है
चार
तुम्हारी कल्पना के
सागर में जलपरी सी बनूँ
अपने अंतस में छुपाये हो
विचारों की सीपियाँ जो
उनसे एक एक मोती मैं चुनूँ
सोचती हूँ …..

कभी जलकण से हो
कभी विस्तृत पारावार
कल्पनाओ का हो
आलौकिक संसार
इस संसार में विचरण करूँ
सोचती हूँ….

खो रही हूँ मैं
तुम्हारी कल्पना में
गोल और चौकोर सी
अल्पना में
बस तुम्हारे रंग में खुद को रंगू
सोचती हूँ आज तुमको मैं पढूं…..

पांच
सुधियों ने लिख डाली पाती

अनगिन लहरें आती जाती……….

कुछ बातें अनकही लिखी है
कुछ तो बिलकुल सही लिखी है
कैसे शब्दों को समझाती…….
सुधियों ने………

अंतस में पीड़ा ही पीड़ा
करुणा भी करती है क्रीड़ा
आँखें खारी धार बहाती…….
सुधियों ने……

दर्पण में प्रतिबिम्ब अधूरा
एकाकी जीवन कब पूरा
तुम बिन कैसे पूर्ण कहाती…..
सुधियों ने……

बीते पल की ज्वाला दहके
कुछ कचनारें इत उत महके
दीपक जलते है बिन बाती……

सुधियों ने लिख  डाली पाती.

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वत्सला पाण्डेय
जन्म स्थान-लखनऊ
शिक्षा-बीएससी(गणितवर्ग),एल.टी.,एम.ए.(शिक्षा-शास्त्र)
सम्प्रति-वर्ष 2003 से माध्यमिक विद्यालय में सतत अध्यापन कार्य
वर्ष 1997 से 2004 तक आकाशवाणी में कार्यक्रम प्रस्तोता
प्रकाशित पुस्तक– नर्म ख्वाहिशें(काव्य संग्रह)

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1 Response

  1. विनय सक्सेना says:

    वत्सला जी शीतल सुगंधित बयार सी मन को प्रफुल्लित करती कवितायें लंबे समय तक उस कवियत्री की लेखनी को नमन।शुद्ध कवित्वपूर्ण रचनायें।

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