यारेग़ार : चरम अमानवीयता की संवेदनशील कहानी

संज्ञा उपाध्याय
दिल्ली में जनमीं, पढ़ी-लिखीं संज्ञा उपाध्याय युवा संपादक, कहानीकार, फ़ोटोग्राफ़र और शिक्षक हैं. 
वे साहित्य और संस्कृति की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘कथन’ की संपादक हैं. ‘कथन’ के संपादन के लिए उन्हें स्पंदन साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से नवाजा गया.
‘कथन’ के साथ उन्होंने पैंतीस पुस्तकों की चर्चित अनूठी श्रृंखला ‘आज के सवाल’ का सम्पादन भी किया है. 
कहानियों, समीक्षा-लेखों, यात्रा-वृत्तांतों के साथ-साथ वे बच्चों के लिए बहुत सुंदर कविताएँ भी लिखती हैं. 
एक युवा फ़ोटोग्राफ़र के रूप में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनायी है. उनकी खींची तस्वीरें कई पुस्तकों और पत्रिकाओं के कवर पृष्ठों पर प्रकाशित हुई हैं. नारीनामा नामक बड़े आयोजन में उनकी तस्वीरें प्रदर्शित हुई हैं. 
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की थियेटर इन एजूकेशन कंपनी में उन्होंने बतौर एक्टर-टीचर और को-ऑर्डिनेटर के रूप में लंबे समय तक काम किया है. बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों के साथ कई कार्यशालाओं का उन्होंने संचालन किया है. इन कार्शालाओं के दौरान कुछ मौलिक नाटक भी उन्होंने बच्चों के साथ विकसित किये हैं. वे अपनी शिक्षण पद्धति में रंगमंच कौशल के नये प्रयोग करती रहती हैं. 
फिलहाल वे दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज में हिंदी पढ़ाती हैं.  
 
 

नया ज्ञानोदय के कहानी विशेषांक में दिव्या विजय की बहुत अच्छी कहानी प्रकाशित हुई है—‘यारेग़ार’। 
जयपुर के चौगान से शुरू होकर कहानी अफ़ग़ानिस्तान जाती है। हम सभी ने तस्वीरों में, रिपोर्टरों के वीडियोज़ में, फ़िल्मों में अफ़ग़ानिस्तान के ध्वस्त घरों को देखा है। एक धार्मिक चरमपंथी कट्टर शासन के आते ही ख़ुशबाश ज़िंदगी कैसे ख़ौफ़ के अंधेरों में क़ैद हो जाती है, यह अफ़ग़ानिस्तान ने तालिबान के आने पर देखा। तरह-तरह की हिंसा और युद्धों से ग्रस्त दुनिया के तमाम हिस्सों के बच्चों का जीवन कैसा होता होगा, कल्पना करें। एक दिन उनसे अचानक कह दिया जाता है कि खेलना बंद, स्कूल जाना बंद, घर से बाहर निकलना बंद…चारों तरफ़ मृत्यु और विध्वंस देखकर कैसे मन, मस्तिष्क और व्यक्तित्व बनते होंगे उनके…

दिव्या विजय, कथाकार

जयपुर के चौगान में पतंगबाज़ी करते एक दम्पती को एक अफ़गान व्यक्ति मिलता है, जो पतंगबाज़ी के बारे में अद्भुत जानकारी रखता है. उसके यह कहने के बाद कि ‘अब’ मैं पतंग नहीं उड़ाता, कहानी अफ़गानिस्तान के उन दिनों में चली जाती है, जब नजीबुल्लाह की हत्या हुई और तालिबान शासन के आरंभ के साथ अफ़गान जनता पर अमानवीय कठोर नियम लादे गये.

कहानी में चार बच्चे हैं. तीन भाई-बहन फ़रहाद, अली और शीर तथा एक अनाथ मूसा. फ़रहाद और अली पतंगबाज़ी के दीवाने हैं. और इसमें बहुत कुशल भी. लेकिन अब वे पतंग नहीं उड़ा सकते, क्योंकि तालिबान की नज़र में यह बेहूदा काम है. अब उन्हें स्कूल नहीं जाना, क्योंकि स्कूल बंद हो चुका है. पढ़ाने वाली सब स्त्रियाँ थीं, जिन्हें अब घर में बंद हो जाने का हुक्म है. लेकिन बच्चे छिपकर कहीं दूर पतंग उड़ाने की योजना बनाते हैं. पतंग बनाने वाले नूर चचा उन्हें पतंगें देते हैं. इस क्रम में एक बार वे तालिबानों की क्रूर हिंसा के शिकार भी होते हैं, पर मरने से बच जाते हैं। उस समूह में उन पर सबसे वहशियाना तरीके से हिंसा करने वाला उनका हमउम्र एक बच्चा ही है.

यह बच्चा है अनाथ मूसा. मूसा भले ही अमानुषिक परिस्थितियों में तालिबानों के बीच पला है, लेकिन है वह बच्चा ही. वह पतंग उड़ाना सीखना चाहता है. फ़रहाद और अली से उसकी दोस्ती हो जाती है. पतंग उड़ाते में संकट आने पर वह अपनी बंदूक से सामना करने का दावा और वादा करता है.

लेकिन जब वास्तव में यह क्षण आता है, तो गद्दारी की सजा मौत के भय से वह फ़रहाद, अली और शीर को मार डालता है…

हिन्दुस्तानी दंपती को जो व्यक्ति यह कहानी सुना रहा है, वह मूसा है…भयंकर अमानुषिकता के बीच रहा मूसा, जिसने अपने मित्रों की हत्या की थी। लेकिन भीतर कहीं बची रह गयी संवेदना और मनुष्यता के कारण मूसा इस हत्या के नैतिक बोझ से उबर नहीं पाता।

कहानी यह बताने में नहीं उलझती कि उस बीते जीवन में हत्या करने के बाद मूसा के साथ क्या क्या हुआ। आज मूसा पतंगबाज़ी का बेहतरीन जानकार है। वह हिंदुस्तान के एक मैदान में पतंग उड़ाते बच्चों को बारिकियाँ और गुर सिखा रहा है।…उसने अपने मनुष्य को फिर बनाया और सहेजा है।

कहानी सिर्फ़ अफ़ग़ानिस्तान में ही रह सकती थी, लेकिन लेखिका ने उसे हिंदुस्तान से जोड़कर एक बड़ा फलक दिया है। वर्तमान दौर हमें किस दिशा में ले जा सकता है, इसका अप्रत्यक्ष संकेत उभरता है यहाँ।

मूसा कहानी सुना रहा है, पर ट्रीटमेंट में कहीं यह सुनाना नहीं है। कहानी जैसे मूसा की आँखों के परदे पर चलती है। हर प्रसंग के बाद आँखों के भाव और रंग बदलते हैं। कहन की इस युक्ति का बहुत अच्छा प्रयोग दिव्या ने किया है। मूसा कहानी सुनाने वाला होकर भी उस भूमिका से ग़ायब रहता है और कहानी दृश्यों में प्रवाहपूर्ण ढंग से चलती रहती है।

यारेग़ार का अर्थ है पक्का दोस्त। मौत के क्षण में मूसा की दोस्ती पर नन्हे अली का यक़ीन, उस यक़ीन का टूटना और उस टूटन को लिये मूसा का अपने दोस्तों की याद में फिर इंसान होना। वर्षों बाद भी मूसा उस दोस्ती को पक्का करने की कोशिश में लगा है। वह आसमान को हज़ारों रंग की पतंगों से भरा देखने की चाहत से भरा है। आज़ाद उड़ती पतंगों से।

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