विनोद कुमार दवे की कहानी ‘सहायता’

विनोद कुमार दवे

बस में बैठे-बैठे मैंने अनुमान लगाया, जयपुर पहुंचते पहुंचते बारह बज जाएंगे। जगह-जगह बस का रुकना मुझे बेचैन कर रहा था, अभी सात घंटे बाकी थे। इतना लंबा वक़्त बस में काटना बहुत मुश्किल है। मैं पछता रहा था, ट्रेन से आता तो बहुत सुविधाजनक रहता। “खैर अब तो भुगतना ही पड़ेगा”, यह सोचकर मैं जासूसी उपन्यास पढ़ने बैठ गया।

क्या है जासूसी उपन्यासों में, वहीं लूटपाट, बलात्कार, कत्ल, अवैध संबंध। ज़िंदगी की भीख मांगते, गिड़गिड़ाते लोग। रक्तरंजित तलवारें। झूठी प्रतिष्ठा के लिए प्यार का गला घोंटते माँ बाप। लाशों की ढेर पर खड़ा खलनायक। मुझे खुद की आदत पर आश्चर्य हो रहा था कि लूटपाट, हत्या संबंधी घटनाओं को चटखारे ले लेकर पढ़ना कहाँ की समझदारी है। केवल टाइमपास। अखबार में मर्डर और रेप की खबरों को मसाला लगा-लगा कर इस तरह पेश किया जाता है कि लोगों को पढ़ने में मजा आता है। दूसरों के साथ हो चुकी जो घटनाएं मात्र एक खबर होती है हमारे लिए, हमारे साथ वो ही हादसे गुजर जाए तो क्या इस तरह चाव से अखबार में छपी अपनी खबर को पढ़ेंगे हम। सपने में भी खुद के साथ किसी अनहोनी को देखकर हम सिहर उठते है, धड़कनों की गति बढ़ जाती है, रोंगटे तक खड़े हो जाते है, लेकिन वो ही अनहोनी जब किसी गैर के साथ होती है तो हमारे लिए महज एक खबर बनकर रह जाती है। जल्द ही मैं उस उपन्यास की रंगीन दुनिया में खो गया।

लगभग आधा घंटा हुआ होगा कि कोई व्यक्ति मेरे पास वाली सीट पर आकर बैठ गया। चेहरे से काफी भोला भाला लग रहा था। साधारण सी पोशाक में था। मैंने अनुमान लगाया, वह किसी सामान्य परिवार से ही होगा। उसने मेरी तरफ मुस्कुरा कर देखा और नमस्कार करते हुए पूछा,”जयपुर?”

मैंने भी अभिवादन करते हुए हाँ में सिर हिलाया। उस व्यक्ति की आवाज काफी मधुर थी। इतना अच्छा व्यवहार देखकर मैं दंग रह गया। सफर में अजनबी लोगों से दूरी बनाये रखना ही बेहतर समझा जाता है। सो मैंने भी शुरू में उसकी उपेक्षा की लेकिन उसने बातों का क्रम जारी रखा। मेरा परिचय जानने के बाद उसने खुद का पूरा परिचय दिया। तब तक कंडक्टर मेरी सीट तक पहुंच गया। मैं टिकट ले चुका था। उसने लाचार नजरों से मेरी तरफ देखा। मैं भी परिस्थिति समझ चुका था। मैंने उसका किराया चुकाया। उसने बहुत विनम्रता से मेरा शुक्रिया अदा किया। फिर बड़ी तफसील से उसने बताया कि वो उत्कृष्ट विद्या आश्रम में अध्यापक था और आज ही उसे नौकरी से बरखास्त कर दिया गया था। उसकी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं थी। और गहराई में जाते हुए उसने बोलना जारी रखा, “मैं अपने आदर्शों से समझौता नहीं कर सका। सभी धन के भूखे हैं। संस्था की तरफ से ट्यूशन पर रोक है। लेकिन ये लोग बच्चों को ट्यूशन आने के लिए मजबूर करते हैं। मैंने आगे शिकायत की तो सभी ने मिलकर मेरे खिलाफ साजिश रची और मुझे नौकरी से निकलवा ही दिया। बाहर मेरे साथ मारपीट की और उसी आपाधापी में मेरा पर्स कहीं गिर गया।“

