विजय राही की 5 कविताएं

विजय राही

ग्राम-पोस्ट-बिलौना कला

तहसील-लालसोट

जिला-दौसा(राजस्थान)

पिनकोड-303503

पेशे से सरकारी शिक्षक है।

कुछ कविताएँ हंस,  मधुमती, दैनिक भास्कर,  राजस्थान पत्रिका, डेली न्यूज, राष्ट्रदूत में छपी।

सम्मान-दैनिक भास्कर का युवा प्रतिभा खोज प्रोत्साहन पुरस्कार -2018

क़लमकार मंच का राष्ट्रीय कविता पुरस्कार(द्वितीय)-2019

मो.नं.-9929475744

Email-vjbilona532@gmail.com

  1. रोना

 

बड़े-बुजुर्ग कहते हैं

मर्द का रोना अच्छा नही

अस्ल वज़ह क्या है

मैं कभी नही जान पाया

मगर मैं ख़ूब रोने वाला आदमी हूँ।

 

माँ कहती है

मैं बचपन में भी ख़ूब रोता था

कई बार मुझे रोता देख

माँ को पीट दिया करते थे पिता

इसका मुझे आज तक गहरा दु:ख है।

 

मुझे याद है धुँधला-सा

एक बार मट्ठे के लिए मुझे रोता देख 

पिता ने छाछ बिलोती माँ को दे मारी थी

पत्थर के चकले से पीठ पर

चकले के टूटकर हो गये दो-टूक

आज भी बादल छाने पर दर्द करती है माँ की पीठ।

 

पाँचवी क्लास में कबीर को पढ़कर

रोता था मैं ड़ागले पर बैठकर

‘रहना नही देस बिराना है’

काकी-ताई ने समझाया…

‘अभी से मन को कच्चा मत कर,

अभी तो धरती की गोद में से उगा है बेटा !’

 

ऐसे ही रोया था एक बार 

अणाचूक ही रात में सपने से जागकर

पूरे घर को उठा लिया सर पर

सपने में मर गई थी मेरी छोटी बहिन

नीम के पेड़ से गिरकर

मेरा रोना तब तक जारी रहा 

जब तक छुटकी को जगाकर 

मेरे सामने नहीं लाया गया

 

उसी छुटकी को विदा कर ससुराल

रोया था अकेले में पिछले साल।

 

घर-परिवार में जब कभी होती लड़ाई

शुरू हो जाता मेरा रोना-चीखना 

मुझे साधु-संतों,फक़ीरों को दिखवाया गया

बताया गया 

‘मेरे मार्फ़त रोती है मेरे पुरखों की पवित्र आत्माएँ

उन्हें बहुत कष्ट होता है

जब हम आपस में लड़ते हैं।’

 

नौकरी लगी, तब भी फ़फक कर रो पड़ा था

रिजल्ट देखते हुए कम्प्यूटर की दुकान पर

 

मैं रोता था बच्चों, नौजवानों, बूढ़ो, औरतों की दुर्दशा देखकर। 

मैं रोता था अखबारों में जंगल कटने, नदियां मिटने,पहाड़ सिमटने जैसी भयानक ख़बरें पढ़कर ।

मैं रोता था टी.वी, रेड़ियो पर

युद्ध,हिंसा,लूटमार,हत्या,बलात्कार के बारे में सुनकर,

देखने का तो कलेजा है ही नहीं मेरा।

 

माँ कहती है –

‘यह दुनिया सिर्फ़ रोने की जगह रह गई है।’

 

मैं अब भी रोता हूँ

मगर बदलाव आ गया मेरे रोने में

मैं अब खुलकर नहीं रोता 

रात-रात भर नहीं सोता

थका-सा दिखता हूँ

मैं अब कविता लिखता हूँ।

 

  1. आँधी

 

आँधी जब आती है

बदल जाता है धरती-आसमान का रंग

बदल जाता है पेड़-पौधों और मनुष्यों का रूप

चला जाता है सबके चेहरों का नूर

शरीर के साथ आत्मा तक पर

ज़मा हो जाती है ढेर सारी धूल 

 

आँधी जब भी आती है 

कर देती है बहुत कुछ इधर का उधर

 

आँधी में चला जाता है अनवर का कोट राधा के आँगन में

फिर वहीं फँस कर रह जाता है दीवार पर लगे तारों में।

 

