विशाल मौर्य ‘विशु’ की 3 प्रेम कविताएं

विशाल मौर्य 'विशु'

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1.मेरा प्रेम
 
मेरा प्रेम
दिल की चहारदीवारी फांदकर
तुम्हारे पास जाकर चुपचाप बैठना चाहता हैं
वैसे ही जैसे कोई छोटा लड़का
पाठशाला की दीवारें फांदकर 
बैठा रहता हैं बग़ीचे में
महुआ के पेड़ से बतियाते हुए
 
मेरा प्रेम 
तुमसे तुम्हारे ज़िस्म की मांग नहीं करता
यह तुम्हारा साथ माँगता हैं
दुनिया की राहों पे चलने के लिए
 
मेरा प्रेम
मुझको दिख जाता हैं
कभी कमरे की दीवारों से,कभी तकिये से लिपटकर रोते हुए
मगर कभी नहीं दिखा हैं
हारते हुए
इसने अपने भीतर उम्मीद क़ो
वैसे ही जिन्दा रखा है
जैसे मैंने अपने भीतर 
जिन्दा रखा है
कविता क़ो
 
 
2.मैं जानता हूँ
 
 
मैं जानता हूँ
तुम किसी अजनबी को सौंप दोगी
अपना कल 
वो अज़नबी जो तुमसे निभायेगा एक रिश्ता
जो कुछ रुपयों से तय हुआ ,
उम्रभर का एग्रीमेंट होता है
वो आँखें जिनके ख़्वाब मेरी आँखों ने देखे हैं
वो कभी पलट कर देख भी न सकेंगी 
अपना अतीत ,जो मेरे साये में बीता है
 
मैं जानता हूँ
तुम भी भूल जाओगी सब कुछ
लड़ना -झगड़ना, बाहों में एक दूसरे की उतरना
जैसे इंजीनियरिंग के लड़के अगले सेमेस्टर में
आकर पिछले सेमेस्टर के सब्जेक्ट भूल जाते हैं
मगर मैं रह जाऊंगा उसी सेमेस्टर में
कोई भी सब्जेक्ट नहीं बदलेगा 
वहीँ आँखे,वहीँ जुल्फ़ें
वहीँ  बातें, वहीँ  हँसी
 
मैं जानता हूँ
तुमको मुझसे छीन लेगा वक्त
मगर मैं फिर भी
तुमको पा जाऊंगा 
जानती हो मैंने तुमको ,तुमसे चुराकर
अपनी कविताओं में छिपा दिया हैं
 
 
3.सोचता हूँ
 
 

सोचता हूँ 
एक बार फिर तुमसे कहूँ कि
तुम्हारी ये बेबाक़ सीं हँसी क़यामत है
की ये तुम्हारे होंठ बिना क़िसी लिपिस्टिक के ही
गुलाबों की तरह लाल हैं
और ये तुम्हारी आँखे समंदर सी गहरी हैं
जिनमें डूब सकता है हर शख़्स 
चाहे भले वो तैरना भली भांति जानता हो

सोचता हूँ
एक बार फिर तुमसे कहूँ 
की तुम्हारे व्हाट्सप्प स्टेटस को तब तक देखता रहता हूँ
जब तक कि वो ग़ायब नही हो जाते
और तुमको मैंने इतने दिनों से देखा नहीं है
ये  हक़ीक़त तो है
पर मुझको लगता है मैंने तुमको
एक पल में हजार बार हर रोज़ हर दिन देखा है

सोचता हूँ 
एक बार फिर तुमसे कहूँ
“मुझे तुमसे इश्क़ है”
लेकिन जानती हो अब हौसला नहीं होता 
हौसला इसलिए नहीं होता कि
तुम फिर से इतने सालों की मोहब्बत ,चाहत को
महज़ एक अक्षर और एक मात्रा से बने
शब्द “ना” से तौल दोगी।
मैं तुमसे कहने के इस ख़्याल को 
रोज़ तुम्हारे उस पुराने “ना ” 
का कफ़न पहनाकर दफ़न कर देता हूँ
दिल के किसी कोने में
मगर जानती हो ये एहसास मरता ही नहीं
हर रोज़ पैदा हो जाता है
तुम्हारे “हाँ ” के इंतज़ार में 
   

 

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1 Response

  1. rahul says:

    Good job bro…..keep it on

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