विमलेश त्रिपाठी की पांच कविताएं

 सपना
गाँव से चिट्ठी आयी है
और सपने में गिरवी पड़े खेतों की
फिरौती लौटा रहा हूं
पथराये कन्धे पर हल लादे पिता
खेतों की तरफ जा रहे हैं
और मेरे सपने में बैलों के गले की घंटियाँ
घुँघरू की तान की तरह लयबद्ध बज रही हैसमूची धरती सर से पाँव तक
हरियाली पहने मेरे तकिये के पास खड़ी है

गाँव से चिट्ठी आयी है
और मैं हरनाथपुर जाने वाली
पहली गाड़ी के इंतजार में
स्टेशन पर अकेला खड़ा हूं।

आग, सभ्यता, चाय और स्त्रियां
सदियों पहले आग के बारे में
जब कुछ भी नहीं जानते थे लोग
तब चाय के बारे में भी
उनकी जानकारी नहीं थी

स्त्रियाँ नहीं जानती थीं
चाय की पत्तियां चुनना
और आँसुओं के खामोश घूँट
बूँद-बूँद पीना भी
ठीक से नहीं मालूम था उन्हें

फिर कुछ दिन गुजरे
और आग की खोज की कसी मनुष्य ने
और ऐसे ही सभ्यता के कसी चौराहे पर
बहुत कुछ को पीने के साथ
उसे चाय पीने की तलब लगी

तब तक आग से
स्त्रियों का घनिष्ठ रिश्ता बन गया था
और सीख लिया था स्त्रियों ने
अपने नरम हाथों से पत्तियां चुनना
तब तक सीख लिया था
स्त्रियों ने
किवाड़ों की ओट में
चाय की सुरकी के साथ
बूँद-बूँद नमकीन
और गरम आँसू चुपचाप पीते जाना

वैसे ही आऊँगा
मंदिर की घंटियों की आवाज़ के साथ
रात के चौथे पहर
जैसे पंछियों की नींद को चेतना आती है।

कसी समय के बवंडर में खो गये
कसी बिसरे साथी के
जैसे दो अदृश्य हाथ
उठ आते हैं हार गये क्षणों में

हर रात सपने में
मृत्यु का एक मिथक जब टूटता है
और पत्नी के झुराए होठों से छनकर
हर सुबह
जीवन में जीवन आता है पुनः जैसे

कई उदास दिनों के
फाँके क्षणों के बाद
बासन की खड़खड़ाहट के साथ
जैसे अँतड़ी की घाटियों में
अन्न की सोंधी भाप आती है

जैसे लंबे इंतजार के बाद
सुरक्षित घर पहुंचा देने का
मधुर संगीत लिये
प्लेटफार्म पर पैसेंजर आती है

वैसे ही आऊँगा मैं।

बूढ़े इंतज़ार नहीं करते
बूढ़े इंतजार नहीं करते
अपनी हड्डियों में बचे रह गये अनुभव के सफेद कैल्सियम से
खींच देते हैं एक सफेद और खतरनाक लकीर
और एक हिदायत
कि जो कोई भी पार करेगा उसे
वह बेरहमी से कIल कर दया जाएगा
अपनी ही हथेली की लकीरों की धार से
और उसके मन में सदियों से फेंटा मार कर बैठा
ईश्वर भी उसे बचा नहीं पाएगा

बूढ़े इंतजार नहीं करते
वे काँपते हिलते उबाऊ समय को बुनते हैं
पूरे विश्वास और अनुभवी तन्मयता के साथ
शब्द-दर-शब्द देते हैं समय को आदमीनुमा ईश्वर का आकार
खड़ा कर देते हैं
उसे नगर के एक चहल-पहल भरे चौराहे पर
इस संकल्प और घोषणा के साथ
क उसकी परिक्रमा किए बिना
जो कदम बढ़ाएगा आगे की ओर
वह अंधा हो जाएगा एक पारंपरिक
और एक रहस्यमय श्राप से

यह कर चुकने के बाद
उस क्षण उनकी मोतियाबिंदी आँखों के आस-पास
थकान के कुछ तारे टिमटिमाते हैं
और बूढ़े घर लौट आते हैं
कर्तव्य निभा चुकने के सकून से
अपने चेहरे की झुर्रियाँ पोंछते हुए

बूढ़े इंतजार नहीं करते
वे धुँधुआते जा रहे खेतों के झुरमुटों को
तय करते हैं सधे कदमों के साथ
जागती रातों की आँखों में आँखें डाल
बतियाते जाते हैं अँधेरे से अथक
रोज-ब-रोज सिकुड़ती जा रही पृथ्वी के दुःख पर करते हैं चर्चा
उजाड़ होते जा रहे अमगिछयों के एकांत विलाप के साथ
वे खड़े हो जाते हैं प्रार्थना की मुद्रा में

