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केवल शिल्प के बेहतर हो जाने से कोई बड़ा कथाकार नहीं हो सकता। हिन्दी में यह बहुत पुरानी बहस है। कहानी अंतर्वस्तु और शिल्प की अन्विति है, दोनों की मौजूदगी वहां होगी। अगर अंतर्वस्तु नहीं हो तो शिल्प बेमानी हो जाएगा। अंतर्वस्तु के संप्रेषण के लिए ही शिल्प की ज़रूरत होती है। अंतर्वस्तु बड़ी चीज़ है। उसमें शिल्प हो तो प्रभाव दुगुना हो जाएगा। अगर अंतर्वस्तु नहीं हो और लेखक सिर्फ़ शिल्प पर जोर देगा तो कुछ नहीं बनेगा।
 
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