आलोक कुमार मिश्रा की 4 कविताएं

आलोक कुमार मिश्रा 

1-आँखों की मशाल

अपनी बेटी को 
सिखा रहा हूँ आँख मारना
जिससे वो एक झटके में ही 
ध्वस्त कर दे उसे घेरने वाली
मर्दवादी किलेबंदी
उसे सिखा रहा हूँ आँखें मटकाना 
कि वो देख सके तीन सौ साठ डिग्री
और भेद सके 
चक्रव्यूह के सारे द्वार
उससे कह रहा हूँ कि वो
सोए तो खुली आँखों से
जिससे जान सके 
कि अंधेरे में किस तरह 
बेखटके चले आते हैं
दिन के कुछ देवता बनकर शैतान
उसकी आँखों के अंदर
मैं बना रहा हूँ एक सुरक्षा द्वार
जिसे पार करने से पहले
देनी हो हर किसी को परीक्षा 
मैं उसकी आँखों में जला रहा हूँ 
एक मशाल
जो जले और जला भी सके।

2- क्या करें 

वृक्ष की जलती चिता को
यज्ञ कहकर हंस पड़े वो
पक्षियों का आस टूटा 
रो रहा जंगल समूचा …क्या करें 

उफ! नदी को मात् कहकर
सोखते जलधार अक्सर 
और खेतों के किनारे
रह गये तकते बेचारे…क्या करें 

ये हवा है या जहर है
टूटता कैसा कहर है 
किसके माथे दोष दें
काम कुछ का,सब सहें…क्या करें  

भूमि के हृदय में रोपे बीज जो
बीज न थे,थे मगर बारूद वो  
वह फसल पकने को है…क्या करें 
अब धरा फटने को है…क्या करें।

3- देखना एक दिन 

देखना एक दिन मैं 
सिर्फ चलूंगा नहीं 
बल्कि बहूँगा नदी की तरह
समेटते हुए आसपास को
छोड़ते हुए अपने आप को।

देखना एक दिन
उठूँगा मैं 
हिमालय से भी ऊँचा 
इसलिए नहीं कि 
ऊँचाई कोई बेहतरीन चीज है
बल्कि इसलिए कि देख सकूँगा 
हर एक को वहाँ से
और दे सकूँगा 
आशीष निर्भयता का।

देखना एक दिन 
रचूँगा मैं  
कविताओं की एक ऐसी किताब
जिसमें सिर्फ मेरा नहीं 
सबका अंश होगा।

देखना एक दिन
मैं दिखूंगा कहीं नहीं 
फिर भी महूसस किया जाऊँगा 
हवा में, गंध में, याद में, बदलाव में।


4- अबकी बार

अबकी बार जब
गुलमोहर खिलेगा 
तुम भी शर्म से 
हो जाना लाल
और सिद्ध कर देना 
अपना होना

अबकी बार नदी जब
चढ़ आएगी गाँव तक
मेरे हृदय की धड़कन पर 
तुम हो जाना सवार
और बचा लेना खुद को

अबकी बार जेठ में 
जब बौरायेगा सूरज
तुम मुझसे ले लेना
मेरा अंगोछा उधार
और बाँध लेना उसे

और हाँ माघ की  
ठिठुरन में भी
अपना समस्त ताप लिए 
बिना आमंत्रण दिये
करूँगा मैं इंतजार
तुम देख लेना।


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