टिकाए रहते हैं अपनी पारंपरिक बकुलियाँ
गठिया के दर्द भुलाकर भी
ढहते जा रहे संस्कार की दलानों को बचाने के लिए

बूढ़े इंतजार नहीं करते
हर रात बेसुध होकर सो जाने के पहले
वे बदल देना चाहते हैं अपने फटे लेवे की तरह
अजीब-सी लगने लगी पृथ्वी के नक्शे को
और खूंटियों पर टंगे कैलेंडर से चुरा कर रख लेते हैं
एकादसी का व्रत
सतुआन और कार्तिक स्नान अपनी बदबूदार तकिए के नीचे
अपने गाढ़े और बुरे वक्त को याद करते हुए

बूढ़े इंतजार नहीं करते
अपने चिरकुट मन में दर-दर से समेट कर रखी
जवानी के दिनों की सपनीली चिट्ठियों
और रूमानी मंत्रों से भरे जादुई पिटारे को
मेज पर रखी हुई पृथ्वी के साथ सौंप जाते हैं
घर के सबसे अबोध

और गुमसुम रहने वाले एक मासूम शिशु को
और एक दिन बिना कसी से कुछ कहे
अपनी सारी बूढ़ी इच्छाओं को
अधढही दलान की आलमारी में बंद कर
वे चुपचाप चले जाते हैं मानसरोवर की यात्रा पर
या कि अपनी पसंद के कसी तीर्थ या धाम पर
और फिर लौट कर नहीं आते…।

प्यार करते हुए
शब्दों से मसले हल करने वाले बहुरुपिए समय में
मैं तुम्हें शब्दों में प्यार नहीं करूंगा

नीम अँधेरे में डूबे कमरे के रोशन छिद्र से
नहीं भेजूँगा वह खत
जिस पर अंकित होगा पान के आकार का एक दल
और एक वाक्य में
समाए होंगे सभ्यता के तमाम फलसफे
कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं

मैं खड़ा रहूंगा अनन्त प्रकाशवर्षों की यात्रा में
वहीं उसी खिड़की के समीप
जहाँ से तु्म्हारी स्याह जुल्फों के मेघ दिखते हैं
हवा के साथ तैरते-चलते
चुप और बेआवाज

नहीं भेजूँगा हवा में लहराता कोई चुंबन
किसी अकेले पेड़ से
पालतू खरगोश के नरम रोओं से
या आईने से भी नहीं कहूंगा
कि कर रहा हूं मैं सभ्यता का सबसे पवित्र
और सबसे खतरनाक कर्म

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विमलेश त्रिपाठी
• बक्सर, बिहार के एक गांव हरनाथपुर में जन्म । प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही।
• प्रेसिडेंसी कॉलेज से स्नातकोत्तर, बीएड, कलकत्ता विश्वविद्यालय में शोधरत।
• देश की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, समीक्षा, लेख आदि का प्रकाशन।
• कविता और कहानी का अंग्रेजी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद।
सम्मान
• भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार
• ठाकुर पूरण सिंह स्मृति सूत्र सम्मान
• भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार
• राजीव गांधी एक्सिलेंट अवार्ड
पुस्तकें
• हम बचे रहेंगे कविता संग्रह, नयी किताब, दिल्ली
• एक देश और मरे हुए लोग,  कविता संग्रह, बोधि प्रकाशन
• उजली मुस्कुराहटों के बीच, ( प्रेम कविताएँ) ज्योतिपर्व प्रकाशन
• अधूरे अंत की शुरूआत, कहानी संग्रह, भारतीय ज्ञानपीठ
• कैनवास पर प्रेम, उपन्यास, भारतीय ज्ञानपीठ
• आमरा बेचे थाकबो ( कविताओं का बंग्ला अनुवाद), छोंआ प्रकाशन, कोलकाता
• वी विल विद्स्टैंड ( कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद), अथरप्रेस, दिल्ली
• 2004-5 के वागर्थ के नवलेखन अंक की कहानियां राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित।
• देश के विभिन्न शहरों  में कहानी एवं कविता पाठ
• कोलकाता में रहनवारी।
• परमाणु ऊर्जा विभाग के एक यूनिट में  कार्यरत।
• संपर्क: साहा इंस्टिट्यूट ऑफ न्युक्लियर फिजिक्स,
1/ए.एफ., विधान नगर, कोलकाता-64.
• ब्लॉग: http://bimleshtripathi.blogspot.com
• Email: starbhojpuribimlesh@gmail.com
• Mobile: 09088751215

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