विहाग वैभव की 5 कविताएं

विहाग वैभव

शोध छात्र – काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU)

नया ज्ञानोदय , वागर्थ , आजकल , अदहन, सहित विभिन्न महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं और ब्लॉगों में कविताएँ प्रकाशित । 

मोबाइल – 8858356891

 1. हत्या-पुरस्कार के लिए प्रेस-विज्ञप्ति

वे कि जिनकी आँखों में घृणा
समुद्र सी फैली है अनंत नीली-काली

जिनके हृदय के गर्भ-गृह
विधर्मियों की चीख
किसी राग की तरह सध रही है सदी के भोर ही से

सिर्फ और सिर्फ वही होंगें योग्य इस पुरस्कार के

जुलूस हो या शान्ति-मार्च
श्रद्धांजलि हो या प्रार्थना-सभा
जो कहीं भी , कभी भी
अपनी आत्मा को कुचलते हुए पहुँच जाए
उतार दे गर्दन में खंजर
दाग दे छाती पर गोली
इससे तनिक भी नहीं पड़े फर्क
गर्दन आठ साल की बच्ची की थी
छाती अठहत्तर साल के साधू की थी

देश के ख्यात हत्यारे आएँ
अपना-अपना कौशल दिखाएँ
अलग-अलग प्रारूपों में भिन्न-भिन्न पुरस्कार पाएँ

मसलन
बच्चों की हत्या करें चिकित्साधिकारी बनें
स्त्रियों की हत्या करें , सुरक्षाधिकारी बनें

विधर्मियों की लाशें कब्रों से निकालें फिर हत्या करें
मुख्यमंत्री बनें
देश की छाती में धर्म का धुँआ भरकर देश की हत्या करें
प्रधानमंत्री बनें

इच्छुक अभ्यर्थी हत्या-पुरस्कार के लिए
निःशुल्क आवेदन करें और आश्वस्त रहें

पुरस्कार-निर्णय की प्रक्रिया में
बरती जाएगी पूरी लोकतांत्रिकता ।

2.देश के बारे में शुभ-शुभ सोचते हुए
अभी हमें देखना है कि
पहाड़ों के शीर्ष से
खून के बड़े-बड़े फव्वारे छूटेंगें
बड़े व्यापारी और राजा
तर होकर नहायेंगें उसमें
पहाड़ों के कुण्ड में जमा खून
हमारा , आपका , इसका और उसका होगा

अभी हम देखेंगें कि
दूसरी बस्ती की
गर्भवती महिलाओं के पेट से
तलवारों के नाखूनों से खींचकर बाहर
पँचमासी बच्चे का सिर काट दिया जाएगा
और इस तरह से धर्म की साख बचा ली जाएगी

अभी हम देखेंगें कि
बहुत काली अंधेरी रात के बाद
एक खूँखार भोर का पूरब
विधर्मियों के रक्त से गाढ़ा लाल होगा
धीरे-धीरे और चमकदार होती हुई तलवारें
खनकते स्वरों में गाएंगीं प्रार्थना –
सर्वे भवन्तु सुखिनः
वसुधैव कुटुम्बकम

अभी सौहार्द और अधिकारों की बातें करने वाली जीभ को
एक काँटे में फँसाकर लटकाया जाएगा
जब तक कि पूरी जीभ
आहार नली से फड़फड़ाते हुए बाहर नहीं आ जाती
( इस पर सत्तापक्ष के लोग ताली बजायेंगें )

अभी राज्य का प्रचण्ड हत्यारा
ससम्मान न्यायाधीश नियुक्त होगा
अभी राज्य के कुख्यात चोरों के हाथों
सौंप दिया जाएगा
देश का वित्त मंत्रालय

अभी देश की जनता
देवताओं से रक्षा के लिए
असुरों के पाँव पर गिरकर गिड़गिड़ायेगी

विधर्मियों का गोश्त प्रसाद में बँटेगा
भेड़िये अपने नाखून गिरवी रखकर नियामकों के पास
चले जाएँगें अनन्त गुफा की ओर सिर झुकाए
असंख्य हत्याकांडों का पुण्य घोषित होना बचा हुआ है अभी

