विजय ‘आरोहण’ की नौ कविताएं

सारंडा, जंगल और आदिवासी,जल, जंगम और प्रतिरोध की कवितायें

1. हमारे पहाड़ों के बच्चे

हमारे पहाड़ों के बच्चे
गिल्ली-डंडा खेलते है
वह छुप्पम-छुपाई खेलते
शाल के पेड़ों के पीछे छिप जाते हैं

वह तीर-धनुषों से निशाना साध रहे हैं
इसके लिए वह एक बिजुका बनाते हैं
और दनदनाती आती है
एक गोली
एक बच्चे के सीने को चीरती हुई
आर-पार कर जाती है
और बच्चा वहीं धड़ाम से गिर जाता है ।

यह उन बच्चों के लिए
कोई नयी बात नहीं
और न ही कोई कोहराम मचाता है
एक बच्चे के मर जाने से ।

बच्चों को भी मशक्कत नहीं
करनी पडती इस खेल में
बच्चे तो तालियाँ ही बजाते
जब यहाँ के पहाड़ों में
आये दिन धमाके होते हैं ।

यह करतब बदस्तूर चलता रहता है
इस खेल में कोई मरता है
तो कोई जीता है
यह इन पहाड़ों पर कोई
हार जीत का खेल नहीं
न ही कोई जीत का दावेदार होता है ।

बच्चे सहमे हुए भी नहीं हैं
बच्चे तो इस उलझन में हैं कि
एकदम सटीक निशाना
कौन लगा सकता है

गोली या तीर
या फिर यह निशाना भी चूक जाता है
फिर से एक बिजुका पर निशाना साधने के लिए
एक एक बच्चा तैयार रहता है ।

2. रघुवा मांझी का शोध पत्र 

खेतिहर नहीं है रघुवा मांझी
वह खेती नहीं करता
वह दूसरों के खेतों में काम करता है
लेकिन वह किसान नहीं है ।

वह एक मजदूर है
अब उसे खेतों में भी काम नहीं मिलता
अब वह ईट गारों में गरदन तक धँसा रहता है
उसने अपनी कुदाल को टाँग दिया है
अपने घर के
कोहबर लिपे दिवालों पर।

आजकल वह दिवालों पर साहूल टाँग रहा है
और करनी से लपेस रहा है
बिडला सीमेंट का प्लास्टर
अब वह दूसरों का घर बनाता है
कभी-कभी वह बेशकिमती फर्नीचर भी बना लेता है।

कहने को तो अनपढ़ है रघुवा मांझी
लेकिन जहाँ भूख से मरने का सवाल हो
वह कोई न कोई रास्ता निकाल लेता जीने का।

बात सिर्फ भूख, काम और
कामों के उपर उस्तादी की नहीं है
बात सिर्फ यह भी नहीं है कि
दो वक्त की भूख के लिए काम जुटाया जाय
बात यह भर है कि
उसकी भूख को सिर्फ
उसके घर के दीवारों पर न चिपकाया जाय ।

वह हरेक वक़्त इस जुगत में लगा रहता है
कि उसे और उसकी प्रजाति को
कोई विलुप्त प्राय जीवाश्म घोषित न कर दिया जाय

रघुवा मांझी आदिवासी है
वह बात नहीं करता
किसी भी सामुदायिक अस्तित्व की
वह तलाश करता है
अपने जैसे मौसमी मजदूरों को
बचाये रखने के विकल्पों की ।

आज जब बड़े और दैत्याकार सरीसृप
अनुकूलित होकर गिरगिट बन गए है
और तिलचट्टे करोड़ों सालों से
विलुप्त प्राय होने से बचे हुए हैं

रघुवा मांझी
लाखों इंसानों में
इंसानों की भूख और दानों पर
इंसानों की उत्तरजीविता
की उम्मीदों को जगाता है ।

वह डार्विन के विकासवाद सिद्धांतों पर
शोध में लगा हुआ है ।

वह बेहद बैचेन है
जैसे उसे संदेह है
कि कहीं न कही
पूरी की पूरी दुनिया के लोग
उत्तरजीविता के संकल्पनाओं के सच होने के
भ्रम में ही अभी तक जी रहे हैं ।

