रमेश शर्मा की पांच कविताएं

रमेश शर्मा

जन्म: 06.6.1966, रायगढ़ छत्तीसगढ़ में .

शिक्षा: एम.एस.सी. (गणित) , बी.एड.

सम्प्रति: व्याख्याता

सृजन: एक कहानी संग्रह मुक्ति 2013 में बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित . छह खंड में प्रकाशित कथा मध्यप्रदेश के छठवें खंड में कहानी सम्मिलित .

*कहानियां: समकालीन भारतीय साहित्य , परिकथा, हंस ,पाठ ,परस्पर , अक्षर पर्व, साहित्य अमृत, माटी इत्यादि पत्रिकाओं में प्रकाशित .

*कवितायेँ: इन्द्रप्रस्थ भारती, कथन , परिकथा ,सूत्र, सर्वनाम, अक्षर पर्व, माध्यम, लोकायत, आकंठ, वर्तमान सन्दर्भ इत्यादि पत्रिकाओं में प्रकाशित ! 

संपर्क : 92 श्रीकुंज , बीज निगम के सामने , बोईरदादर , रायगढ़ (छत्तीसगढ़), मोबाइल 9752685148

 

1.
इसलिए मरने से बेहतर है कि हम अपनी कहानी में बचे रहें !
(आप कौनसी सेलेब्रेटी जैसा दीखते हैं जैसे मसखरेपन से भरे लिंक को देखते-पढ़ते हुए )

मैं अपने जैसा न होकर
किसी सेलेब्रेटी जैसा लगूँ
तो फिर मेरे होने की कहानी खतम !
मैं अपने जैसा न सोचकर
उधार की सोच पर दिन गुजारूं
तो फिर मेरे खयालों की कहानी ख़तम !
अपने होने को कहीं छोड़ आने की ये कैसी तीव्र आकांक्षा
जो अक्सर पल रही सबमें
एक कहानी को जन्मती है
और एक कहानी मरती है हमारे होने की मृत्यु के साथ !
जीवन का ये कैसा फलसफा
कि हर वक्त आदमी अपने होने को नकार रहा
जी रहा उधार के खयालों पर !
सेलेब्रेटी लगना ऐसा क्या हो जाना है आखिर
उसे भी तो मरना होगा किसी कहानी में
वह भी तो सोचता होगा अपने अवसाद भरे एकांत में
कि वह किसी और की तरह लगे
जीये किसी और की तरह जैसा हम जीते हैं
अच्छा हो कि हम बने रहें अपने होने और अपने खयालों के साथ
बने रहें हमारी अपनी कहानी में
क्योंकि किसी परायी कहानी में जन्म लेना
दरअसल जन्म लेना नहीं बल्कि मरने जैसा है !
इसलिए मरने से बेहतर है कि हम अपनी कहानी में बचे रहें !

 

2.
क्या किसी दिन ऐसा होगा

किसी दिन तेज बारिश हो
और हम अपनी सारी कड़वाहटें
छोड़ आयें
बारिश में भींगते हुए !
किसी दिन ऐसा हो
हम वहां मिलें
जहां अब हम कभी नहीं मिला करते !

