व्यंग्य यात्रा का जुलाई-सितंबर 2019 अंक

हरिशंकर राढ़ी

व्यंग्य जगत में सार्थक हस्तक्षेप रखने वाली त्रैमासिकी ‘व्यंग्य यात्रा’ का नया अंक अपने भरेपूरे आकार और चिर-परिचित कलेवर के साथ आया है। सदा की भांति इस अंक में चिंतन, त्रिकोणीय पद्य और गद्य व्यंग्य, पुस्तकों की चर्चा और समीक्षा के साथ अनेक रपटें हैं। त्रिकोणीय में इस बार अरविंद विद्रोही, कुंदनसिंह परिहार तथा मधुसूदन पाटिल को लिया गया है जिन पर विशद चर्चा है। व्यंग्य के इन तीनों हस्ताक्षरों पर प्रचुर एवं अच्छी सामग्री दी गई है। त्रिकोणीय का प्रारंभ करते हुए संपादक प्रेम जनमेजय बहुत सधे हुए शब्दों में अर्थपूर्ण टिप्पणी करते हैं। कहा जाए तो वे इन तीनों लेखकों पर प्रस्तुत सामग्री के कैप्शन की तरह आते हैं। अरविंद विद्रोही आत्मकथ्य में सरल शब्दों में अपनी व्यंग्यकारिता की परिस्थितयों का जिक्र करते हैं तथा स्थापित मूल्यों के तहस-नहस होने की स्थिति को व्यंग्य के स्रोतरूप में देखते हैं। वे लिखते हैं – ‘व्यंग्यकार सत्ता की कुरूपता को संवेदना के धरातल पर उतारने तथा नुकीले] चुभते शब्दवाणों से सही आकार देने का काम करते हैं।’

उनकी तीन व्यंग्य रचनाएं ‘जयघोष’, ‘राष्ट्रीय संकट में राष्ट्रभक्ति’ तथा ‘झूठ-सच का दर्शन’ दी गई हैं जिससे उन पाठकों को भी त्रिकोणीय में विद्रोही को देखने का कारण समझ में आ जाएगा जिन्होंने अभी तक उनकी रचनाएं नहीं पढ़ी हैं। इसी में अरविंद विद्रोही पर दिनेश्वर प्रसाद सिंह ‘दिनेश’, प्रदीप कुमार शर्मा तथा नवीन कुमार अग्रवाल के लेख भी पठनीय हैं।

इस क्रम में मधुसूदन पाटिल का आत्मकथ्य उनकी व्यंग्ययात्रा की अनेक परतें खोलता है। पाटिल की रचनाओं के अतिरिक्त उनपर डॉ शेरजंग गर्ग, सी भास्कर राव, पाल भसीन के लेख संस्मरण का पुट लिए उनकी रचनाओं की पड़ताल करते हैं। त्रिकोणीय में ही कुंदनसिंह परिहार पर लगभग उसी क्रम में सामग्री दी गई है। सर्वप्रथम कुंदनसिंह परिहार का आत्मकथ्य जिसमें वे अपने बचपन से लेकर लेखन-प्रकाशन का जिक्र संजीदगी से करते हैं जिसमें विनम्रता का भाव प्रभावित करता है और उन्हें एक गंभीर किंतु सहज लेखक बनाता है। परिहार जी की तीन रचनाएं ‘चीजों को रखने की सही जगह’, ‘हमारी कॉलोनी में दो बांके’ और ‘दुआरे पर गऊ माता’ दी गई हैं। रमेश सैनी का साक्षात्कार, लेख प्रभावी है जबकि अभिमन्यु जैन परिहार के व्यंग्य में प्रधान तत्त्वों को निरूपित करने का प्रयास करते हुए दिखते हैं।