आँधी में ही चला जाता है मोहन का रूमाल 

शबीना की छत पर

और उलझ जाता है बुरी तरह टीवी के एंटीने में।

 

आँधी में चला जाता है कवि का मन

कहीं दूर बसे अपने प्रिय के पास 

और वहीं ठहर जाता है

आँधी के थम जाने तक ।

जब वह वापस आता है 

तब उसके साथ होती है कविता।

 

कविताएँ कवि-मन में चलने वाली आँधी की बेटियाँ है।

 

 

 

  1. प्रेम बहुत मासूम होता है

 

प्रेम बहुत मासूम होता है

यह होता है बिल्कुल उस बच्चे की तरह

टूटा है जिसका दूध का एक दाँत अभी-अभी

और माँ ने कहा है 

कि जा ! गाड़ दे, दूब में इसे 

उग आये जिससे ये फिर से और अधिक धवल होकर 

और वह चल पडता है 

ख़ून से सना दाँत हाथ में लेकर खेतों की ओर 

 

प्रेम बहुत भोला होता है

यह होता है मेले में खोई उस बच्ची की तरह

जो चल देती है चुपचाप

किसी भी साधु के पीछे-पीछे

जिसने कभी नहीं देखा उसके माँ-बाप को

 

कभी-कभी मिटना भी पड़ता है प्रेम को

सिर्फ़ यह साबित करने के लिए

कि उसका भी दुनिया में अस्तित्व है

 

लेकिन प्रेम कभी नहीं मिटता

वह टिमटिमाता रहता है आकाश में

भोर के तारे की तरह

जिसके उगते ही उठ जाती है गांवों में औरतें

और लग जाती हैं पीसने चक्की

बुजुर्ग करने लग जाते हैं स्नान-ध्यान

और बच्चे मांगने लग जाते है रोटियां

कापी-किताब, पेन्सिल और टॉफियां

 

प्रेम कभी नहीं मरता

वह आ जाता है फिर से

दादी की कहानी में

माँ की लोरी में ,

पिता की थपकी में

बहन की झिड़की में

वह आ जाता है पड़ोस की ख़िड़की में

और चमकता है हर रात आकर चाँद की तरह…

 

 

  1. एक ऐसे समय में

 

एक ऐसे समय में 

जब आपकी आँखों के सामने

नन्हें फूल मसल दिए जाएं

हरी-भरी घास टैंकों द्वारा कुचल दिया जाएं

परिन्दों के पर काट दिए जाएं

 

न्यायदाता जब स्वयं अन्याय के कीर्तिमान रचने में लगे हो

बात-बात पर देश का राजा छप्पन इंच का सीना दिखाकर आपको चुप करा दे

 

जब इतिहास के साथ-साथ देशभक्ति की परिभाषा बदल दी गई है

छोटे-मोटे नगरों की तो ख़ैर क्या बिसात,जब काशी-इलाहाबाद बदल दिया गया है

 

जब किसानों-आदिवासियों को अपनी ज़मीन से बेदख़ल कर दिया जाए

अपना हक़ माँगने वालों को एनकाउंटर के नाम पर भून दिया जाए

औरतों पर होने वाले जुर्म के लिए औरतों को ही ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाए

 

गर ऐसे भयानक समय में भी 

आप कुछ नहीं कर रहे हैं,

और सिर्फ़ दूर खड़े होकर

दुष्टों की दुष्टता का तांडव देख रहे हैं

तो मैं बस यही कहूंगा

आपको अपने मनुष्य होने पर

सोचने की ज़रूरत है…

 

 

  1. एक-दूसरे के हिस्से का प्यार

 

एक समय था

जब दोनों का सब साझा था

सुख,दुःख, 

हँसना,रोना,

नींद,सपने

या कोई भी ऐसी-वैसी बात।

 

कुछ चीज़ें ऐसी भी थीं-

जो बेमतलबी लग सकती हैं

जैसे साबुन, स्प्रे, तौलिया

कभी-कभी शॉल भी ।

 

शरारतें, शिकायतें,

ये तो साझा होनी ही थी।

 

कार, मोबाइल,

फेसबुक, व्हाट्सएप

जैसी कई चीजें 

बड़ी भी, छोटी भी 

यहाँ तक कि रोटी भी।

 

अब नहीं रहा

तो कुछ नहीं रहा

सिवाय उस पाँच वर्षीय बच्चे के

जिसे करते हैं दोनों 

एक-दूसरे के हिस्से का भी प्यार।

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