सविता मिश्रा की लघुकथा ‘परिपाटी’

सविता मिश्रा
w/o देवेन्द्र नाथ मिश्रा (पुलिस निरीक्षक )
फ़्लैट नंबर -३०२ ,हिल हॉउस
खंदारी अपार्टमेंट , खंदारी
आगरा २८२००२

अपनी बहन की शादी में खींची गयी उस अनजान लड़की की तस्वीर को नीलेश जब भी निहारता, तो सारा दृश्य आँखों के सामने यूँ आ खड़ा होता, जैसे दो साल पहले की नहीं, कुछ पल पहले की ही बात हो।
वह भयभीत सी इधर-उधर देखती फिर सबकी नजर बचाकर चूड़ियों पर उँगलियाँ फेरकर खनका देती। चूड़ियों की खनकार सुनकर बच्चियों सी मुस्कराती, फ़िर फौरन सहम कर गम्भीरता ओढ़ लेती। सोचते-सोचते नीलेश मुस्कुरा दिया। 
 
वहीं से गुज़रती भाभी ने उसे यूँ एकान्त में मुस्कुराते देखा तो पीछे पड़ गयीं।
“किसकी तस्वीर है? कौन है यह?” उनके लाख कुरेदने पर नीलेश शर्माते हुए इतना ही बोल पाया, “भाभी हो सके तो इसे खोज लाओ बस, एहसान होगा आपका!” 
फिर क्या था ! भाभी ने लड़की की तस्वीर ले ली और उसे ढूँढना अपना सबसे अहम टारगेट बना लिया।
 
आज़ जैसे ही नीलेश घर वापस आया, भाभी ने उस लड़की की तस्वीर उसे वापस थमा दी, और उससे आँखें चुराती हुई बुदबुदाईं “इस खिलखिलाते चेहरे के पीछे सदा उदासी बिखरी रहती है, नीलेश!”
 
“क्या हुआ भाभी, ऐसा क्यों कह रहीं हैं आप !!” मुकेश घबरा कर ऊँची आवाज़ में पूछ बैठा। आवाज़ सुनकर घर के सारे लोग वहीं जमा हो गए।
 
भाभी कहने लगीं “यह लड़की मेरे बुआ के गाँव की है। उसकी शादी हो चुकी है, पर अफ़सोस उसका पति सियाचिन बार्डर पर शहीद हो चुका है।” यह सुनकर नीलेश के पैरों तले से जमीन खिसक गयी।
 
नीलेश भाभी के आगे हाथ जोड़कर, गिड़गिड़ाने लगा “भाभी इस लड़की के साथ मैं अपनी मुस्कुराहट साझा करना चाहता हूँ। प्लीज़ कुछ करिये आप!”
नीलेश की यह बात सुनते ही परिवारजन सकते में आ गए।
 
 “मेरी सात पुश्तों में किसी ने विधवा से शादी करने की सोची तक नहीं, फ़िर भले वह विधुर ही क्यों न रहा हो! तू तो अभी कुंवारा ही है! अबे ! तू विधवा को घर लायेगा…? कुल की परिपाटी तोड़ेगा.. नालायक?” पिता जी फौरन कड़कते हुए नीलेश को मारने दौड़े।बीच-बचाव में माँ, पिता को शांत कराने के चक्कर में गश खा गईं।अपना सिर पकड़कर वे फर्श पर ही बैठ गईं।
 
पिता जी अभी शांत भी न हुए थे कि अब बड़ा भाई शुरू हो गया “अरे छोटे! तेरे लिए छोकरियों की लाइन लगा दूँगा | इसे तू भूल ही जा |”
 
विरोध के चौतरफ़ा बवंडर के बावजूद नीलेश अडिग रहा। नीलेश ने रंगबिरंगी चूड़ियों में समाई उस लड़की की मुस्कान वापस लौटाने की जो ठान ली थी। इस हो-हल्ले में माँ नें जब अपने दुलारे नीलेश को अकेला पड़ता पाया तो उन्होंने नीलेश की कलाई पकड़ी और अपने कमरे की तरफ़ उसे साथ में लेकर बढ़ चलीं। एकायक तमतमा कर वे पलटीं और कमरे में मौजूद सबको सुनाकर ऊँची आवाज़ में बोलीं “रंगबिरंगी नहीं मूरख! लाल-लाल चूड़ियाँ लेना ! हमारे यहाँ सुहागनें लाल चूड़ियाँ ही पहनती हैं। कुल की परिपाटी तोड़ेगा क्या नालायक!”

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