मुसाफिर बैठा के कविता संग्रह ‘विभीषण का दु:ख’ से 5 कविताएं

मुसाफिर बैठा
  1. तीन स्थितियां

आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता

स्वाभाविक स्थिति!

दलित मरने के पहले  कुछ नहीं बोलता

अस्वाभाविक स्थिति ! !

दलित को आदमी नहीं भी कहा जा सकता

स्वाभाविक  स्थिति ! ! !

(उदयप्रकाश की एक कविता से प्रेरित)

 

  1. डर में घर

जिसे तुम कहते हो देवालय

वह है फकत

स्वार्थ और लोभ की गारे मिट्टी से बना

डर का घर

 

  1. कर्तव्य भर नफ़रत

बहुत चली मुहब्बत की बातें उनकी ओर से

नफ़रतें उगाते रहे जमीं पर जबकि

वे भीतर-बाहर लगातार

 

 

नफ़रतें पालीं उनने एकतरफा

हमारी तो पहुंच ही नहीं रही उन तक

कि उनके  प्रति  हम नफ़रत रखें अथवा प्रेम

सब कुछ तय होता रहा उनकी तरफ से

हमारी  ओर से कुछ भी नहीं तो!

वे ही जज रहे हमारे मुजरिम भी जबकि वे ही

 

हममें नफ़रत करने का माद्दा कहां

हम तो बस कर्तव्य भर

उनकी नफ़रतों के जवाब पर  होते हैं!

 

 

  1. जवाबदारी

मैं हारता रहा हूं जब तब

जीतने के अपने जज्बे को

बिना आराम दिए

हार के पीछे मेरा कोई दम नहीं है न युक्ति

जीत के पीछे हर मुमकिन दम है जबकि

 

मैं केवल जीतने की जवाबदारी

लेने का पक्षधर हूं

 

  1. लिख

दु:ख का नाम दलित तू लिख

लिख, सुख का नाम सवर्ण लिख

दु:ख-सुख के मंझधार का नाम ओबीसी तू लिख

लिख, भगवा भारत में हड़काए सताए का नाम मुस्लिम लिख

जल जमीन से हटाए भगाए का नाम तू आदिवासी लिख

लिख, इस देश का नया नाम ‘जात-पांत का न पारावर’ लिख

 

और, इस सुख- दु:ख के गणित में कहीं विरोधी आवाजाही लखे तो

साफ उसे अपवाद तू लिख

 

 

 

 

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