सय्यदैन ज़ैदी की कविता ‘वो जो है ख़्वाब सा…’

वो जो है ख्वाब सा
ख़याल सा
धड़कन सा
सिरहन सा
सोंधी खुशबू सा
नर्म हवाओं सा
सर्द झोकों सा
मद्धम सी रौशनी सा
लहराती सी बर्क़ सा
बिस्तर की सिलवटों सा
बाहों में लिपटे तकिए सा
जिस्म की बेतरतीब चादर सा
सुबहों की ख़ुमारी सा
शाम की बेक़रारी सा
सरकती सी रात सा
ठहरी सी दोपहर सा
काश कभी मिल जाए
वहां उस ओट के पीछे
भींगते पीपल के नीचे
कुछ सूखा सा
कुछ कुछ गीला सा
बस जरा सा…
इतना सा…

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1 Response

  1. Vibhuti says:

    ज़ैदी सर, 👏👏👏👏👏👍❤

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