यशपाल शर्मा की तीन लघुकथाएं

सच्चा प्यार

“यार मैं कोमल के बिना ज़िंदा नहीं रह सकता।” रमण ने बड़ी ही मासूमियत के साथ कहा।
“क्यूँ? ” मैंने अनायास ही पूछ लिया।
” तुम नहीं जानते मैं कोमल से कितना प्यार करता हूँ।  सच्चा प्यार।  बहुत ज़्यादा चाहता हूँ मैं उसे। अपनी जान से भी ज़्यादा। ”
“अच्छा”
“हाँ यार ! आज वह नराज है मुझसे तो मुझे चैन नहीं आ रहा। ”
“क्यों क्या बात हो गई ऐसी”
“यार कल उसने मुझे अंजना के साथ काफ़ी हाउस में देख लिया था”
” यार मुझे एक बात समझ नहीं आती ,जब तुम्हारा अफेयर कोमल के साथ ठीक ठाक चल रहा है तो फिर तुम्हें इधर उधर मुँह मारने की क्या आवश्यकता है?”
” क्योंकि ,अगर ईश्वर न करे  कल को कोमल से ब्रेक अप हो जाता है तो कोई न कोई तो चाहिए टाइम पास के लिए।” रमण ने तपाक से कहा।
मैं अवाक सा उसका चेहरा ताकता रह गया।

अजनबी

अनुराधा और नीलम 12वीं की परीक्षा  पास कर ली थी। आज वह दोनों  जम्मू  विश्वविद्यालय में पत्राचार माध्यम से बी.ए. प्रथम वर्ष में प्रवेश लेने आई थीं। उन दोनों को न तो विश्वविद्यालय के विभागों की जानकारी थी और न ही वहां कोई जान पहचान का था। वह दोनों बहुत परेशान थीं। पास खड़ा तरसेम उनकी परेशानी भांप गया। क़रीब जा कर बोला ,”मेरा नाम तरसेम है। इसी विश्वविद्यालय के डोगरी विभाग में एम.फिल . कर रहा हूँ। आप कुछ परेशान लग रही हैं। क्या मैं आपकी कुछ सहायता कर सकता हूँ?”
एक अजनबी का इस प्रकार उनसे बोलना और फिर सहायता के लिए आग्रह करना अनुराधा और नीलम को अटपटा सा लगा। लेकिन कोई और रास्ता भी तो नहीं था। उन्होंने झिझकते हुए कहा ,”  हम बी.ए. प्रथम वर्ष में पत्राचार माध्यम में प्रवेश लेना चाहती हैं। हमें विश्वविद्यालय के बारे में कुछ भी पता नहीं है……..”
तरसेम ने उनको सबसे पहले पत्राचार विभाग दिखाया। प्रासपैक्टस ख़रीद के दिए। प्रवेश के सभी नियम विस्तार से समझाए। फिर फ़ार्म भर कर ,फीस बग़ैर जमा करवा दी। और इस प्रकार दौड़ धूप करके एक ही दिन में उनको प्रवेश दिलवा दिया। उसके बाद सारे विश्वविद्यालय में घूमाया और सभी विभागों की जानकारी दी। दोपहर हो चली थी तरसेम उनको कैंटीन में ले गया और खाने का आर्डर दे दिया। दोनों सहेलियाँ जो पहले सामान्य हो चुकी थीं अब  घबराने लगीं थी। कहीं यह अजनबी हमें अपने किसी जाल में तो नहीं फंसा रहा। है? इसी उधेड़बुन में उन्होंने खाना भी खाया। तरसेम ने खाने का बिल चुकाया और उनको विदा करने बस स्टैंड तक उनके साथ गया। अपने गाँव वाली बस में बैठ कर दोनो सहेलियाँ राहत महसूस कर रहीं थीं।
अनुराधा और नीलम ने बड़े ही अदब के साथ तरसेम का धन्यवाद किया और कहा हम ,” हम आपका एहसान कैसे चुका पाएंगे। ”
” इसमें एहसान वाली कोई बात नहीं है। मैं खुद गाँव से हूं। और मैने वही किया जो एक भाई अपनी बहनों के लिए कर सकता है। ”
दोनों सहेलियों की आँखें छलक आईं थीं। उनको अपनी सोच पर घृणा आ रही थी।।बस चल पड़ी थी। दोनों सहेलियाँ चुप्पचाप सोच में गुम थीं।

मोह माया

“इन्सान को  मोह माया के बंधन में नहीं बंधना चाहिए। मोह माया मनुष्य को लालची,भ्रष्टाचारी और कई प्रकार के बुरे कामों की और अग्रसर करती है।” स्वामी जी ने धर्म प्रेमी जनता से कहा।
” इतना ही कमाओ जिससे गुज़ारा चल सके। यह संसार तो पराया घर है। यह घर परिवार, ज़मीन जयदाद , रिश्ते नाते सब नश्वर हैं। कोई सच्चा साथी नहीं। एक न एक दिन सब साथ छोड़ जाएंगे।  इसलिए इनकी मोह ममता में नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि मनुष्य  इस संसार से उस संसार तक कुछ नहीं ले जा सकता। खाली हाथ आए खाली हाथ जाएंगे।।”
प्रवचन सुन रहा रामदीन सोच रहा था कि घर पर उसका बीमार बेटा दवाई का इंतज़ार कर रहा होगा।  परंतु संत पुरुषों के दर्शन से भी तो कई कष्ट दूर हो जाते हैं। इसलिए मुझे किस बात की चिंता।
स्वामी जी ने प्रवचनों को समाप्त करते हुए धर्मप्रेमी भक्तजनों से आग्रह करते हुए कहा,” आश्रम के विस्तार के लिए दिल खोल कर दान दें। कमाई का दसवां हिस्सा तो हर भक्त को देना ही होगा अन्यथा अनर्थ हो जाएगा।”
रामदीन सोच रहा था कि एक तरफ़ तो स्वामी जी मोह माया से बचने का प्रवचन कर रहें हैं वहीं दूसरी और आश्रम के विस्तार के लिए लोगों को दिल खोल कर दान देने की बातें कर रहें हैं। रामदीन के मन में एक अंतर्द्वन्द चल पड़ा । कभी वह सोचता कि ज़ेब में पड़ा सौ का नोट वह आश्रम को दान दे दे। फिर दूसरे ही क्षण सोचता कि आश्रम को वह फिर कभी भी दान दे सकता है लेकिन उसके बीमार बेटे के लिए इस समय दवाइयों की अधिक आवश्यकता है। इसी उधेड़ बुन में रामदीन दवाइयों की दुकान की और चल पड़ा।

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