3. सोमरा टूडु का प्रेम

मैंं नहीं जानता कि सोमरा टूडु को
प्रेम का मतलब भी पता था
लेकिन उसे उन सुनी- सुनाई बातों पर पूरा यकीन था
कि बरसों पहले
सारंडा जंगल की पहाड़ियों के दूसरे छोर पर
नेतरहाट की ऊँची पहाड़ी से
एक अंग्रेजन अपने आदिवासी प्रेमी का
इंतजार करते करते कूद गयी थी ।

सोमरा टुडु तो अल्हड़ था
पूरा का पूरा सांरडा जंगल उसका घर था
वह बहुत सुरीली बाँसुरी बजाता
और सुरों के हिसाब से
मोटा और पतला, अलग-अलग तरह की बाँसुरियों को अपनी कमर में बांधे रखता  ।

रोजलिन केरकेट्टा तो मुग्ध थी
उसकी बाँसुरी की तानों पर
और जब वह नाचती
पेरवाघाघ झरना भी झर्रझर्राता
अपने पूरे उफान पर
एक दिन जब उसने उपहार स्वरुप
सोमरा को वनफूल दिया
सोमरा उठा लाया था उसे अपने घर

एक दिन अपने सातवें बच्चे को जन्म देते समय
रोजलिन उसे हमेशा के लिए छोड़ गयी
उस दिन सोमरा बिल्कुल भी रोया नहीं
वह तो अल्हड़ था
लेकिन पहाड़ी के लोग कहते है
उस दिन वह सुबह से शाम तक बजाता रहा अपनी बाँसुरी
उस दिन बाँसुरी की धुन कुछ अधिक ही मधुर हो उठी थी
और सिमडेगा के भौंरा पहाड़ी से
असंख्य मधुमक्खियाँ निकलकर पूरे सारंडा में फैल गई ।
उस दिन सूर्यास्त का रंग भी
नेतरहाट की पहाड़ियों में होने वाले सूर्यास्त के रंगों की ही तरह लाल था ।
वह भी बाँसुरी की उँची-नीची तानों में कोई
आदिवासी विरह गीत गा रहा था ।

4.  कलमी अब नहीं नाचेगी करम
कलमी अब नहीं
नाचेगी करम
कैसे नाचेगी वह
पहाड़- परबत
नदियाँ-झरने और पंछियाँ नहीं
गुनगुनानयेंगे करम गीत ।
मेंजूर भी अब नहीं
फैलायेगें अपने पंखों को
और सिमडेगा के
भौंरा पहाड़ में भी अब नहीं लगेंगे
मधुमक्खियों के छते,
भौंरे भी अब नहीं
गाएंगे भ्रमर संगीत ।

कलमी अब नहीं
नाचेगी करम
कैसे नाचेगी वह ?
जब करम पेड़ों में
हरयाली लौट आयेगी
तो क्या लौट आयेगी
उसकी अपनी सहेेलियां
दिल्ली गई थी
यह कह कर
कि हम घूर आयेंगे
थोड़ी हँसी भी अपने साथ लायेंगे
कुछ पैसे कमा कर
और हम साथ-साथ
सरहुल भी मनायेंगे ।
पलाश भी फूटा
पुटूश भी हो गया है नारंगी
और महुआ का सुगन्ध भी
समस्त जंगलों में फैल गया है ।

प्रकृति सहज है सरल है
वह तो हँसेगी ही,
प्रकृति तरल है कमल है
वह तो खिलेगी ही ।
प्रकृति भ्रमित करती है कलमी को
लेकिन कलमी को नहीं है कोई भरम
यह सोचकर
कि अब तक शेष बचा होगा
उनका आदि धरम ?
कलमी कहती है
उनके बिना कैसे नाचेंगे हम
क्या हमें नहीं आयेगी
कोई शरम ?

बानो और पोकला टेशन से
गाड़ी तो रोज खुलती है
जाती है जो दिल्ली ।
लेकिन कभी वापस नहीं
आती, कोई सांवली
और यदि कोई लौट आए
अपने गांव
तो भी क्या वह बन पायेगी
कभी किसी की घरवाली
कोई सहेली ?
नहीं आयी संगी-सहेलियाँ
खेलेगी वह कैसे अठखेलियाँ ?
किसे बुझायेगी वह
प्रकृति की गूढ़ पहेलियाँ ?

