वीणा भाटिया की चार कविताएं

प्रकृति से…

1.

नदी की धारा में

हाथ डालना

छूना महसूस करना

कितनी बातें करती है

नदी हमसे

 

जाने कब से है धरती पर

कहाँ-कहाँ से गुज़र कर

कितने तट कितने रास्ते

पार करती बहती जा रही है

 

सबसे सरल सृजन है

बचपन के बनाए चित्रों में

जो सहजता से

बन जाती है

वो है नदी।

 

2.

सदियों से हैं प्रकृति में

वो हैं पेड़

आसमान को छू जाएँ

कभी विनम्रता से झुक जाएँ

लहलहाएँ, बातें करें, मुस्कुराएँ

 

अड़ जाएँ लड़ जाएँ

हवा आँधी से भिड़ जाएँ

नन्ही गौरैया का घोसला

ना गिर पाए।

3.

प्रकृति से जो हमें मिला है

जिसके मायने खोज

हमने सुकून गढ़ा है

वो है संगीत वाद्य धुनें राग ताल

नृत्य भंगिमाएँ कविताएँ गीत

हम ख़ुद में क़ुदरत को महसूस करते हैं

तब ये सब मन में उगने लगते हैं।

4.

मासूमियत ढूंढोगे

बाल कविताएँ पढ़ना चाहोगे

बातें करना चाहोगे बच्चों से

आने वाले वक़्त में

जो नहीं होंगे।

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Email – vinabhatia4@gmail.com

 

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