वेद प्रकाश की तीन प्रेम कविताएं

एक लंबी प्रेम कविता

तुम धूप में
अपने काले लंबे बाल
जब-जब सुखाती हो
सूरज का सीना फूल जाता है
और पूरे आकाश पर छा जाता है

मैंने देखा है
गुलमुहर के नीचे
बस का इंतजार करते हुए
बस आए या न आए
तुम्हारी छाया
गुलमुहर को
चटख कर देती है
गुलमुहर पर चिड़िया
चहकने लगती है
परेवा दूर से उड़ते-उड़ते
तनिक देर बैठ कर
साॅस ले लेते
गुलमुहर को हवा का
शीतल स्पर्श
अनायास हो जाता
गुलमुहर फूलों से लद जाता
धरती अपना सब न्योछावर कर देती
पाताल का पानी
फुनगी तक जाता
पेड़ हरा-हरा रहता
लोग देर होने के बाद भी
कुछ देर नीचे बैठना चाहते
रिक्शावाले यहीं रोटी बनाते-खाते
उनके ईंट का चूल्हा अभी जीवित है
तुमने पर्स से पाॅच रूपया
निकाला और भिखारी को दे दिया
भिखारी का होठ सूखा था
कपड़े फटे थे
बाल बिखरे थे
पैर बिवाइ्र्रयों से भरा था
पैसा ले कर
जैसे ही भिखारी जाने को हुआ
तुमने कहा
ये भी उसी ईश्वर की संतान है
हमने इन्हें कैसा बना दिया

तुम्हें आज पैदल ही जाना होगा
शहर में टैम्पो की हड़ताल है
रोडवेज की बस आज नहीं चलेगी
तुम किसी साधन की गुलाम नहीं
तुमने स्वतंत्रता सबको दी है
तुमने सबकी सेवा की है
हस्पताल में एक नर्स के लिए
सभी मरीज समान होते हैं

तुम कभी भी किसी से उलझती नहीं
तुम्हारे शब्द किसी को धोखा नहीं देते
तुमने ईश्वर को ईश्वर माना
आदमी को ईश्वर बनाने का प्रयास किया
तुम्हारे रास्ते दुनियावी नहीं
तुम कहीं से भी अपनी बात कर सकती हो
लोग अब समझ गए हैं
तुम्हारे हाथ/केवल मरहम लगाने के लिए हैं
लोग जानते हैं
तुम किसी मंदिर की पुजारन नहीं
तुम पत्थर पर सो सकती हो
तुम किसी की विश्वास में
एक जरूरी कड़ी हो
तुमने बता दिया है
लोगों को चलने का तरीका
तुम्हारे माथे पर चमकती यह पसीना की बूंद
किसी उपन्यास या महाकाव्य के
चरित्र सरीखा है

अंतरिक्ष का यह आखिरी बूंद
धरती के पाताल का पता बताता है
मैंने देखा है
उलकाओं को टूटते हुए
घरों के अंदर पानी भरते हुए
लोग घर छोड़ कर भागने लगते हैं
लेकिन, तुम पानी के उपर
प्रेमपत्र की तरह तैरती रहती हो
वे

वो अवाक थे !
खुले आकाश के नीचे
धरती का विस्तार
नदियों के किनारेां तक
पेड़ों, पक्षियों, रास्तों, हवाओं
सब में एक साथ रहते हुए
वे इंद्रधनुष हो गए

वे बरसते थे
घने काले बादल के बीच
उमड़ते थे
टहनियों पर लहरा कर
दौड़ते थे
हिरन के पीछे-पीछे
नाचते थे
मोर के साथ
हॅसते थे
पंखुड़ियों में
एक बार पलकों में बंद हो कर
सुबह सूरज में निकलते थे
चाॅद अपने साथ
तारों की बारात सजा कर
टिटिहरी,कोयल,झिंगुर का बैण्डबाजा
हाथी रात भर नाचा
रात सुबह में नहीं बदली
मुर्गे सो गए, कुचकुचवा चुप हो गया
कुहरा फैलने लगा
रूमाल के आॅचल में
पूरी रात सिमट गई

वे देखते रहे
दुनिया का रंग
जब पेड़ भीगने के बाद
झूमने लगते हैं
उनके शरीर से टपकती बूंदें
धरती को समेट कर
दूब को गले लगा लेती
वे दूब को आॅचल में
चावल-हल्दी के साथ
बचा कर रखते
वे सोचते
उनका जीवन इसी तरह
बचा रहेगा
वे दौड़ने लगते
दुनिया छोटी पड़ जाती
दुनिया कभी समुद्र के आगोश में
कभी लहरों की बाहों में
कभी जहाजों के पीछे
कभी परछाइयों में
कभी-कभी
उनकी आॅखों में
दुनिया का अक्स उभर उठता
वे दुनिया से ऊपर हो जाते
वे नहीं जानते
साथ-साथ चलना
वे नहीं जानते
अठखेलियाॅ
वे कई बार
धरती पर चित्र उकेरे
वे कई बार उसे मिटाए
समय की सीमा