जंगल सहज है सरल है
वह मातम नहीं मनाता है
वह हरेक समय उत्सव मनाता है ।
दुख में भी और सुख में भी ।
जंगल में मांदर तो बजेंगे ही
पूरी तीव्रता से ।
झूमर और करम गीत भी गाए जायेंगे
पूरी उन्मुक्तता से ।
भले ही बांस के टुप्पों में
धान और गेहूं के बीज अंकुआयेंगे ।
लेकिन कलमी के पैर अब नहीं थिरकेंगे ।

गोरखपुर और बनारस के
मिट्टी तो पक ही जाएंगे,
ईटों के रंग भी लाल उभर आएंगे
ईटों की गरम भठ्ठियों पर ।
उनके घर वालों के
भूखे पेट तो जरुर बिलबिलायेंगे
मिट्टी के बादामी चूल्हों पर ।
भले ही कलमी के पैर
रह जाएंगे खाली
चढ़ भी नहीं पाएगी
उसके पैरो में
अलते की लाली,
भले ही नाचने की
अकुलाहट में उसके पैर
तप कर हो जाएंगे गरम ।
अब वह बांध लेगी अपने
पैरों को करम डहरों से,
डर गयी है कलमी भी बड़े शहरो से
और अपने अश्रुओं से
शंख नदी के चमकीले-रंगीन
पत्थरों(अपने कठोर हृदय) को
कर लेगी नरम ।
लेकिन कलमी अब भी नहीं नाचेगी करम ।
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*** करम: झारखण्ड के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाने एक पारम्परिक और प्राकृतिक पर्व,
*** मेंजूर: मयूर ।
*** सरहुल: पारम्परिक प्रकृति पर्व ।
*** पलाश: ढाक के पेड़ ।
*** पुटूश: झारखण्ड के जंगलो में बहुतायत में पाया जाने वाला एक प्रकार का जंगली झाड़, सालों भर फूलों से अच्छादित रहता है ।
*** डहर: पेडों की टहनीयाँ ।
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5. सारंडा जंगल के सात सौ पहाड़
सारंडा जंगल के सात सौ पहाड़
महज पहाड़ नहीं
असंख्य जिंदगियों के प्राकृतिक अधिवास हैं
जहाँ जल है
जंगल है
खनिज संसाधन है
और आदिम संतान सारंडा के ।
आदिमों के बच्चे अभी शैशवास्था में हैं
वह अभी बाघिनों के दूध पी रहे हैं
भीमकाय हाथियों से लड़ना सीख रहे हैं
और लौह अयस्कों के लाल कंदराओं में सो रहे हैं
उनके नाखून इस्पातों से कठोर और नुकीले हो रहे हैं

इसलिए अभी बहुत देर नहीं हुई है
अपने बढ़ते कदमों को वापस खींच लों
अपनी ललचाई नजरों को झुका लो
तुम्हारे बिषैलें पंजे
बेअसर हो जाएंगे
लहूलुहान हो जाएंगे तुम्हारे कंधे
इस्पातों के नुकीले नाखूनों से ।

6.  बिसात
देखना एक दिन वे आएंगे
घरेंगे वे हमें
हमारे चारों तरफ जाल बिछायेंगे
अपने फंदे कसना चाहेंगे।
शकुनी की तरह अपनी बिसात बिछायेंगे
और चाहेंगे हमें करना चारों खाने चित
हमारे आंगन में बैठेंगे वह
हमारे संग महुआ का रस पीयेगे
हमसे वह हमारे ही जंगलों को काटने को कहेंगे
हमारे जंगलों में हमसे ही आग लगवाना चाहेंगे
और इन अग्निवेदियों पर हमारे ही चट्टानों से लोहा गलाएंगेे , लौहे के छर्रे हम पर ही बरसायेगें।
ऐसे में कहो तो, क्या हम कहीं भाग भी पायेंगे
हमें वह धन का भी लालच देंगे
और देंगे नोटों से भरा सूटकेश
हमारे सिर पर राजमुकूट भी पहनायेगें
पदवी देगें हमें “आदिवासी गुरु” का
और हमारे सम्प्रभु सत्ता को काबिज करना चाहेंगे।
हमारे घरों में घुसेंगे वह
हमारी माटी की दीवारों में भी चिपकेगें वह
और हमारे ज्यामितीय भित्ति चित्रों के
शाश्वत रंगों मे अपने कूचियाँ डूबोयेंगे
और अपने कैनवास में हमें
लुप्तप्राय घोषित करना चाहेंगे।
हमें सजग रहना पड़ेगा
सचेत रहना होगा
बिरसा के तीरों को बिष में डूबो कर
रक्षा करनी होगी स्वयं की।
घर के औरतों से कह दो
तैयार रहे वह कानों और जूडों में धान बालियाँ खोंसकर,
कि इस बार हम जनीं शिकार करेंगे।
नहीं पहुंच पायें वह जंगलों के अंतिम पंक्ति तक
हम चित कर देंगे उन्हें,अग्रिम पंक्ति में हीं
ऐसा ही जतन सुनिश्चित करना होगा हमें।
प्रेषित कर दो यह संदेश भोगनाडीह सिद्धौ और कानू तक।
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*** जनी शिकार: झारखण्ड के आदिवासी क्षेत्रों में शिकार की एक परम्परागत उत्सव जिसमें आदिवासी औरतें मर्दाना रुप धारण कर छोटे-छोटे   जानवरों का शिकार करती है। हालाँकि अब जंगली जीवों का शिकार संरक्षण के दृष्टि से सांकेतिक रुप से ही किया जाता है