वस्तुतः व्यंग्य यात्रा का यह अंक अपने तमाम पारंपरिक खंडों को लेकर भले ही आया हो, किंतु अंक से आद्योपांत गुजरने पर इसका चिंतन खंड सबसे गंभीर एवं विमर्शयोग्य लगता है। इसमें संदेह नहीं कि व्यंग्य यात्रा अपनी व्यंग्य रचनाओं के लिए उतनी महत्त्चपूर्ण नहीं मानी जाएगी जितनी व्यंग्य विमर्श के लिए। कारण कि व्यंग्य रचनाएँ तो आजकल हर पत्र-पत्रिका में छप रही हैं, भले ही इक्का-दुक्का। व्यंग्य के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए यदि कोई पत्रिका संघर्ष करती दिख रही है तो वह व्यंग्य यात्रा ही है। व्यंग्यालोचना हो, व्यंग्य की समीक्षा हो या व्यंग्य के आयोजन, यह पत्रिका व्यंग्य के क्षेत्र में पूरे समर्पण और निष्ठा से काम कर रही है, यह बात अलग है कि इसमें प्रकाशित हर रचना व्यंग्य की स्थापना में योगदान नहीं दे सकती। इस अंक में चिंतन खंड में व्यंग्य के विभिन्न पहलुओं पर गंभीर एवं लंबे लेख हैं जिनमें व्यंग्य के तत्त्वों की विकास यात्रा(एम.एम. चंद्रा), व्यंग्य की भाषा (डॉ रमेशचंद्र खरे), तर्करहित व्यंग्य (सुनील जैन राही) पर काफी कुछ लिखा गया है, किंतु समूचे चिंतन खंड को देखने के बाद यह विश्वास सा होता है कि इस खंड में व्यंग्य के मूलतत्त्वों की तलाश अन्य सभी लेखों-विमर्शों को आच्छादित कर देती है। ऐसा लगता है कि विमर्श में अन्य सभी व्यंग्य संबंधित लेखों को दरकिनार करके व्यंग्य के मूलतत्त्व संबंधी लेख पूरी तरह हावी हो गए हैं या उपरोक्त लेख भी व्यंग्य के मूलतत्त्व को पकड़ने के लिए ही लिखे गए हैं।

यह स्वागत योग्य कदम है कि व्यंग्य के मूलतत्त्व की गवेषणा पर व्यंग्यजगत गंभीर है। किंतु इस विमर्श की प्राप्तियों की बात की जाए तो घूम-फिरकर पुनः उसी शून्य पर पहुँचते हैं। व्यंग्य के तत्त्व की तलाश में दो लेख आते हैं – व्यंग्य जीवन की आलोचना है (रमेश सैनी) और विसंगति- व्यंग्य का मूल तत्त्व (रणविजय राव)। दोनो ही लेख व्यंग्य प्रवृत्तियों एवं आवश्यकताओं की पड़ताल करते हैं तथा काफी कुछ ठोस लेकर आते हैं, किंतु पूरे खंड से गुजरने के बाद लगता है कहीं न कहीं व्यंग्य के मूलतत्त्व की तलाश अंधों के गाँव की हाथी बनकर रह गया है। दरअसल, किसी एक तत्त्व को व्यंग्य का मूलतत्त्व मान लेना व्यंग्य के पंख कतरने के समान होगा। न जाने कितने तत्त्वों, प्रकारों एवं परिस्थितयों से व्यंग्य बनता है। इसमें दो राय नहीं होनी चाहिए कि व्यंग्य का मूलतत्त्व विसंगति है, न विसंगति होगी, न व्यंग्य पैदा होगा। विसंगति को भी हमें छोटे परिप्रेक्ष्य में नहीं देखना होगा। विसंगति में पाखंड, छल-छद्म, ईर्ष्या-द्वेष, अहंकार, अयोग्यता सभी कुछ समाहित है। अकेले विसंगति हो जाने से व्यंग्य पैदा नहीं हो जाता, उसे देखने और कहने की भी दृष्टि और शैली होती है। एक बार विसंगति दिख जाए तो उसे अभिव्यक्त करने के लिए कटूक्ति, वक्रोक्ति, अन्योक्ति, अतिशयोक्ति, काकु, रूपक और भी न जाने क्या-क्या प्रयोग में लाए जा सकते हैं। लेकिन बकौल प्रेम जनमेजय, व्यंग्य सुशिक्षित मस्तिष्क की विषयवस्तु है। अतः व्यंग्य करने और व्यंग्य समझने के लिए उच्च भाषिक और बुद्धिलब्धि के मस्तिष्क की आवश्यकता होती है। देखा जाए तो एक उत्तम व्यंग्य इन सभी तत्त्वों के सुंदर मेल से ही बन सकता है। अतः इसे एक मूलतत्त्व तक संकुचित कर देना न तो संभव है और न समीचीन। हाँ, यह कहा जा सकता है कि रमेश सैनी और रणविजय राव अपने लेखों में व्यंग्य की विविधताओं की पड़ताल करते हैं और मूलतत्त्व संबधी धारणा की स्थापना के बहाने अच्छे व्यंग्य के कुछ मानदंड निर्धारित करने में सफल होते हैं। वहीं सुनील जैन राही इस बात के लिए साधुवाद के हकदार बनते हैं कि वे अच्छे व्यंग्य में प्रयोज्य कारकों का विश्लेषण बड़ी सतर्कता से करते हैं जबकि एम.एम चंद्रा व्यंग्य विधा में आने वाले उपवर्गों के सूक्ष्म अंतर को सरलता से स्पष्ट कर पाते हैं। व्यंग्य को तो हाथी का पाँव ही रहने दिया जाए जिसमें सभी के पाँव (व्यंग्य के उपवर्ग) समाए हुए हैं।

