विहाग वैभव की पांच कविताएं

माँ का सिंगारदान

हर जवान लड़के की याद में
बचपन
सर्दियों के मौसम में उठता
गर्म भाप सा नहीं होता

रेत की कार में बैठा हुआ लड़का
गुम गया मड़ई की हवेली में

हमारे प्रिय खेलों में
सबसे अजीब खेल था
माँ के सिंगारदान में
उलट-पलट , इधर-उधर
जिसमें रहती थी
कुछेक पत्ते टिकुलियाँ
सिन्दूर से सनी एक डिबिया
घिस चुकी दो-चार क्लिचें
सस्ता सा कोई पाउडर
एक आईना
और छोटी-बड़ी दो कंघी

हम माँ को हमेशा ही
खूबसूरत देखना चाहें
हम नाराज भी हुए माँ से
जैसे सजती थी
आस-पड़ोस की और औरतें
माँ नही सजी कभी उस तरह

माँ उम्र से बड़ी ही रही
हमने माँ को
थकते हुए देखा है
थककर बीमार पड़ते देखा है
पर माँ को हमने
कभी रोते हुए नहीं देखा
हमने माँ को कभी
जवान भी नहीं देखा
बूढ़ी तो बिल्कुल नहीं

मैंने सिंगारदान कहा
जाने आप क्या समझे
मगर अभी
लाइब्रेरी के कोने में
एक लड़का सुबक उठा है
मेरी दवाइयों के डिब्बे में
सिमटकर रह गया
माँ का सिंगारदान ।
युद्ध के खिलाफ़ युद्ध

किताबों का दूरबीन ले आओ
और झाँको इतिहास के ग्रह पर
तुम पाओगे कि
समूचा ग्रह पटा पड़ा है
मरे हुए युद्धों से
जिसमे सड़ रही है
इंसानों की बेहतरीन नस्ल
जिसकी तलवारें रो रही हैं
खून के आँसू

हमने कितनी ही कितनी बार
कितने ही कितने
लड़े हैं युद्ध
युद्ध धर्म के लिए
युद्ध देश के लिए
युद्ध सम्पत्ति के लिए
स्वाभिमान के लिए
युद्ध सौन्दर्य के लिए

पर ध्यान रहे
हजारों हजार युद्ध भी
एक शांति से मुकाबला नही कर सकते
युद्ध नही कर सकते कोई सृजन
जंग के प्राथमिक संस्करण से पीड़ित
यह समय
जब कराह रहा है
चोटिल आत्मा की आवाज
तो आओ
हम मुट्ठी भर लोग तय करें
एक आखिरी जंग

एक जंग
अपनी शैतानी रूह के खिलाफ़
एक जंग
अपनी अनंत लालसा के खिलाफ़
एक जंग
अपनी हवस के खिलाफ़
एक जंग
अपनी ईर्ष्या के खिलाफ़
एक जंग
अपने बदले के खिलाफ़
आओ लड़े हम
बस एक आखिरी जंग
शांति के लिए
हमारी दुनिया को
शांति की जरूरत है ।

बलात्कार

पहले तुम अपने प्यासे दाँत
अपने होंठों में छुपा लो
और आर्टिफिशिअल मुस्कान बेचकर
मेरे दोस्त बनो
हाँ अब ठीक है
अब मैं तुम पर भरोसा करने की
युगीन गलती करती हूँ
नहीं, नहीं अभी रुको
अभी बस हाथ पकड़ना सीखो
और जब बैठी रहूँ बाइक पर मैं
बाइक को बेवजह उछालना सीखो
तुम मुझे भूतनुमा टैडी बीअर भी गिफ्ट करो
तुम मेरा खयाल रखो कसाई सा
अब मैं अपनी आनुवंशिक पाप
दुहराती हूँ
तुमसे प्रेम करती हूँ
नहीं , तुम भी मुझसे मत करो
हम बलात्कार-बलात्कार खेल रहे हैं
तुम ये खेल खेलते हुए बिल्कुल न डरो
हम एक बलात्कारजीवी समाज में रहते हैं
अब तुम अपने डेरे बुलाओ मुझे
अकेले में किसी रोज
एक भीषण रात में
मेरी आत्मा की छाती चाड़ दो
मेरी आवाज में अपना गमछा ठूँस दो
अब निकालो अपने वो छुपे हुए हवशी दाँत
घोप दो मेरे होने के हर एक हिस्से में
अब झूठमूठ के खेल में
मैं सचमुच की पागल हो जाती हूँ
और चुन लेती हूँ जिन्दगी का प्रतिपक्ष
इस तरह
आओ हम बलात्कार-बलात्कार खेलें ।
बलात्कार और उसके बाद

कई दिनों तक लड़की रोयी , बस्ती रही उदास
कई दिनों तक बड़की भाभी सोयी उसके पास
कई दिनों तक माँ की हालत रही बेतरह पस्त
कई दिनों  तक बाबा दुअरे  देते रह गये गस्त
निर्णय आया लोकतंत्र में कई दिनों के बाद
बरी हो गया ये भी अन्त में कई दिनों के बाद
हवशी हैं मुसकाकर झाँकें कई दिनों के बाद
फफक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
( बाबा (बाबा नागार्जुन) तुम खुशनसीब थे कि ‘अकाल और उसके बाद ‘ लिखना पड़ा , ‘बलात्कार और उसके बाद ‘ नहीं । )
मँगरी

मँगरी किसी देहाती बुढ़िया का नाम नहीं
हमारी भैंस का नाम था
हमारे जन्म के बरस
मँगरी आयी हमारे खूंटे
दादी, पापा,भईया
सबकी दुलारी थी मँगरी

मँगरी मारती थी हर अनजाने को
तभी दादी ने नाम रक्खा था
मँगरी
तीसरी बार गाभिन मँगरी का बच्चा गिर गया
फिर नहीं मारी मँगरी किसी को

भईया की आवाज तक पहचानती थी
पापा की आज्ञापालक भी थी मँगरी
मुझे कई बार लगा
वो हमारी भाषा सीख गयी थी
वो नाराज तक होना सीख गयी थी
नाँद में मुँह ही न डालना

जैसे होते हैं घर में और और लोग
वैसी ही थी मँगरी
मँगरी चली गयी
मँगरी की पीढ़ियां चल रही है
दादी किसी बिछड़े प्रिय सा
याद करती है उसे
मँगरी को दो ही छिम्मी थी
पर दूध कम न देती थी
दूध का नुकसान देख
दादी कहती है
दूध का नुकसान न करो
दूध के नुकसान से
मँगरी का थन दुखता है
मगर मैं समझता हूँ
दादी को मँगरी से प्यार था
और दादी का मन दुखता है ।

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परिचय

नाम : विहाग वैभव
स्थायी पता- ग्राम सिकरौर , पो- भोंड़ा, जिला – जौनपुर , उत्तर प्रदेश
शिक्षा- एम.ए हिन्दी ( द्वितीय वर्ष )
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ,(BHU)
मोबाइल – +918858356891
#  विभिन्न राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय काव्य गोष्ठियों में काव्य – पाठ व अनेक संस्थागत तथा विश्वविद्यालयी काव्य-प्रतियोगिता में पुरस्कृत व प्रकाशित ।

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2 Responses

  1. Paritosh kumar piyush says:

    बेहतरीन

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