किसी दिन ऐसा हो
हम चलें वहां
और उन धूल की परतों को झाड़ आयें
देख आएं उन पत्थरों पर खुदे नामों को
जिसे कभी हमने खुद लिखा
और छोड़ आए उन घने जंगलों की
सबसे उंची पहाडी पर उन्हें
जहां से होकर अब कोई नहीं गुजरता !
किसी दिन ऐसा हो कि तुम्हारे शहर में
मैं वेश बदल कर आऊं
और तुम पहचान सको झट से मुझे
जैसा कि कभी मेरी आहट ही तुम्हारे लिए मेरी पहचान हुआ करती थी !
किसी दिन ऐसा हो कि मैं रहने लगूँ
उन किताबों में फिर से
जिसे तुम पढ़ा करतीं थीं रोज कभी
और कहा करतीं थीं इस जीवन को रोक लो
जो तेजी से भागे जा रहा
तुम्हारीं बातें सुन मैं कितना हंसा करता था और मेरी खिलखिलाहटें
आसमान में पसर जाया करती थीं एक छाते की तरह !
क्या किसी दिन ऐसा होगा
कि मैं अपनी आहटों से पहचाना जाऊंगा
मेरी खिलखिलाहटें आसमान से फिर धरती पर उतर सकेंगी
क्या किसी दिन ऐसा होगा
कि कोई किताब तुम्हारे हाथों में होगी
और उसके भीतर अचानक मेरी मौजूदगी का एहसास होगा तुम्हें
क्या किसी दिन ऐसा होगा
कि मेरे सारे सवालों के जवाब तुम्हारे पास होंगें
और उनसे मैं मुक्त हो सकूँगा
पर ऐसा हुआ कब है ?
होता तो फिर वही होता
जो हमें चाहिए था
हमें चाहिए था प्रेम
हमें चाहिए थी शान्ति
हमें चाहिए था भाईचारा
पर ऐसा हुआ कब था ?
दंगे हुए थे
हत्याएं हुईं थीं
बलात्कार हुए थे
और तो और हमारे बीच घृणा की एक दीवार न जाने कब खडी हो गई थी
जो हमने नहीं चाहा कभी !
फिर भी सोचता हूँ किसी दिन ऐसा हो जाए शायद
और दुनियां का एक नया भूगोल आकार लेने लगे तो कितना अच्छा हो
अच्छा हो कि किसी दिन हम फिर से मिलें
और मेरे घर का रास्ता तुम्हारे घर के रास्ते से होकर गुजरे
कितना अच्छा हो कि हम सुबह-सुबह उठें
और वह दिन हम सबकी देहरी में हमारा इन्तजार करता हुआ मिले
क्या किसी दिन ऐसा होगा ?
बस यह सवाल है
और मैं हूँ
फिलहाल दोनों की जुगलबंदी है
और जीवन है कि दोनों को साथ लिए सरक रहा !



3.
एक शोर है जहां से होकर मैं हर रोज गुजरता हूँ और मुझे ऊबकाई सी आती है

यहाँ दुःख है , तकलीफें हैं ,
कहने को मित्र भी , सैकड़ों नहीं हजारों
पर मैं रोज लौट जाता हूँ
बस खाली हाथ
जैसे लोग लौट आते हैं कब्रिस्तान से
छोड़ आते हैं अपने किसी परिजन का साथ वहीं
लौटते हुए कितना खाली होते होंगे
उतना ही जितना मैं
जितना मेरे जैसा और कोई
इस खालीपन में एक भयानक शोर सा उठता है
एक पिता के रो-रो कर दहाड़ने की आवाज आती है
जिसका बेटा मारा गया अभी अभी
और उसकी सर कटी लाश देहरी पर सजी है
“भर्ती के समय एक इंच कम हो जाए शरीर की लम्बाई
तो आप नहीं लेते साहेब!
फिर मैं एक फिट कम लाश कैसे ले लूँ ?”
इस शोर में हमारे समय के ऐसे भयानक सवाल बजबजाते हुए उठते हैं
और एक खालीपन पसर जाता है
समय की कूबड़ पीठ पर !
सब कुछ कितना खाली-खाली सा !
कब्रिस्तान से लौटते लोगों के खाली हाथ और मेरे खाली हाथ में
कितनी समानता है
दोनों ही कितने खुरदुरे
पर कितना भयानक शोर है जो सबकुछ गटक ले रहा
पी जा रहा सबके भीतर बहती नदी का पानी
हाथो के खुरदुरेपन से हम अब चिन्हे नहीं जाते
ये हक़ भी कब का छिन चुका
एक शोर है जो मेरा पीछा अब भी नहीं छोड़ रहा
मुझे अब ऊबकाई सी आ रही यहाँ
माफ़ करना लोगों
तुम्हारे उजले विचार
जो कपड़ों की तरह पहन रखे हैं तुमने
उस पर किसी दिन उल्टी कर दूँ और गंदे हो जाएं
तो उसे धोने की जिम्मेदारी मेरी नहीं
क्योंकि इस ऊबकाई का जिम्मेदार मैं नहीं
सिर्फ तुम हो जिसके लिए
समय कभी तुम्हें माफ़ नहीं करेगा !