इस अंक की व्यंग्य रचनाओं की बात की जाए तो नामचीन-अनामचीन कुल सत्रह गद्य व्यंग्य हैं जिनकी गुणवत्ता को लेकर न तो बहुत उछला जा सकता है और न दुखी हुआ जा सकता है। कुल मिलाकर सभी रचनाएँ लगभग बराबर प्राप्तांक की हकदार हैं चाहे वे पुराने व्यंग्यकारां की हों या नए। हाँ, पद्य खंड में इस बार बहुत सुधार हुआ है। नरेश सक्सेना की कविताएं व्यंग्य की गहराई में बिना शोर किए उतरती हैं।

व्यंग्य यात्रा एक मामले में सौभाग्यशाली है कि पाठकों के पत्रों के स्तंभ ‘आप चंदन घिसें’ में पर्याप्त और लंबी प्रतिक्रियाएं आती हैं। इनमें कई पत्र रचनाओं का बेबाक विश्लेषण करते हैं जो प्रतिक्रिया से आगे जाकर समीक्षात्मक हो जाते हैं। यह किसी पत्रिका के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा होता है। इस अंक में साहित्य जगत और व्यंग्य जगत के सुपरिचित कलमकारों की प्रतिक्रियाएं छपी हैं जिनमें राहुल देव, कमलकिशोर गोयनका, गिरीश पंकज, प्रताप सहगल, और श्रीकांत चौधरी हैं। जनवरी-जून 2019 अंक में विमर्श के अंतर्गत प्रकाशित मेरे (हरिशंकर राढ़ी) लेख ‘व्यंग्य की विषयवस्तु और मूल्य’ पर श्रीकांत चौधरी ने सहमति-असहमति सहित व्यापक प्रतिक्रिया दी है जिसके लिए मैं आभारी हूँ। किसी बिंदु पर सभी लेखकों का सहमत हो जाना साहित्यिक स्वास्थ्य के लिए मुफीद नहीं होता। दरअसल, उस लेख में व्यंग्य के हाइकूकारों या मौसमी शब्दबाजों या फेसबुकिया टिप्पणीकारों द्वारा व्यंग्य को पहुँचाई जा रही क्षति पर चिंता व्यक्त की गई थी। श्रीकांत चौधरी का कहना है कि फेसबुक पर उपस्थित अच्छे और गंभीर व्यंग्यकारों को नजरअंदाज किया गया है। यह सच है कि फेसबुक पर गंभीर व्यंग्यकार भी हैं किंतु व्यंग्य को हानि गंभीर व्यंग्यकारों से नहीं बल्कि हिट एंड रन टाइप व्यंग्यकारों से ही है। लिहाजा चर्चा भी उन्हीं की होनी थी। हाँ, किन्हीं तकनीकी कारणों से उस लेख में अंत के लगभग सात सौ शब्द प्रकाशित होने से रह गए थे, नहीं तो कुछ प्रहार तथा कुछ स्पष्टीकरण और भी होते। जहाँ तक सत्ता समर्थन की बात है, साहित्य की अन्य धाराओं में सत्ता समर्थक रचना भले ही की जा सकती हो (हालांकि चारण परंपरा दीर्घजीवी नहीं हो सकती), पर मुझे नहीं लगता कि सत्ता समर्थन में व्यंग्य भी लिखा जा सकता है। हाँ, मेरी यह मान्यता जरूर है कि कुछ व्यंग्यकार यह समझ बैठे हैं कि सरकार के हर कदम (वह किसी भी दल की सरकार हो) के विरोध को ही व्यंग्य माना जाएगा।

व्यंग्य यात्रा में एक अच्छा अध्याय यह है कि संपादक प्रेम जनमेजय ‘इधर जो मैंने पढ़ा’ के अंतर्गत कुछ पुस्तकें लेकर स्वयं समीक्षा लिख रहे हैं। व्यंग्य में समीक्षा और आलोचना का संकट सदैव से रहा है और मुझे हमेशा लगा कि इस संकट को व्यंग्यकार ही दूर कर सकता है। प्रायोजित समीक्षाओं से बचकर एक संपादक का खुद पढ़ना और लिखना प्रशंसनीय है।
बाकी व्यंग्य यात्रा की यात्रा अधिक सुखद होती रहेगी… लगता तो है।

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