अभी इस देश ने
अपने भाग्य और इतिहास के
सबसे बुरे दिन नहीं देखे हैं ।

3. मृत्यु की भूमिका के कुछ शब्द
परिवार के सीने पर पहाड़ रखकर
गर मर जाऊँ साथी
तो जलाना मत
दफ़नाना मत
बहाना मत
फेंक देना किसी बीहड़ में निचाट नंगा मुझे

कौन जाने किस जंगल का हाथ काटा जाये
मुझे राख और धुँआ बनाने के क्रम में
कि जो डाल मेरी चिता के साथ जल रही हो
वह किसी कठफोड़वा का घर उजाड़ कर लायी गयी हो
या फिर उस डाल पर हर रोज
सुस्ताने आता हो कोई शकरखोरा जोड़ा
और एक दिन उदास वापस लौट जाए
हमेशा-हमेशा के लिए

यह कितना पीड़ादायक होगा

चूँकि मैंने इस धरती पर तनिक भी जमीन नहीं जन्मा
तो लाठे भर जगह लेने का कोई अधिकार नहीं बनता मेरा
सड़ी हुई लाश बनकर बह भी गया तो
किसी हिरण या हाथी के पेट मे समा जाऊँगा
प्यास में मृत्यु बनकर

और यह वह अपराध होगा
जिसके लिए
किसी मरे हुए इंसान को भी फाँसी की सजा दी जानी चाहिए

तुम मेरी मिट्टी को उठाना
और फेंक देना किसी दूर मैदान में
कुछ गिद्धों और कौवों का निवाला हो जाने देना
इसतरह मुझे सुकून से मरने में मदद मिलेगी
अच्छा लगेगा किसी का स्वाद होकर

बस इसी स्वाद के लिए साथी
गर मैं मर जाऊँ
तो जलाना मत
दफ़नाना मत
बहाना मत
फेंक देना किसी बीहड़ में निचाट नंगा मुझे ।


4. सपने
विशाल तोप की पीठ पर चित लेटकर
दंगों के के बीच तलवार ओढ़कर सोते हुए
मणिकर्णिका पर जलाते हुए अपने जवान भाई की लाश
उठते , बैठते , जागते , दौड़ते हुए
हममें से हर किसी को सपने देखने ही चाहिए
सपने , राख होती इस दुनियाँ की आखिरी उम्मीद हैं

सपने देखने चाहिए लड़कियों को –

सभ्यता के बचपने उम्र
आत्मा के पूरबी उजास में गुम लड़कियों ने
जरा कम देखे सपने
नतीजन , धकेल दी गईं चूल्हे चौके के तहखाने
गले में बाँध दिया गया परिवार का पगहा
भोग ली गईं थाली में पड़ी अतिरिक्त चटनी की तरह
गिन ली गईं दशमलव के बाद की संख्याओं जैसीं
मगर अब
जब लड़कियाँ भर भर आँख
देख रही हैं बहुरंगी सपने
तो ऐसे कि
दौड़कर लड़खड़ाते कदम चढ़ रही हैं मेट्रो
लौट रही हैं ऑफिस से
धकियाते , अपनी जगह बनाते भीड़ में
ऐसे कि लड़कियों का एक जत्था
विश्वविद्यालयों के गेट पर हवा में लहराते दुपट्टा
अपना वाजिब हिस्सा माँग रहा है
ऐसे कि
पिता को फोन पर कह दी हैं वो बात
जिसे वे पत्र में लिखकर कई दफा
जला चुकी हैं कई उम्र
जिसमें प्रेमी को पति बनाने का जिक्र आया था अभिधा में

सपने हमें नयी दुनियाँ रचने का हौसला देते हैं
हममें से हर किसी को सपने देखने ही चाहिए

सपने देखने चाहिए आदिवासियों को –
देखने चाहिए कि
उनके जंगल की जाँघ चिचोरने आया बुल्डोजरी भूत का शरीर
जहर बुझी तीर की वार से नीला पड़ गया है
देखने चाहिए कि
उनकी बेटियाँ बाजार गयी हैं लकड़ियाँ बेचने
और बाजार ने उन्हें बेच नहीं दिया है
और यह भी कि
मीडिया , गाय को भूल
कैमरा लेकर पहुँच गया है उनके रसोईघरों में
और घेर लिया है सरकार को भूख के मुद्दे पर