4.
उसका आना इस तरह हुआ

वह आई पर
प्रेमी प्रेमिका मित्र रहबर खुदा…..
आदि आदि नामों के साथ
उसका आना नहीं हुआ
उसका आना कभी नहीं हुआ
उस तरह भी
जैसे अरसे बाद किसी कहानी में दबे पाँव आता है नायक
और अपनी प्रेमिका को रूलाता है बहुत
फिर उसके आने को सच मान
वह अवसाद से ऊबर उठती है कुछ देर के लिए !
एकांत में उस कहानी को जीते हुए
लगता है जैसे हम सब भी तो
किसी कहानी के नायक की ही तरह हैं
जो आते हैं दबे पाँव
और रूलाते हैं बहुत
उन्हें
जो हमें अपना ईश्वर मानते हैं
वे नहीं जानते कि कहानी के नायक किसी के नहीं हुआ करते
किसी के न होकर भी करीबियत का एहसास
करा देना
भले उन्हें खूब आता है !
उसका आना इन नायकों की तरह कभी नहीं हुआ !
किसी दिन हम चले जाएंगे दुनियां से
और कहानियों में भी
नहीं मिलेगी जगह हमें
तब भी बची रहेगी वह दुनिया में
जिसने नायकों को हमेशा किया माफ़
किया प्रेम उनसे
और छली जाती रही
फिर भी उसका प्रेम
हरियाली बन हमेशा ऊगा धरती पर
और बचाया उसने
हमेशा इसे बंजर होने से !
उसका आना इस तरह हुआ
जैसे चले जाने के बाद भी हमारे
दुनियां के किसी सुरक्षित जगह का कोई कोना
उजला रहेगा सिर्फ उसके आने से
उसका आना इस तरह हुआ
कि उसके आने से धरती पर
बचा रहेगा प्रेम
बची रहेगी प्रतीक्षा
उन झूठे नायकों के लिए भी
जो अक्सर दबे पाँव आते हैं
दुनियां में
किताबी कहानियों में
और दुनियां थोड़ी देर के लिए अवसाद से ऊबर उठती है
पर देखते देखते सब कुछ वही हो जाता है जो था पहले
उसका आना
इस वही होने को
बदलने की आकांक्षा का जैसे इस धरती पर उतरना है
जैसे कोई परी उतरती है जमीन पर उड़ते हुए आसमान से
और उसके उतर आने से यह धरती खुशियों से भर उठती है !

5.
चिट्ठी पिताओं के नाम

संभव था ठहरकर किसी भी वक्त
लौटना उल्टे पांव अपनी यात्रा से
आपके लिए आपके समय में
पिताओं के नाम लिखी
बाहर पढ़ने गए लडकों ने
चिट्ठी एक दिन
हम यहां रहते हैं जिस शहर में
बदल गया है कुछ दिनों में ही
कितना कुछ भूगोल यहां का
कि रास्ते सभी पीछे नहीं
निकलते हैं आगे ही
दिखते हैं कई-कई घर खड़े जहां
उजली दीवारों वाले बुलाते हुए हमें
कि हमें रहना है अब वहां ही
आपके बिना
समय से बाहर आपके
लिखा चिट्ठी में लडकों ने आगे !
पढ़कर चिट्ठी
कहा कुछ नहीं पिताओं ने
बस…..
देखते रहे
घर के बाहर गुजरती सड़क को
जहां दिख रहे थे लोग आते जाते अब भी
इसी सड़क पर
वे भी गए थे चलकर एक दिन !
संभव है लौट आएं वे भी किसी दिन
कि बदला नहीं है
इस शहर का भूगोल इतना अभी
चुप्पियों ने कहा कुछ जैसे
जैसे उन ठहरे हुए चेहरों से
हवा में झरा कुछ
देखा समय ने जिसे
जो पिताओं का नहीं था !

 

1 Response

  1. रमेश शर्मा says:

    शुक्रिया लिटरेचर पॉइंट ।

Leave a Reply