योगेंद्र कृष्णा की तीन कविताएं

योगेंद्र कृष्णा
मछुआरा

एक मछुआरा
समुद्र को जितना जानता है
उतना तुम कहां
तुम तफरीह में आते-जाते रहे
दूर से निहारते
या छूते रहे पानी को
जैसे सहलाता हो कोई खरगोश

तुम उसकी लहरों से उठता
संगीत सुनते रहे
नहीं जाना कभी
ये लहरें उठती ही क्यों हैं

अजनबी सैलानियों से वह
नहीं बांटता अपना दर्द
और तुम नहीं गए कभी वहां
जहां वह रहता है

पानी का स्वाद
मैंने बहुत ढूंढा उसे
पर नहीं मिला…
वो हमारे इतिहास के पन्नों के
हाशिए पर भी नहीं दिखा
नहीं था वो कहीं
हमारे वेद और उपनिषदों में
हमारे कथन या उपकथन में
या हमारी किंवदंतियों में भी…

नहीं मिली उसकी परछाइयां
पेड़ की जड़ों में
या ऊंची अट्टालिकाओं की नींव में
नहीं था वो शामिल
हमारी उर्वर अधूरी सोच में
खारिज था वो हमारे सपनों-दुःसपनों
और कल्पनाओं-परिकल्पनाओं से भी

सदियों से
हमारे खेतों की पगडंडियों
और नदियों की सूखी रेत पर
नंगे पांव जो अथक चलता रहा
धरती और पहाड़ के भीतर
जो सूराख बना कर
उसी में रेंगता रहा
हमारी हर भूख और प्यास से जिसका
अनाम अटूट रिश्ता था
नहीं बचा सके हम जिसको
उसकी मामूली भूख से

खून और पसीने में सने
उसके कटे हुए दोनों हाथ
आज भी उस गहरे अंधेरे कुएं में दफ़्न हैं
जिस कुएं के पानी का स्वाद
लोग कहते हैं बहुत मीठा है…

शब्द चुक गए थे जहां

शब्द जहां-जहां कमजोर पड़ गए थे
वहां-वहां खुद मैं मौजूद था
तुम्हारी घनी चुप्पियों को
आकार देता हुआ

लेकिन तुम नहीं थे वहां
जहां तुम्हारे पांव के निशान थे
तुम वहां भी नहीं मिले
जहां पसीने और मिट्टी के गंध
में एकमेक रोज तुम मिलते थे

लौटते हुए मैंने देखा
कुछ दूर तक तुम्हारे पांव के निशान
अचानक ख़त्म हो जाते हैं
विशाल सूखे पेड़ की जड़ों में
जहां मेरी आवाज या शब्द
नहीं पहुच सकते थे

पेड़ और आसमान का
बहुत कर्ज था तुम पर
तुम उस पेड़ को उसकी पत्तियां
लौटाने गए थे शायद
और आसमान को उसका रंग
लेकिन जो तुमने नहीं
किसी और ने चुराया था…

मैं गवाह हूं तुम्हारी बेगुनाही का
क्योंकि शब्द चुक गए थे जहां
मैं खुद मौजूद था वहां..

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संक्षिप्त परिचय  : योगेंद्र कृष्णा

जन्म : 1 जनवरी, 1955

शिक्षा : अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर

लेखन हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में। पहली रचना ‘एक चेहरा आईना’ श्रीपत राय संपादित पत्रिका ‘कहानी’ में प्रकाशित। रचनाएं कहानी, पहल, हंस, कथादेश, वागर्थ, ज्ञानोदय, साक्षात्कार, पूर्वग्रह, अक्षर पर्व, परिकथा, पल प्रतिपल, आजकल, लमही, इंडिया टुडे, शुक्रवार, आजकाल, समयांतर, समावर्तन, हिंदुस्तान, लोकमत समाचार समेत देश की लगभग सभी स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित तथा पटना दूरदर्शन एवं आकाशवानी से समय-समय पर प्रसारित।

प्रकाशित कृतियां : खोई दुनिया का सुराग, बीत चुके शहर में ( दोनों कविता संग्रह), गैस चैंबर के लिए कृपया इस तरफ : नाज़ी यातना शिविर की कहानियां ( पोलिश कथाकार ताद्युश बोरोवस्की की कहानियों का हिंदी अनुवाद ), संस्मृतियों मे तोलस्तोय (हिंदी अनुवाद) सभी पुस्तकें संवाद प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित।

संप्रति : बिहार विधान परिषद के हिंदी प्रकाशन विभाग से हाल में ही पदाधिकारी की जिम्मेदारियों से मुक्त। अब पूर्णकालिक स्वतंत्र लेखन।

सम्पर्क  : 2/800, शास्त्री नगर, पटना : 800023

ईमेल : yogendrakrishna55@gmail.com

 

3 comments

  1. बहुत अच्छी कविताएँ !!
    ‘शब्द चुक गए थे जहाँ
    मैं खुद मौजूद था वहाँ ‘

  2. योगेन्द्र कृष्णा कविताओं में बिम्बों का छद्म आलोक नहीं रचते , बल्कि अपने परिवेश और लोक का आलोक का आभास अपनी विशिष्ट शैली की काव्यभाषा से ही देते हैं ,इसलिए इनकी रचना का कथ्य पाठकों के अन्तस्तल को गहराई से स्पर्श करता है।

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