विजेंद्र की 6 कविताएं

विजेंद्र

एक

तुम्हें बाहर आना ही होगा

कहां मिलेगा उस आदमी का उजला ब्यौरा 
जिसे काले पत्थरों में चुन दिया गया है
उन्हें करीब से देखो 
समुद्र की तूफानी लहरों का गरजन
तुम्हें सुनाई देगा

श्रमिकों और किसानों का एकजुट संघर्ष
लोकतंत्र की पहली जरूरत है
दबे कुचले लोगों की यातनामय घनी पीड़ा 
घुटते विवश लोगों का बे-आबाज 
रुदन…ओह…
कितना भयावह समय है
इस क्रूर दुनिया को बदलने के लिए 
धरती की जड़ों तक जाना होगा 
कैसे जानूं उसका दबा चेहरा मलबे में 
जो जीवन भर दास बना रहा
स्मारकों के खंडहरों में लहलहाते दूब-तिनके बोलेंगे
उसने मुक्त होने को लपट जरूर झेली होगी
उसकी हड्डियों को गला दिया गया
ओह! जीवन ही उसे मृत्यु है 
जो जगते ही अधसिकी बासी रोटी को तरसते हैं 
उनका दफनाया हुआ ब्यौरा कहां है 
मक्कार,नकाबपोश , रक्तपायी हत्यारों के जुल्म 
मुझ से क्यों छिपाए गये हैं 
बादलों की दिल दहलाती तड़क में 
हाथों पर धरती उठाने वालो का
रूप पहचानो
करोड़ों करोड़ संघर्षरत श्रमिकों का भैरव राग 
दरकती चट्टानों मे सुनो ,सुनो
कठोर जीवन से थक कर
निराश हुए आदमी में खौलता लावा
कविता में मुखर होने दो
दूब-तिनकों के छोर पर ओस की बूंदें
तुम्हारा सारा प्यार….और सौन्दर्य
जैसे रगों में सिमट आया हो 
पुराने खंडहरों में मूसलाधार वर्षा ने
मुझे पेड़ों के करीब जाने से रोका
जब जीवन स्याह पत्थर लगने लगे
मुझे उसके अछूते रबों में जाने दो
जहां हिरमिची काई और सफेद फफूंद छुटाना शेष है
बासी रोटी का आधा हिस्सा
मेरा कच्चा पूर्वार्ध ,आधा अनसिका उत्तरार्ध 
मैं जहा ठहरा
गरजन -तरजन के साथ वहां कौध भी थी
जो जुती धरती में समा गई 
वर्तमान के दोआबी सीने से फूटा
भविष्य का सुर्ख कल्ला दिखाई दिया
लाखों लोगों की आंखों में आंसू छलकने के
एहसास की तिरछी लपट
क्या तुमने कभी देखी है 
ओह तलवों में छिदते शूल
-क्षणों में 
पठारी सुनसान को फूलों के लिए
चीखते सुना है
ओ मेरे पस्तहिम्मत कवि
सारी दुनिया को कंपा देने वाली लड़ाकू जनता
का उत्तेजित चेहरा 
मुझे भारतीय हलधर में देखने दो
जो बेफिक्र भव्य कमरों में आराम से सोए हैं 
उन्हें श्रमी के खून की हर बूंद का हिसाब देना होगा 
भूख से हूई मौतों का ब्यौरा उन्होंने छद्म चेहरों के पीछे 
छिपाया है बहुत चतुराई से 
मेरे लिए शोक गीत और प्रेम कविता में
कोई फर्क नहीं है 
जनता की मुक्ति के लिए लड़ने वाले योद्धाओ को
जब सूली पर लटकाया गया
दुनिया चुप रही
सिर्फ कवि बोला
वे अपने समय के ज्योति स्तंभ थे
कवियों के महानायक
वे सत्ता की क्रूरताओं के विरुद्ध लड़े
मुंह पर ताला जड़ने वालों को ललकारा
सड़ते अन्न को न बचा पाने वाली आर्थिकी पर
क्या गर्व करूं
मुझे पूछने दो 
संसद में विकास दर की घोषणा
और आत्महत्या करने वाले किसानों में 
क्या रिश्ता है
बटमार मंडियों में अन्न के दाने का
रोता चेहरा क्या तुम्हें दिखता है 
बेहतरीन चीजों से बाजार अटे हैं 
मैं उन पर हाथ रखने को तरसता हूं
भूख से अधिक कुपोषण से मरे हैं बच्चे
ओ कवि मुझे अपना कथ्य बदलने दो
जब कोई उजासित पथ नहीं दिखता 
तो भरोसा कापता है 
इरादे मुरझाते हैं 
कहां हैं वे नम आवाजेें
चट्टानों से फूटी चिनगारियां 
जिन्हें खोजता हुआ मैं
एक दिन सदियों पुराने मलबे से
मेरे शब्द सुनने को

तुम्हें बाहर आना ही होगा 

2.

