यशपाल निर्मल की दो लघुकथाएं

गर्व

  ” घर में कोई है क्या?”
सरपंच अवतार सिंह ने आवाज़ लगाई ही थी कि फकीर चंद  दौड़ते हुए दरवाज़े पर पहुँचा । उसने भय और घबराहट से कहा,” मालिक आपने क्यों कष्ट किया? मुझे बुला लेते। ”
“क्यों फकीर चंद, हम तुम्हारे घर भी नहीं आ सकते क्या?”
” नहीं मालिक मेरा वो मतलब नहीं था। आपका ही घर है । आप जब चाहें आ सकते हैं।” सरपंच को कमरे में चारपाई पर बिठाकर फकीर चंद ने पत्नी को चाय लाने को कहा।
” सिर्फ़ चाय से काम नहीं चलेगा। मिठाई भी लाओ ,लड़का प्रोफ़ेसर जो हो गया है तुम्हारा। ” सरपंच ने फकीर चंद को उसके बेटे के प्रोफ़ेसर नियुक्त होने की बधाई देते हुए कहा,”बुलाओ उसे कहाँ है? मैने सोचा उसे बारना करता चलूँ। फकीर चंद तुम्हारा इकलौता बेटा प्रोफ़ेसर बन गया है। यह तुम्हारी मेहनत का ही फल है। ” फकीर चंद ने आवाज़ लगाई तो उसका इकलौता बेटा जो हाल ही में ही यूनीवर्सिटी में प्रोफ़ेसर नियुक्त हुआ था। वह आ गया और आते ही उसने सरपंच को प्रणाम किया। सरपंच ने आषीश देते हुए पांच सौ के नोट का बारना किया। लड़का भी पास ही बैठ गया। काफ़ी देर तक बातों का दौर चलता रहा। चाय मिठाई कब की समाप्त हो चुकी थी।
सरपंच जब जाने लगा तो उसने जाते जाते फकीर चंद से कहा ,” फकीरे भई धान की फ़सल लगाने का समय हो चला है।ज़मीन भी तैयार करनी है। तूने बीस वर्षों से मेरे खेतों को संभाला हुआ है। मुझे किसी बात की कोई चिंता नहीं थी। अब तुम्हारा इकलौता बेटा भी प्रोफ़ेसर बन गया है। अब तुम अकेले तो मेरे खेतों को संभाल नहीं पाओगे। फिर भी मैने सोचा एक बार तुमसे पूछ लेता हूँ………??”
पास खड़ा फकीर चंद का बेटा सरपंच की बात बीच में ही काटते हुए बोला,” अंकल आपको परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।  पहले की तरह इस बार भी आपकी ज़मीन पर हम ही फ़सल लगाएंगे। यही काम करके तो हम यहां पहुँचे हैं। और यह काम हम भविष्य में भी करते रहेंगे। मेहनत ही तो सच्ची पूजा है। मुझे गर्व है कि हमारा परिवार मेहनत मज़दूरी करता है………”  फकीर चंद और सरपंच के चेहरों पर हैरानी और ख़ुशी के मिश्रित भाव थे।

बाप की सीट

सुरेश और रमेश कालेज से छुट्टी के बाद घर जाने के लिए बस में बैठ गए। थोड़ी ही देर में बस खचाखच भर चुकी थी। बस में अब खड़े होने की भी जगह नहीं बची थी।
रमेश और सुरेश जिस सीट पर बैठे थे, उनके पास ही दो अधेड़ उम्र की महिलाएं खड़ी थीं। उन्हें तरस आ गया और उन्होंने खुद उठ कर सीट पर उन्हें बैठ जाने को कहा। दोनो महिलाएं आराम से बैठ गयी ।
एक महिला ने दूसरी से कहा,” देखो कितने सुसंस्कृत बच्चे हैं, खुद उठ गए और हमें बैठने के लिए सीट दे दी। वरना आजकल के बच्चे तो………”
दूसरी महिला अचानक बोल पड़ी ,”सीट कौन सी लड़कों के बाप की थी जो उन्होंने हमें देकर एहसान किया है।”
दूसरी महिला के इस उत्तर से पहली महिला को ग़ुस्सा तो बहुत आया परंतु मन मसोस कर रह गयी। पास ही खड़े रमेश और सुरेश भी उनका वार्तालाप सुन रहे थे। उन दोनों को उस महिला पर बहुत  ग़ुस्सा आया । वह स्वयं को ठगा ठगा सा महसूस कर रहे थे।
रमेश सीधा साधा था। किंतु सुरेश कुछ कुछ चालाक और तेज तरार। उसने अपनी जेब में हाथ डाला और पर्स गुम  होने का नाटक करने लगा। उसने अपने चेहरे पर  घबराहट के भाव लाते हुए उन दोनों महिलाओं को उठने के लिए कहा ताकि वह अपना पर्स ढ़ूंढ सके। जैसे ही वह दोनों महिलाएं उठी  सुरेश ने रमेश को आँख मारी और दोनो सीट पर बैठ गए। दोनों के चेहरों पर संतुष्टी के भाव स्पष्ट दिख रहे थे। सुरेश ने महिलाओं की और ताकते हुए कहा ,” जाओ अब अपने बाप वाली सीट पर ही जाकर बैठो। ” दोनों महिलाएं अपना सा मुँह लेकर रह गई।

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यशपाल निर्मल

डोगरी एवं हिंदी भाषा के युवा लघुकथाकार, कथाकार, कवि, आलोचक,लेखक, अनुवादक, भाषाविद् एवं सांस्कृतिककर्मी  यशपाल निर्मल का जन्म 15 अप्रैल 1977 को जम्मू कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्र छंब ज्यौडियां के गांव गड़ी बिशना में श्रीमती कांता शर्मा एवं श्री चमन लाल शर्मा के घर पर हुआ।
जम्मू विश्वविद्यालय से डोगरी भाषा में स्नातकोतर एवं एम.फिल. की डिग्री हासिल करने वाले यशपाल ने 1996 में एक प्राइवेट स्कूल टीचर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। उसके उपरांत “दैनिक जागरण”, “अमर उजाला” एवं “विदर्भ चंडिका” जैसे समाचार पत्रों के साथ बतौर संवाददाता कार्य किया। वर्ष 2007 में नार्दन रीजनल लैंग्वेज सैंटर ,पंजाबी यूनिवर्सिटी कैंपस,पटियाला में डोगरी भाषा एवं भाषा विज्ञान के शिक्षण हेतु अतिथि ब्याख्याता नियुक्त हुए और तीन वर्षों तक अध्यापन के उपरांत दिसंबर 2009  से जम्मू कश्मीर कला,संस्कृति एवं भाषा अकैडमी में शोध सहायक के पद पर कार्यरत हैं।

यशपाल ने श्रीमद्भागवत पुराण को डोगरी भाषा में अनुवाद किया है। सन् 1996 में आपका पहला डोगरी कविता संग्रह ” अनमोल जिंदड़ी” प्रकाशित हुआ। अब तक हिन्दी , डोगरी एवं अंग्रेजी भाषा में विभिन्न विषयों पर 25 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अनुवाद कार्य, साहित्य सृजन ,समाज सेवा,पत्रकारिता और सांस्कृतिक क्षेत्रों  में अतुल्निय योगदान हेतु इन्हें कईं मान सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।

पता:- 524, माता रानी दरबार, नरवाल पाईं, सतवारी, एयरपोर्ट रोड, जम्मू-180003

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