विमलेश त्रिपाठी की 5 प्रेम कविताएं

विमलेश त्रिपाठी

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एक भाषा हैं हम

शब्दों के महीन धागे हैं 
हमारे संबंध

कई-कई शब्दों के रेशे-से गुंथे
साबुत खड़े हम 

एक शब्द के ही भीतर

एक शब्द हूं मैं
एक शब्द हो तुम

और इस तरह साथ मिलकर
एक भाषा हैं हम

एक ऐसी भाषा 
जिसमें एक दिन हमें 
एक महाकाव्य लिखना है।

झूठमूठ समय के बीच 

तुम झूठमूठ बैठ जाओ 
एक झूठमूठ-नदी के किनारे
मैं झूठमूठ एक गीत गाऊं

सफेद चेहरे की गहरी घाटियों में टहलते हुए
सिर्फ तुम्हारे लिए

तुम्हारी आंखों में हो झूठमूठ प्यार

और इस झूठमूठ समय के बीच 
खूब-खूब सच हो 
हमारा जीवन।

 

हम-तुम

 

तुम फूल बन जाओ कचनार

मैं ओस की बूंद बनता हूं

आओ मिलकर एक साथ

प्रार्थना करते हैं

अजीब-सी हो गई इस पृथ्वी के पक्ष में।

 

किसी ईश्वर की तरह नहीं

मेरी देह में सूरज की पहली किरणों का ताप भरो
थोड़ा शाम का अंधेरा
रात का डर भरो मेरी हड्डियों में

हंसी का गुबार मेरे हिस्से की कालिख में
उदासी की काई मेरी उजली आत्मा पर

किसी ईश्वर की तरह नहीं
एक मामूली आदमी की तरह मुझे प्यार करो।

 

फिर-फिर

बारिश की बूंदो में झरती हैं स्मृतियां
रेत-सा जीवन भीगता है

फिर-फिर उमड़ता है

छूट गया प्यार।