वीणा भाटिया की दो बाल कविताएं

रसगुल्ले के पैसे लाओ

 

चिड़ियों ने बाजार लगाया

कौआ चौकीदार बिठाया।

मेले में जब भालू आया

उठा एक रसगुल्ला खाया।

गौरैया यह कह मुस्काई

कहां चल दिए भालू भाई।

जल्दी क्या है रुक भी जाओ

रसगुल्ले के पैसे लाओ।

भालू बोला क्या फरमाया

मुझको क्या जान न पाया।

मंत्री जी हैं पिता हमारे

होश करें वो ठीक तुम्हारे।

सुन कर झगड़ा कौआ आया

डांटा कोट उतार रखवाया।

और कहा भालू जी जाओ

कल तक पैसे लेकर आओ।

जब पैसे देकर जाओगे

कोट तभी वापस पाओगे।

मंत्री जी को जा बतलाना

अब अंधेर नहीं चल पाना।

 

पैसा दे दो

मां मुझको पैसा दे दो

मैं लाकर चकमक पढ़ूंगा

नहीं चटनी चाट-पकौड़ी

गोलू के संग नहीं लड़ूंगा।

 

देश-विदेश की बातें पढ़कर

आगे-आगे रोज बढ़ूंगा

नये ज्ञान की नई खोज की

सीढ़ी पर दिन-रात चढ़ूंगा।

 

नहीं कहूंगा झूठी बातें

भूल-चूक पर नहीं अड़ूंगा

नहीं पतंग की डोर पकड़ कर

छोटे बच्चों से झगड़ूंगा।

 

काम बुरे हैं जो मैं उनमें

नहीं व्यर्थ मैं कभी पड़ूंगा

मां मुझको पैसा दे दो

मैं लाकर चकमक पढ़ूंगा।

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