उनके लिए नहीं
वे समय से आगे-आगे
एक इतिहास बनाना चाहते
इतिहास मकबरों,किलों,रजवाड़ों
से अलग
इतिहास किसी हार या जीत का नहीं
इतिहास जिसमें दो जिंदा लोग
आजाद आक्सीजन
अपने फेफड़ों में खुलकर भरते
बिना किसी रोक-टोक
बेहिचक, बेजुबान
आपने कभी किसी को
हवा में हाथ लहरा कर
चलते हुए देखा है ?
और, लहराते हुए हाथ
से कोई जहाज रूक जाय
दूर तक पानी फैला हो
आपके साथ केवल आकाश हो
कभी कभार हवा आपका शरीर सहला दे
सोचिए, वे किस तरह
अकेलेपन में भी
एक दुनिया साथ
रखते थे
वे माऊथआर्गन
से खेलते हुए
भूल गए अपना रास्ता
कुछ टीले, कुछ बालू के ढूह
कुछ मगरमच्छ, कुछ मछलियाॅ
कभी दिन, कभी रात
वे सब भूल गए

उनकी हाथों में
एक किताब थी
उनके होठों पर
लरजते हुए शब्द
उनकी आॅखों में
कुछ नहीं था
वे खाली थे
वे देखते रहते

कोई अपना सब भूल जाए
मैनें यहीं देखा
वे भूल कर भी
मुकम्मल खड़ा होना चाहते
हमें तो यह लगता है, कि,
यहाॅ कोई भी
मुकम्मल खड़ा नहीं होता
मुकम्मल खड़ा होने की
कोशिश में
वे अपना सब भूलते गए
वह चाहता था

वह चाहता था
उसकी प्रेमिका हॅसती रहे
उसके बाल हवा में
खेलते रहें
वह चाहता था
खुले मैदान में
हरी-हरी घास के बीच
सूरज की अथाह रोशनी के साथ
उसे निहारता रहे
वह एक टाफी देना चाहता था
वह एक ऐसी नाव का यात्री था
जो कभी भी डूब सकती थी
और, लहरें उसे नदी की
आखिरी छोर तक ले जातीं

वह जानता था
टहनी से फूल तोड़ने पर
फूल नहीं रह जाता
इसीलिए किताबों में
फूलों को छिपा कर रखता
वह कहता था
मोर पंख किताबों में
बड़े होते हैं
अशोक के पत्ते
मुसीबत में साथ देते हैं
वह आहट से आहट तक
सजग रहता
एक रात जूगनू के पीछे
दौड़ता-दौड़ता दूर तक चला जाता
जूगनू मिला कि नहीं
लेकिन, वह रास्ता जरूर भूल गया
वह आॅखों में समंदर
दिल में हौसला रख कर
एक-एक कदम चलता
उसके पास एक दुनिया का नक्शा
और, एक कम्पास था
वह भ्रम में नहीं था
वह जानता था
एक रास्ते के बाद ही
दूसरा आता है
लेकिन, आकाश की सीमा
उसकी यात्रा के जद में थी
वह जल्दबाजी में नहीं था
उसने कटी पतंगों को देखा था
बिजली के तारों में
उलझने के बाद का हस्र

वह अपनी प्रेमिका को
धीरे-धीरे धरती पर
चलते देख कर
रोमांच से भर जाता
उसके सीना में
हवा के बगूले उठने लगते
वह कभी सीढ़ियाॅ चढ़ता
कभी उतरता
वह दिसंबर माह में
पंखा चला देता
कुहरे से ढ़ॅकी सड़क
को बादल से ढ़ॅका कहता
वह भूल जाता
अपना सब कुछ

उसकी माॅ ने उसे काफी दी
वह पीना भूल गया
उसने जब पहली बार
अपनी प्रेमिका को देखा
जैसे हवा में
बादल तैर रहे थे
वह हर बादल से टकरा कर
भीग रहा था
सूरज पर्वत से जैसे-जैसे
नीचे आ रहा था
घास की फुनगी ओस की टोपी में
उसके तलवों को सहला रही थी
पेड़ के गाछ
झूमने लगे थे
चिड़िया चहक रही थी

वह चाहता था
अपनी प्रेमिका से मिलना
रोज घर से निकलता
रोज रास्ता भूल जाता
वह पेड़ में धागा
बाध कर
पेड़ की छाया में
अपनी छाया
मिलाना चाहता था

 

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पता: गोरखनाथ मंदिर
राजेन्द्र नगर – पश्चिम
भाॅटी विहार
गोरखपुर-203015
मोबाईल: 9936837945

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