विभव प्रताप की 3 कविताएं

विभव प्रताप

छात्र, इलाहाबादविश्वविद्यालय

मो- 9621082127

इलाहाबाद

  1. गांव की बिजली

अँधेरों को करनी होती है

जब अठखेलियाँ सन्नाटे से

या ढेर सारी बातचीत झींगुर से

तब टप से पत्तों के किनारे से

झर जाता है कहीं धूप

गिर जाता है कहीं खम्भा

टूट जाता है कहीं तार

और आ पहुँचता है

धम्म से काला अँधेरा गांव में।

हफ़्ते भर से मेरे गांव में भी

सजा रहा अँधेरा

कभी कमरे में

कभी टांड़ पर

कभी पहुँच जाता माँ के चेहरे

पापा की तौलिया

भाई के सिरहाने तक।

झरोखे से आता हल्का धूप

भगा तो देता अँधेरा लेकिन नाकाफ़ी।

अँधेरा गांवों को विरासत में मिली है।

बिजली के खम्भे गड़े हैं

लेकिन अड़े नहीं हैं

डटे नहीं हैं अपने काम पर।

हफ़्ते में एकाध बार आती है बिजली

दस तोला दस माशा

जिसमें अँधेरा भागता नहीं

मुस्कुराता रहता है

चिढ़ाता रहता है।

कभी यहाँ कभी वहाँ

कभी-कभी यहाँ-वहाँ हर जगह

टूट के गिरा रहता है

बिजली का तार

बिजली का खम्भा।

अँधेरे से टूटता है तार?

या तार से टूटता है अँधेरा?

यह प्रश्न यक्ष है।

मेरे गांव में मजबूत है रिश्ता

लेकिन तार नहीं

खम्भे नहीं।

काला अँधेरा आदमी को काला करने की

जुगत में है

लेकिन मेरे गांव का आदमी

अँधेरे में रहता भले है

लेकिन अँधेरे में नहीं रहता।

एक हफ़्ते बाद बनी है बिजली

मिले हैं तार से खम्भे

खम्भों से तार।

बच्चे कर रहे हैं कोलाहल

माँएं दौड़ रही हैं घर की तरफ

पंखा चल गया है

सूखने लगा पसीना

पापा के माथे से।

मेरे गांव में बिजली का आना

किसी उत्सव से कम नहीं।

2. हमारा गूँगापन

चुप!

चुप!

एकदम चुप!

मैं चुप!

तुम चुप!

वे अपनी मधुर ध्वनि से

हमें कर रहे बहरे

और हम हैं अबतक चुप्प।

स्वार्थवश

हमने पाई है जीभ

दिल जीतने के लिए

या खुशामद में तलवे चाटने के लिए?

हमें मिला है पैर

पहाड़ चढ़ने के लिए

या चलते हुए को लँगड़ी मारने के लिए?

हमें मिली है एक जोड़ी आँख

नजारे निहारने के लिए

या गन्दी नीयत से ताड़ने के लिए?

पाया है हमने दो ठो हाथ

गड्ढे में गिरे को निकालने के लिए

या थोड़ा और धक्का देने के लिए?

हमें मिले हैं इतने अंग

जिसलिये

हम स्वार्थ में भूलते जा रहे

क्यों और किसलिए?

  1. शहर जाना

किसी ग्रामीण को शहर जाना

बहुत अखरता है।

जब सारी सरकारी ग्रामीण योजनाएँ

पास होकर गांव में फेल हो जाती हैं।

जब आदमी का गहना-खेत-इज्जत

सब गिरवी हो जाता है।

तब आदमी पेट में पत्थर ठूँस कर

सिर झुकाये पत्थर काटने

चल देता है शहर की ओर मुँह उठाये।

गुड्डी की गुड़िया लाने।

शहर जाने वाला आदमी चुपके से

दबे पाँव जाता है

बिना बच्चों को बताए।

जब तक ग्रामीण शहर जाता रहेगा

शहर सम्पन्न होता रहेगा।

शहर में गया आदमी अपने अंतिम क्षणों में

गाँव लौटना चाहता है।