सपने हमें हमारा हक दें या न दें
हक के लिए लड़ने का माद्दा जरूर देते हैं

सपने देखने चाहिए उन प्रेमियों को –
जो आज अपनी प्रेमिकाओं से आखिरी बार मिल रहे हैं
आज के बाद ये प्रेमी
रो-रोकर अपना गला सुजा लेंगें
जिससे साँस लेना भी दुष्कर हो जायेगा
आज के बाद ये प्रेमी
बिलख- बिलखकर पागल हो जायेंगें
और आस-पास के जिलों में
युध्द के गीत गाते फिरेंगें
इन प्रेमियों को भी सपने देखने चाहिए
सपने भी ऐसे कि
ये प्रेमी लड़के डूबने उतरते ही तालाब में
कोई हंस हो गए हों
और बहुत पुरानी तालाब की गाढ़ी काई को चीरते हुए
बढ़ रहे हों दूसरे घाट की तरफ
कि वहाँ इनका इन्तजार किसी और को भी है
इन प्रेमियों को सपने देखने चाहिए ऐसे कि –
इनके समर्पण की कथाएँ
जा पहुँची हैं दूर देश
और यूनान का कोई देवता
इनसे हाथ मिलाने के लिए बेताब है

सपने हमें पागल होने से बचा लेते हैं

एक सामूहिक सपना देखना चाहिए इस देश को –

यह देश जो भाले की तरह चन्दन को माथे पर सजाए
विधर्मियों की लाशों पर
भारतमाता का झण्डा गाड़ते हुए
आगे बढ़ने के भ्रम में
किसी जंगली दलदल में फँसा जा रहा है

या जब धर्म चरस की तरह चढ़ रहा है मस्तिष्क पर
और छींक में आ रहा है विकलांग राष्ट्रवाद
तो ऐसे में
सपने देखना इस देश की जवान पीढ़ी की जिम्मेदारी हो जाती है

एक सपना बनता है कि
तुम भी जियो
हम भी जियें
एक ही मटके से पियें
मगर भ्रष्ट करने के आरोप में
किसी का गला न काट लिया जाये

एक सपना बनता है कि
तुम अपने मस्जिद से निकलो
मैं निकलता हूँ अपने मन्दिर से
दोनों चलते हैं किसी नदी के एकांत
और बैठकर गाते हों कोई लोकगीत
जिसमें हमारी पत्नियां गले भेंट गाती हों गारी

सपने देश को रचने में हिस्सेदारी देते हैं भरपूर

और अब
यह समय जो धूर्त है
इसमें
राजा गिरे हुए मस्जिद की गाद पर बैठकर
सत्ता में बने रहने का सपना देख रहा है
उल्लू देख रहे हैं सपने
सालों साल लम्बी अँधेरी रात का
दुनियाँ को खरगोश भरा जंगल हो जाने का सपना
भेड़िए…

5. तलवारों का शोकगीत
कलिंग की तलवारें
स्पार्टन तलवारों के गले लगकर
खूब रोयीं इक रोज फफक फफक

रोयीं तलवारें कि उन्होंने मृत्यु भेंट दिया
कितने ही शानदार जवान लड़को के
रेशेदार चिकने गर्दनों पर नंगी दौड़कर
और उनकी प्रेमिकाएँ
बाजुओं पर बाँधें
वादों का काला कपड़ा
पूजती रह गयीं अपना अपना प्रेम
चूमती रह गयीं बेतहाशा
कटे गर्दन के होंठ

तलवारों ने याद किये अपने अपने पाप
भीतर तक भर गयीं
मृत्यु- बोध से जन्मी जीवन पीड़ा से

तलवारों ने याद किया
कैसे उस वीर योद्धा के सीने से खून
धुले हुए सिन्दूर की तरह से बह निकला था छलक छलक
और योद्धा की आँखों में दौड़ गयी थी
कोई सात आठ साल की खुश
बाँह फैलाये , दौड़ती पास आती हुई लड़की

कलिंग और स्पार्टन तलवारों ने
विनाश की यन्त्रणा लिए
याद किया सिसकते हुए
यदि घृणा , बदले और लोभ से भरे हाथ
उन्हें हथेली पर जबरन न उठाते तो
वे कभी भी अनिष्ट के लिए
उत्तरदायी न रही होतीं

दोनों तलवारों ने सांत्वना के स्वर में
एक दूसरे को ढाँढस बँधाया –
तलवारें लोहे की होती हैं
तलवारें बोल नहीं सकतीं
तलवारें खुद लड़ नहीं सकतीं ।

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3 Responses

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