ओ मेरी कविताओं
तुम उस बेचैनी को त्यागो 
जिसे मैं जीवन भर लपटों की तरह
पचाता आया हूं 
मुझे सीखने दो
कैसे छाया से सार तक पहुचते हैं 
फूल से जड़ तक
मैंने जो देखे पशु,पक्षी ,वृक्ष ,
हवा , रोशनी ,आकाश
बादल , फूल, फल और बिलखती यातनाएं
इन सब में कोई धागा पिरोया सा लगा
इन्हें कैसे तो अपने अमूर्त चित्रों में उकेरूं 
इनका हूबहू चित्र तो कैमरा कैद कर सकता है
चित्र और कविता नहीं 
फिर भी मैं कोशिश करता रहा
विफलताओं को गले लगा कर
हर विफलता ने दिया एक दिन सफल होने ंका एहसास
इसके लिए मुझे पृथ्वी की रगों में बहना होगा
फूल , पत्तियों ,फलों से मुझे 
ऋतु का आभास होने दो 
जिससे मैं अपने भीतर अपनी लड़ती जनता की
धड़कने सुन सकूं
किसी निष्कर्ष –सहमति पर 
हम आयें न आयें
पर आंखें रंगो के पीछे छिपे सत्य को जाने 
ओह! काल तू कितना विकराल है
मेरी निरी भावुकता तेरा सामना नहीं कर सकती
यौवन का ज्वार उतर कर
काले समुद्र की गहराई में समा चुका है
लहरें अपना उफान चट्टानों से टकरा
सदिया बन चुकी हैं अतीत के गर्त में
अब समझा
चमकीले शब्द और पच्चीकारी में नहीं
धूसर चित्रों और सने पुते शब्दों में
दिखेगी आदमी की गहन पीड़ाएं
जब मैं अंदर से उदास होता हूं
तो शब्द आभाहीन होते हैं
हवा मंद
कभी कविता में 
सूर्य उदित होगा पश्चिम में भी
चित्रों की रेखाएं ढलवा और रंग फीके 
देखता हूं उसे भी जो ओझल है
हजारों ऑखों को
गूदड़े लिए लेटा फुटपाथ पर
वह कौन है जिसे बिना देखे लोग गुजरते हैं
ओह ! मध्यम रोशनी में सब संत दिखते हैं
आवारा, दुराचारी और क्रूर
ओह !अब समझा अमूर्तन से
समूर्तन की ओर बढ़ना कितना कठिन है
यह चित्रों में ही कविता का
वास्तु शिल्पीय स्थापत्य 
रचे जाने का नव नवीन विधान है |

3.

तीर्थ राज है मेरा प्यार

चलो हम दोनों खुले में चले
भूरे बादलों में देखने पृथ्वी की काली दरारें
ओ प्रिय , जीवन की कौध को तो सुनो 
सच्चा प्यार हमें तुच्छताओं से मुक्त करता है
हल रोज बाल भी बढ़ते हैं और नाखून भी
हर पल झलकती है समय की चिनगा
पके गेहूं की अन्नमय आभा
जो इन्द्रधनुष पृथ्वी को न छुए
उसका क्या करूंगा 
मैं तुम्हें जितना चाहता हूं
उतना ही निकट आता हूं
जीवन के
उतनी ही धरती लगती है सुन्दर और उर्वर
मेरे हृदय में भी बिम्बित है एक दोआबा 
तीर्थराज है मेरा जीवन
जिसे मैंने सहेजा है सरस्वती की तरह
भीतर के विराट में 
मुझे भरोसा है 
हमारी आशाओं का गुच्छ खिलेगा 
भविष्य के पारिजात पर

4.

समय और चिन्ह

प्यार करते हूए मैंने काल को रचा है
तुम चाहे कितनी ही दूर रहो 
लगता है तुम मेरे बिल्कुल करीब हो
पूछता हूं कुछ
उसका उत्तर है तुम्हारी मधुर मुस्कान
मैं भले ही उड़ न सकूं
पर मेरी कविता के डैने उड़ कर कहीं जा सकते हैं
बिना बुलाए,बिन परिचय के 
जो आके बैठ गया हृदय में
प्यार उसी को नाम दिया है मैंने
तुमको देखा है मैंने फूलों को चुनते 
वे उंगलिया और हैं
जो तपे लोहे को देती हैं बन्दिशें मन चाही 
तुम्हें वे कुरूप लगेंगी 
पर वे रचती हैं श्रम से सौन्दर्य नया
आती है श्रम से धार समय में
प्यार तभी मोहक लगता है
वही क्षणों को आकृति देकर
जीवन के नये नये रूप रचता है

5. 