7. यहाँ जंगलों में सबकुछ लाल है
यहाँ जंगलों में
सबकुछ लाल है,
पलाश लाल है ।
खिलते-नवजात
कुसुम के पते लाल हैं ।
गर्मियों में झुलसते जंगल
लाल जलते हैं दावानल ।
बारुदों के रंग लाल हैं,
पहाड़ों से बहते खून भी लाल है,

यहाँ जंगलों में
सबकुछ लाल है
लाल बजरियाँ
लाल गुलाल हैं ।
यहाँ नहीं है लाल गुलाब
और न ही गुलहड़ लाल,
पुटूश का रंग भी है चटख लाल ।
जंगलों में हंसते चेहरे
आँखे सुर्ख लाल हैं ।

यहाँ जंगलो में
सबकुछ लाल है
लौहे और बाक्साइटों के
अयस्कों का रंग लाल है
भूख और पीड़ाओं के
मूक सवाल भी लाल है ।

यहाँ जगलों में
सबकुछ लाल ही लाल है
अभेद्य जंगलों में छनकर आती
रोशनियों के रंग भी लाल हैं ।
जंगल की किताबों का रंग
अभी तक लाल है ।
खिलाफत में उठ रहीं
संभावित हाथों की मशालों का
रंग भी लाल है ।

यहाँ जंगलों में
सबकुछ लाल है ।

8. आह्वान 

हम तालियों की गड़गड़ाहटों के बीच
मंच के बहुत नजदीक थे
उन्होनें माइक्रोफोन थामी
और हुंकार भरी,
संबोधित किया “आदिवासी”
जंगलों ने भी सुनने से मना कर दिया
उस कर्कश आवाज को ।
उन्हें मालूम नहीं था कि
हम भी नगाड़े बजा सकते है
मादंर के थापों पर नाच सकते है
और गगन भेदी दहाड़ भी लगा सकते है
इतने पर ही
पहाड़- परबत और नदी
झूमर गा सकते हैं
और करम की थिरकन पर
जंगलों से लेकर राजभवन तक
विशाल, भव्य और मनमोहक रैलियाँ निकाल सकते हैं
9.अब हमें हमारे नाम से ही पुकारो 
कोई उसे करियठ्ठा-कोल
कह कर पुकारा,
उसने उठायी लाठी
फोड़ दिया उसका सर
बिलबिला गया वह गुस्से से,
उसने कहा मेरा नाम सगुना मुंड़ा है,
तुम हमें क्यों पुकारते हो करियठ्ठा
अनपढ़ समझकर ही
हमें तुम पुकारते हो कोल,
उड़ाते हो उपहास
अब हम नहीं सहेंगे
तुम्हारी नस्लभेदी रंगभेदी और
जाति सूचक फब्तियों को ।
सिर्फ नाक-नख्स और
रंग ही क्यों ?
तुम देख सकते हो
हमारे उँचें कपाल भी,
नहीं रहे हम अब अनपढ़
अब हमें हमारे नाम से ही पुकारो
सगुना मुंड़ा नाम है हमारा
एक गौरवशाली इतिहास है हमारा ।
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