विभूति कुमार मिश्र की पांच कविताएं

एक

झूठी बातों से बहलाना ना
हो सके तो
कड़वे सच से रुला देना
आंसुओं में सब निकल जायेगा
जिसे पत्थर समझती हो
मोम है,पिघल जायेगा।

झूठ से परत पड़ेगी जिद्दी
मोम पत्थर में बदल जाएगा।

दो

पुत्र
माँ के हृदय की बराबरी
कई जन्मों में नहीं कर सकता।
वो स्वार्थी है।
आकांक्षी है,पाए स्नेह का।

90 साल का ज्ञानी भी
नतमस्तक है
नौ महीने की कोख के आगे

सौ साल के मतिभ्रम में भी
चोट लगने पर
मति आती है
माँ बहुत याद आती है।

तीन

श्रमिक अच्छे हैं
महाजन सच्चे हैं
ठीक है लोमड़ी
वैसी ही खोपड़ी

पत्रकार,साहित्यकार
अक्सर होते बेकार
आत्मा जाती है बिक
मैं,तुम,वो, है धिक।

चार

औरतों के रंगीन पर्स
मोबाइल के आकर्षक कवर
दर्पणों में निहारना
सेल्फ़ी में खिंच जाना
नख-शिख तक श्रृंगार
साफ सफाई पर तकरार
चेहरे पर मुस्कराहट की रेखा
तुमने इसमें जीवन नहीं देखा?

औरतों से सीखो प्यारे जीना
रोना,गाना और सहज होना।

पांच

तू यूं खामोश न रह
दिल दहल जाता है
दो बात तीखे ही बोल
मन बहल जाता है

You may also like...

9 Responses

  1. अनूप वर्मा says:

    फेसबुक की कृपा से यहां आ गया। पढ़ कर अच्छा लगा।
    दो और पांच विशेष रूप से अच्छा लगा।

  2. राजेश श्रीवास्तव says:

    आज अचानक निगाह पड़ गयी, बहुत सुन्दर विभूति भाई

  3. अमित says:

    बेहतरीन

  4. Alka Singh says:

    All of them are beautifully written,but the one where you have described woman is awesome .
    There is lot I can learn from you.
    A great initiative to contribute to Hindi Literature.

  5. cm says:

    बहुत अछे सर
    दिल को छूने वाली लाइनें

Leave a Reply