वे चुप क्यों  रहे

जो खामोश रहकर चले गये
उनकी सूचियां जारी की गयी
वे बोलना चाहते थे
उठना…. आगे बढ़ना चाहते थे 
कुल्हाड़े , फावड़े , हंसिया और गैती
चलाने को तैयार थे 
उनके हाथों में शिल्पी हुनर था 
ऑखों में नयी उम्मीद की रोशनी
गन्नों की तरह उन्हें कोल्हू में पेरा गया
भूसे की तरह फटका गया
मिश्र धातुओं की तरह गलाया गया
खरपतवार को जिस बेरहमी से निराते हैं 
उन्हें जड़ से मारा गया
फिर भी वे चुप क्यों रहे
इसका उत्तर क्या तुम्हारे पास है 
उन्हें किसी ने सहारा नहीं दिया
ज्योति स्तंभों ने उजाला नहीं दिखाया
गरीबी ने उन्हें पीसा
उन्हें कौन याद करेगा
कुछ कहते हैं कविता में उन्हें लाने से
विष फैलेगा
वे अब नहीं है
लेकिन उनके उत्तराधिकारी
हम से जवाब चाहते हैं
ओह ! कवि उनकी यादगारें ताजमहल की
बारीक मीनाकारी में जिन्दा हैं 
कविता में उनकी जगह कहा है 

6.

वसंत अब आने को है

वसंत अब जाने को है
निर्पात टहनियों में लहरें पैदाकर
वो जाने को है 
लकड़हारों के रस्ते पर

वह धूल मिट्टी मे सना है
उनके हाथ गठ्ठर को थामे हैं 
गर्दन बोझ से भिची है
भट्टों पर श्रमिक झोपड़ियों के आगे खड़े हैं
वहां वसंत के आने का कोई कंप नहीं है 
न हिलोर,न शब्द , न पदचाप
उनके बच्चे कटी-फटी ढायों पर खेलते हैं
माता-पिता ईंटो के साचे उठा रहे हैं
मेरी निराशा के पियरे पत्ते ऐसे भूदृश्य देखते ही गिरते हैं
वसंत जाने को हुआ

उसका न उन्हें एहसास है , न मलाल
फसल पकने को हुई
किसान की आंखो में चमक है
वे इसे काटेंगे
वे सब अलग अलग खड़े हैं 
मुठभेड़ , झड़पें आन्दोलित होते जन
गाम के सिमान सरपत सरसराती है
वे ईंटों के साचे जल्दी जल्दी उठाते हैं
सूर्य की अंतिम किरणें 
खिले अमलतास के सुनहरे गुच्छ
आदमियों के धचके पेट 
उभरी पसलियों का ढांचा
ये भूदृश्य ..भव्य भग्नावशेषों का खुरदरा स्थापत्य
कविता में कहोगे अनुभूति की जटिलता 
कहा हैं उनके सने पुते हाथ उठाते गीली मिट्टी 
के चिपचिपे लौदे
मेरे निम्नमध्यवर्गीय सौन्दर्यबोध का
पलस्तर उखड़ता है 
भरी सरसों तुसार से जल गई है
किसान अंदर तक दुखी है
उसे अचक अचक पोटुओं से छूता है
जैसे शायद वह जिन्दा हो उठे 
यह पूरा इलाका अच्छी फसल के इरादों का सच है
गामों में आग सुलगने का धुआ छाया है
कभी मूर्छाए, कभी मोह, कभी भ्रम और कभी भय
अंधविश्वासों का काला पर्दा 
आगे देखने नहीं देता 
तेलंगाना के किसान बोलते हैं विरोध की भाषा
बंग,ओडिसा ,दक्षिणी पठार,
छोटा नागपुर की स्याह चट्टानें 
वर्षा में सराबोर है
ओ कवि! भूमिगत खनिजों को पहचानो 
उन्हीं मे पौड़ी हैं धरती की रगें
देश की अंदरूनी ताकत का एहसास
हमारे वनों, झीलो,और पहाड़ों को 
हड़पने वाले वे कौन हैं पहचानो 
उन्हें बेनकाब करके जनता को दिखाओ़
उन्हें कौन शह दे रहा है पीछे से
तुम अपना त्रिनेत्र खोलो
कविता मेरे खून से उगती है
नदी के बहाव दोआबा में मंद हैं
तुम्हारे नीत वचन सड़ चुके हैं
तुम सूखे पत्ते नहीं जिन्हें हवा चाहे जहा उड़ा ले जाए
वे काले कारनामों की सुरंगें बहुत दूर तक जाती हैं 
वे तहखाने ,कोठार,
काला धन कमाने के ताले ठुके भंडार
कठघरों में बंधे हाथ ,पैर,ऑखें
जनता तुम्हारा चमकदार मुखौटा नोचेगी 
जिसके पीछे छिपा है 
भूखे भेड़िए का खून सना जबड़ा

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