विवेक आसरी की 6 कविताएं

विवेक आसरी

विवेक आसरी कर्म से पत्रकार. मन से यायावर. और वचन से लेखक. वह 15 वर्षों से पत्रकारिता कर रहे हैं. भारत, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के मीडिया संस्थानों में ऑनलाइन, रेडियो और टीवी पत्रकारिता कर चुके हैं. फिलहाल ऑस्ट्रेलिया के एसबीएस रेडियो की हिंदी सेवा के लिए बतौर प्रोड्यूसर काम कर रहे हैं. भारत में नवभारत टाइम्स अखबार के साथ लंबा समय बिताया है. जर्मनी की अंतरराष्ट्रीय सेवा डॉयचेवेले के साथ भी काम किया है. नाट्यकर्म में कई वर्षों से सक्रिय हैं. उनके पहले नाटक होली काउ का गोबर उर्फ कोर्ट मार्शल नहींको 2009 का मोहन राकेश सम्मान मिला था. इस बीच कई नाटकों का निर्देशन भी किया. कुछ फिल्में भी बनाईँ जिन्हें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कार मिले हैं.

  1. ओ पिता

ओ पिता

मैंने तुम्हें तब जाना

जब मेरे पांव तुम्हारे जूतों से बड़े हो गए

और हालात नए जूतों की मांग की तख्ती लिए

मेरे सामने खड़े हो गए.

ओ पिता

मैंने तुम्हें तब माना

जब दिनभर की थकन से मेरे कंधे जलने लगे

और मेरे बच्चे

मेरे कंधों पर चढ़ने को मचलने लगे.

 

ओ पिता

एक साथ हुआ

तुम्हें पाना

और मेरा खुद पिता हो जाना।

 

2. कवियों की कर दो छंटनी

सुनो,

लेखक-वेखकों को अब सस्पेंड कर दो

और कवियों की कर दो छंटनी।

अब हमें चाहिए लुहार

जो शब्दों को पिघलाकर

फौलादी तलवारें बना सकें।

अब हमें चाहिए चमार

जो मरे हुए शब्दों की

खाल उधेड़ सकें, बेझिझक।

अब हमें चाहिए कुम्हार

जो मिट्टी के शब्दों को

कठोर कड़वे पत्थर बना सकें।

अब हमें चाहिए सुनार

जिनके बनाए शब्दों की

लोग जान से बढ़कर हिफाजत करें।

और सुनो,

भर्ती करते वक्त ध्यान रखना

कोई ब्राह्मण न हो,

क्योंकि भूखो मरना भी आना चाहिए।

 

3. पर्यायवाची

मैंने जितनी भी यात्राएँ बांची हैं
और नापे हैं जितने भी बिछोह
व्याकरण भले ना माने
एक बात साची है
लौटना और छूटना पर्यायवाची हैं

4. लौटूंगा

लौटूंगा और लौटते ही जाऊंगा
उस पूर्व प्रेमिका से मिलने
जिससे बात भी करने का मन नहीं.
उन दोस्तों को कॉल करूंगा
जो आस्तीन के सांप निकले.
रुकूंगा कहीं नहीं
और सबसे वादा करूंगा कि कल मिलते हैं
फिर फोन स्विच ऑफ कर दूंगा.
लौटने के सारे दुख जी लूंगा
ताकि लौटना सुखद न रहे
हमेशा के लिए. 

5. माता

भारत कौन है?
माता है।
तो इतना माथा काहे खाता है?
मां का दिल तो बहुत बड़ा होता है
ये तो छोटी-छोटी बात पर
तिलमिला जाता है।

6. बहनों का कत्ल 

कत्ल से पहले

बहनें सुबह हैं

सुबह की चौखट पर फुदकती चिड़िया हैं

चिड़िया के परों पर ओस का क़तरा हैं

कतरे के भीतर गीली रोशनी हैं

रोशनी का फैलता पागलपन हैं

पागलपन की तन्हाई हैं

तन्हाई में चुपके से जन्मती मोहब्बत हैं

मोहब्बत की दुनियावी घबराहट हैं

घबराहट का पहला कदम हैं

पहले कदम की मुखालफत हैं

मुखालफत का कत्ल हैं

कत्ल की रात हैं…

 

कत्ल के बाद

बहनें वक्त हैं

वक्त के बोलते रिवाज हैं

रिवाजों की बढ़ती जरूरत हैं

जरूरतों की भटकती अहमियत हैं

अहमियत का सुर्ख अहम हैं

अहम की पिघलती इज्जत हैं

इज्जत की वेदी हैं

वेदी की ठंडी अग्नि हैं

अग्नि की पवित्रता हैं

पवित्रता के बासी फूल हैं

फूलों की सिसकती माला हैं

मालाओं के पीछे की चुप तस्वीर हैं

बहनों के कत्ल से पहले

भाई मर्द हैं

बहनों के कत्ल के बाद

भाई मर्द हैं।।

 

 

 

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