विशाल विशु की चार कविताएं

मैं फिर आऊँगा तुम्हारे शहर

मैं फिर आऊँगा तुम्हारे शहर
समेटने उन लम्हों को
जो हमारे इश्क़ में भींगे थे कभी
चाय पीने गुप्ता जी की दुकान पर
जो हमारे मिलने का अड्डा होता था
फिल्म देखने उस टाकीज में
जहाँ की कार्नर सीट हम पहले ही
बुक करा लेते थे

मैं  फिर आऊँगा तुम्हारे शहर
उस बच्चे से मिलने
जिसके हाथों मैंने तुम्हें पहली बार
प्रेम पत्र भिजवाया था
ढूँढने उन यारों को जो
तुम्हे भाभी कहकर चिढाते थे
नदी के किनारे उस रेत से मिलने
जिस पर दिल बनाकर मैंने
I love you लिखा था

मैं फिर आऊँगा तुम्हारे शहर
उस बारिश से मिलने
जिसमें बरसे थे हमारे होंठ भी
किराए के उस कमरे से मिलने
जिसकी दीवारों पर मैंने
तुम्हारा स्कैच बनाया था
और तुमसे मिलने
ये जानकर भी की तुम
अब किसी और शहर में रहतीं हो

मैं तुम्हें वैसे ही पढ़ना चाहता हूँ

मैं तुम्हें वैसे ही  पढना चाहता हूँ
जैसे कोई बच्चा चिल्ला चिल्ला
कर पहाड़ा पढ़ता है
जैसे भक्ति में लीन होकर कोई
कबीर के दोहे पढ़ता है

मैं तुम्हें वैसे ही पढ़ता चाहता हूँ
जैसे कोई पढ़ता है दिन रात एक करके
ताकि वो upsc की परीक्षा पास कर सकें
जैसे कोई पढ़ लेता है छोटे से छोटे
अक्षरों को बगैर चश्मा लगाये

मैं तुम्हें वैसे ही पढ़ना चाहता हूँ
जैसे कोई पढ़ता है किताब का
एक एक अक्षर
जैसे कोई पढ़ता है एक भी दिन
क्लास  बंक किये बगैर

इसलिए तुमको मैं इस तरह से
पढ़ना चाहता हूँ
ताकि तुम कभी सवाल करो कि
मैं क्या जानता हूँ तुम्हारे बारे में
तो मैं मुस्कुरा कर ये जवाब दे सकूं कि
मैं तुम्हें जानता तो कम हूँ लेकिन समझता बहुत हूँ

तुमसे बिछुड़ने के बाद

सब कुछ तो बदल गया है
तुमसे बिछुड़ने के बाद
रात रात सी नहीं लगती
दिन भी नहीं लगता दिन की तरह
दीवार से लटकी घड़ी  चलती रहती है
बगैर वक्त बताये
चाय की चुस्कियों में मिठास नहीं है
जिस्म खाली डिब्बा सा लगता है
फूल भी काँटों की चुभन देते हैं
मौसमों का अब मिजाज ठीक नहीं लगता
बारिश की बूंदों से पत्थर जैसी चोट मिलती है
किताबें मुझे पढ़ती है मैं किताबों को नहीं
तुम्हारी उंगलियों से जब मेरी उंगलिया खेलती थी

कैसे दिल सिहर सा जाता था
कैसे धड़कनों में कोई हलचल सी हो जाती थी
कैसे आंखों में इक नशा उतर आता था
कैसे होठों पर कंपकंपी सी होने लगती थी
अब वहीं दिल वीरान पड़ा है
वहीं धड़कने गूँगी हो गयी है
वहीं आँखे आँसूओं के बाढ़ में डूबी हुई है
वहीं होठ अब सूख से गये हैं
तुमसे बिछुड़ने के बाद

हम मरते हैं

हम मरते हैं
तुम्हारी बातों पर
जिनसे मीठी दुनिया की
कोई भी चीज़ नहीं है
तुम्हारी जुल्फों पर
जिसकी छाँव बेहद
पंसद हैं  मेरे दिल को
तुम्हारी उँगलियों पर
जिनके नाखूनों पर लगा
नेलपालिश फूल सा बना देता है
तुम्हारे हाथों को

हम मरते हैं
तुम्हारे होठों पर
जिसकी लाली आईना
दिखातीं है गुलाबों को
तुम्हारे चलने की अदा पर
जिसे देखने के चक्कर में
टकरा जाता हूँ कई बार
अजनबियों से सड़क पर
तुम्हारे गाल के उस तिल पर
जिसने जानें कितनों को
पागल बना रखा है
मेरी ही तरह

हम मरते हैं
तुम्हारे व्हाटसेप डी पी पर
जिन्हें तुम बदलती रहती हो
खूबसूरत स्टेट्स के साथ
तुम्हारे उस चश्में पर
जिनसे पढने के अलावा
कभी -कभी झाक लेतीं हो
मेरी ओर भी
हम मरते हैं
सनम तुम पर
हाँ सिर्फ तुम पर
इस उम्मीद से की
किसी दिन जी उठेंगे हम
तुम्हारे होकर

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