आदमियत की दुखती रग के निर्दोष राग ढूंढ़ने का नया तरीक़ा

पुस्तक समीक्षा

किताब :  चाक पर रेत ( जाबिर हुसेन )

शहंशाह आलम

मेरा मानना है कि हर लेखक किसी पहाड़ी कबीले का सदस्य होता है। तभी तो हर लेखक जीवन को, जीवन से जुड़े संघर्ष को इतने निकट से देख पाता है। यह सही भी है। एक सच्चे लेखक का जीवन क्या है, कैसा है, कैसा होना चाहिए जैसे सवाल जब कभी मेरे भीतर उठे हैं, तो मुझे उत्तर यही मिलता रहा है कि हर लेखक को पहाड़ी कबीले का सदस्य होना चाहिए। इसलिए कि इस जीवन को कोई दूर किसी छोटे इलाक़े में रहकर अगर जीता है, तो असल जीवन तो वही है। वही जीवन जीवन के असल महत्व को दर्शाता है। जहाँ ऊँच-नीच का लफड़ा है भी तो उस लफड़े में मासूमियत रहती है। जबकि शहरी अथवा महानगरीय तामझाम ने जो छीना-झपटी हमें दी है, वह हमारा नाश करने के लिए काफ़ी है। इस छीना-झपटी से मुक्ति तभी संभव है, जब हम कई सौ मील जाकर अपनी जड़ों से जुड़ेंगे और अपने असली जीवन को आत्मसात् करेंगे। कम-अज़-कम हम लेखकों को ऐसा ज़रूर करना चाहिए। तभी हमारा लेखन हमारे अंतस का लेखन सिद्ध होगा।

मैंने अपने समय के बेहद महत्वपूर्ण लेखकों में एक जाबिर हुसेन को अपने लेखन को सच्ची धार देने के लिए उस जीवन को जीते देखा है, जो जीवन बिना किसी शोर के धरती के उस टुकड़े से जुड़ा रहता आया है, धरती का जो टुकड़ा अपनी एक नई तरह के तीव्र संघर्ष से जुड़ा रहा और जीतता आया है। जाबिर हुसेन ऐसे जीवन के बारे में कहते हुए लिखते हैं, ‘मैं चाक पर फैली रेत के समान हूँ। मुझे पता है, इस रेत से चाक पर कोई उपयोगी वस्तु आकार नहीं ले सकती। मैं ख़ुद भी अपने जीवन में कोई आकार कहाँ ले पाया।’ अब आप ही कहिए, एक चाक, जो एक कुम्हार के हाथों गति पाते हुए, मिट्टी-पानी पाते हुए कितनी ही चमत्कारिक वस्तुएँ देता है, एक लेखक अपनी क़लम से उस चाक से कहीं अधिक चमत्कारिक रचनाएँ देता है। मैंने पहले ही लिखा है कि जाबिर हुसेन एक महत्वपूर्ण लेखक हैं और उनका महत्व इससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपने आस-पास के जीवन से जो लिया, उससे कहीं ज़्यादा उस जीवन को वापस लौटाया है। अभी-अभी छपकर आई उनकी किताब ‘चाक पर रेत’ को पढ़कर आप भी यही कहेंगे बिना कोई शक किए। 256 पृष्ठों की यह किताब इस रेत से भरे समय से हमारे काम लायक़ बहुत सारा बढ़िया छानकर एक नया दरिया-बहाती है :

 

मछुआरों को पता है

समुद्र में

कब आएगा तूफ़ान

कब आएगी लहरों में उछाल

कितनी ऊँची उठेंगी लहरें

कितनी दूर भीगेगी रेत

तहस-नहस होंगे कितने किनारे

मछुआरों को पता है, सब

 

जाल में फँसी मछलियों ने

बता दिया है उन्हें, सबकुछ

ख़तरों से

आगाह कर दिया है, उन्हें

 

मछुआरे नहीं बेचते हैं

अपना नमक

हमेशा ख़्याल रखते हैं

अपने ‘शुभ-चिंतकों’ का

 

तभी तो

समुद्री तूफ़ान से पहले

मछुआरे

ढीले कर देते हैं, अपने जाल

और मछलियों को

दे देते हैं

समुद्र  में लौटने की छूट ( ‘मछुआरों को पता है’, पृ.254 )।

 

जाबिर हुसेन ‘चाक पर रेत’ में शामिल अपनी गद्य-रचनाओं को अपने जीवन की रचनाएँ कहते हैं। उनकी ये रचनाएँ बिहार के बहाने अपने भारत के उन अभिशप्त गाँवों की हैं, जहाँ हिंसा है, प्रतिहिंसा है, यातनाएँ हैं, ग़ैर-बराबरी का नंगा नाच है। वे अपनी रचनाओं के बारे में कहते हैं, ‘ये सारी तहरीरें उस समय लिखी जाती रहीं, जब बिहार के गाँवों की ज़मीन दरक रही थी और सामाजिक रिश्तों की बुनियादें ढह रही थीं। गाँव के खेतिहर मज़दूर, भवन-निर्माण से जुड़े कामगार, छोटे-मोटे व्यवसायी, दलित और उपेक्षित वर्गों के लोग, इन सब की आवाज़ बनकर आगे बढ़ना अपने आप में एक जोखिम भरा अभियान था।’ यहाँ पर मुझे एक कंबोडियन कहावत याद आ रही है। वह कहावत कुछ यूँ है कि जब शीशा टूटकर पानी पर तैरने लगे तो बुराई जीत जाती है। मेरे ख़्याल से अभी बुराई हम पर भारी है। सच्चाई यह भी है कि जाबिर हुसेन की रचनाएँ बुराई को हराती रही हैं। सच्चाई यह भी है कि देश का और विश्व का सामान्य वर्ग किसी असहाय, रक्षा चाहने वाला जीवन जी रहा है। इनके दर्द का मरुथल आप जाबिर हुसेन का साहित्य पढ़कर महसूस सकते हैं। उनकी रचनाएँ कभी भी कुछ लोगों के अच्छे जीवन का उत्सव न मनाकर उनके अच्छे जीवन के लिए संघर्ष करती रही हैं, जिन्हें ठेल-ठालकर हमेशा पंक्ति में सबसे पीछे खड़ा किया जाता रहा है। असल बात यही है कि जाबिर हुसेन की रचनाएँ जलते लोकतंत्र का सीधा, साफ़-सुथरा बयान हैं। सौ से अधिक गद्य-रचनाएँ और चार कविताओं के माध्यम से इस ‘चाक पर रेत’ में व्यक्ति-चित्र और हमारे जीने के रोज़मर्रा के दिन से लिए गए आत्मविश्वास से लेखक द्वारा जो कुछ लिखा-रचा गया है, वह अद्भुत है और अपने पढ़ने वालों को संतुष्ट करता है :