“पुलिस में केस दर्ज करवा दो।“ मैंने सहानुभूति जताते हुए कहा।

“इतने सारे हैं। सब मिले हुए हैं। कानून सबूत मांगता है। और फिर फालतू का झंझट मोल लेना। केस सॉल्व होने में ज़िंदगी गुजर जाएगी।“

इसके पश्चात उसने भारतीय न्याय व्यवस्था पर तरस खाते हुए न्याय पालिका में फैले भ्रष्टाचार पर एक लंबा सा भाषण दिया। एक लेक्चर उसने आदर्श मानवीय मूल्यों पर, एक भाषण भारत की शिक्षा व्यवस्था पर दिया। बस का भला हो, जयपुर पहुंचा दिया। नहीं तो उसके पास अभी तो बहुत सी बातें थी, जिनके सहारे आसानी से पूरी दुनिया का सफर भी कट जाता। उसने मेरे मोबाइल नंबर लिए और जल्द ही पैसे लौटाने का आश्वासन देकर चलता बना।

मेरे पेट में चूहे कूद रहे थे। जल्द ही एक सस्ता ढाबा देख कर उसमें घुस गया। जल्दी से खाना खाया क्योंकि मुझे मेरे गंतव्य स्थल तक भी पहुंचना था। काउंटर पर बिल का भुगतान करते समय मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई। मेरा पर्स गायब था। पिछला पूरा घटनाक्रम नजरों के सामने घूमने लगा। मैं बस में मिले व्यक्ति से ऐसी उम्मीद भी नहीं कर सकता । उसका चेहरा याद आने लगा, ओह! कहाँ से भोला भाला दिखा था वह आदमी। छोटी छोटी आंखें, बेतरतीब बढ़ी हुई दाढ़ी मूंछें। बहुत ही शातिर शक्ल थी उसकी। मैं सोच भी नहीं सकता था कि ऐसे चालक दगाबाज़ व्यक्ति का किराया चुकाया मैंने। मैं जेब टटोलता हुआ हतप्रभ खड़ा था। ढाबे वाले ने मेरा चेहरा देख कर कहा,” तेरे जैसे कई सौ लोग यहां खाकर जाते हैं। तेरी शक्ल पर लिखा है तू मुझे चु… बनाने की कोशिश कर रहा है। या तो सीधे तरीके से बिल चुका दे वरना मार मार के भुर्ता बना दूंगा।“

मैं मन ही मन जितनी भद्दी गालियां दी सकता था, उस आदमी को दी, जो मुझे मूर्ख बना कर चला गया था। मेरे पास कोई चारा नहीं था, सिवाय उस ढाबे वाले के पैर पकड़ने के। चार जन मुझे घेर कर खड़े थे। मैं रोने ही वाला था कि किसी ने मेरे कंधों पर हाथ रखा,” सर! यह वॉलेट शायद आपका है। वहां टेबल के नीचे पड़ा था।“

मैंने एकदम से पर्स झपटा। ढाबे वाले को पैसे चुकाये और शुक्रिया कहने के लिए पीछे मुड़ा कि वह व्यक्ति वहां नहीं था। रुपयों से भला पर्स लौटाकर भी वह व्यक्ति धन्यवाद का एक शब्द सुने बिना वहां से चला गया। अब मुझे वापिस बस में मिला वह शख़्स याद आया। छोटी छोटी आंखों और बेतरतीब बढ़ी हुई दाढ़ी मूंछों के बावजूद वह व्यक्ति मुझे बहुत भोला भाला और मासूम लग रहा था।

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2 Responses

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