 

उन्हें दुष्टात्मा कहना सही नहीं

वो निर्मल आत्माओं को

आहत ही तो करते हैं

अपने शब्दवाण से सहिष्णु प्राणियों को

लहूलुहान ही तो करते हैं

 

उन्हें सच को झूठ बनाने में महारत हासिल है

और सफ़ेद को स्याह

वो रात की तारीकी में, और, कभी-कभी

दिन के उजाले में भी

किसी चतुर शिकारी की तरह

न्याय की बिसात पर

अपने पासे फेंककर

मुस्कराने के आदी हैं

 

उनकी जेबें पक्ष-विपक्ष के समर्थन में

दस्तावेज़ी सबूतों से लैस होती हैं

समय-समय पर वो इन सबूतों को

आगे-पीछे, बाएँ-दाएँ

करने की कला में पारंगत हैं

सुविधा के सभी दरवाज़े उनके लिए

हमेशा खुले रहते हैं

 

वो एक हुनरमंद, ज्ञानवान बौधिक हैं

आस्तिक-नास्तिक, सभी

उनके आगे झुकते हैं

हर दिन, एक नई रोचक व्याख्या के साथ

वो बौधिक जगत को भरमाते रहते हैं

उनके कहे-अनकहे का

बुरा नहीं मानते लोग

 

कभी-कभी, वो चिंघाड़ते भी हैं

चिंघाड़ते वक़्त, उनकी आँखों में

उतर आता है ख़ून

जिसे वो सामने वाले को

आतंकित करने के लिए

छोड़ देते हैं, यूँ ही

उनकी आँखों में तब

नहीं होती हैं, पानी की बूँदें

 

मैं जानता हूँ

वो सर-से-पा

नफ़रत और आग की मूरत हैं

मगर उन्हें दुष्टात्मा कहना

दुष्टात्माओं का अपमान ( ‘अपमान’, पृ.353 )।

 

‘चाक पर रेत’ के कई आयाम हैं। इस किताब में लेखक का अपना जीवन है, लेखक से जुड़े रहे मित्रों-अग्रजों का जीवन है, लेखक के साथ, लेखक के आसपास रहे लोगों का जीवन है। सबका पक्ष एक अच्छे और साफ़ मौसम की तरह इन रचनाओं में देखा जा सकता है। इन रचनाओं में लेखक ख़ुद की, मित्रों-अग्रजों की, आम लोगों की गाथा बेहद मार्मिक, बेहद वैधता के साथ प्रकट करने में सफल दिखाई देते हैं। मुझे लगता है कि सूखी पत्तियों को हरी पत्तियों में बदलने का जो हुनर प्रो. जाबिर हुसेन के पास है, यह हुनर अच्छे-अच्छों के यहाँ मुझे इन दिनों नदारद दिखाई देता है। जाबिर हुसेन का साहित्य उस नदी के जैसा है, जो बहती रहती है या उस पेड़ की तरह है, जो फलों से लदा-भरा रहता है या उस पिता की तरह है, जो सबकुछ सहते हुए जीवन का आदिम राग गाता रहता है। जाबिर हुसेन अकेले ऐसे लेखक हैं, जो हमारे दुखों में से जीवन के चमत्कारिक राग  को खोजते हैं और हमारे दुखों को कम करते हैं। जाबिर हुसेन अकेले ऐसे लेखक भी हैं, जो युवा होते हुए जितना अपने लेखकीय जीवन में सक्रिय थे, उससे कहीं अधिक आज सक्रिय लेखकीय जीवन गुज़ार रहे हैं, पहले से कहीं अधिक ताक़तवर होकर। मेरे ख़्याल से जाबिर हुसेन के लेखकीय जीवन से हमें बहुत सारा कुछ सीखने को मिलता रहा है। उन्हें पढ़ते हुए मेरा अनुभव यही कहता है। इसलिए कि समकालीन सच्चाई जितनी मुखर यहाँ दिखाई देती है उनके समकालीनों के यहाँ दिखाई नहीं देती। इसलिए भी कि जाबिर हुसेन का साहित्य हम जैसों के जीवन का जो द्वार खोलता है, वह जीवंत भी है और एक चमत्कृत कर देनेवाली भाषा से लैस भी है।

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चाक पर रेत ( कथा, आत्मकथा, डायरी, कविता ) / लेखक :  जाबिर हुसेन, प्रकाशक : दोआबा प्रकाशन, 247 एम आई जी, लोहियानगर, पटना-800 020 / मोबाइल संपर्क : 09431602575 /  मूल्य : ₹300 मात्र।

 

समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801 505 / मोबाइल संपर्क : 09835417537

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